फिल्म – ठाकरे
कास्ट – नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी, अमृता राव, अब्दुल कादिर अमीन और लक्ष्मण सिंह राजपूत, बाकी कलाकारों को पहचानने के लिए गूगल करना पड़ेगा. रिव्यू लिखने में लेट हो गए थे इसलिए नहीं खोज पाये.
राइटर/डायरेक्टर – अभिजीत पानसे

बॉलीवुड का बायोपिक काल चल रहा है. साल की शुरुआत से ही लाइन से बायोपिक फिल्म आ रही है. ‘ठाकरे’ उसी लाइन में साल की दूसरी बायोपिक है. (‘मणिकर्णिका’ के फैंस चाहे तो इसे तीसरी बायोपिक मान सकते हैं)

फोटो साभार – यूट्यूब

ठाकरे.  ठाकरे नहीं.. ठाकरे साहेब.

हाँ.. दरअसल फिल्म में बाला साहेब ठाकरे का जो औरा दिखाया गया है. वो देखने के बाद हर कोई बाल केशव ठाकरे को ठाकरे साहेब कहकर ही संबोधित करेगा. वैसे भी जिस आदमी की एक हुंकार पर सारा महाराष्ट्र खुलता/बंद होता था. उसको साहेब कहने में ज्यादा लोगों को आपत्ति होगी भी नहीं. बाला साहेब ठाकरे एक आर्टिस्ट आदमी जिसे पहले लोगों की शकल पर व्यंग्य दिखा करता था. अचानक से उसे उन्हीं लोगों की शकल पर उनकी परेशानियाँ, दुःख और सवाल दिखने लगे और उसने एक संगठन की शुरुआत कर दी. संगठन का नाम दिया ‘शिवसेना.’ एक ऐसा संगठन जो मौजूदा
राजनीति में भले ही बाकी पार्टियों की तरह एक्टिव न हो पर उसी शिवसेना का महाराष्ट्र में बोलबाला था. पर दरअसल में पार्टी की पहचान सिर्फ एक नाम के तौर पर ही की जाती थी. बाला साहेब ठाकरे. जिसे अपने भाषणों के जरिये जनभावना को जनाक्रोश में बदलने की कला आती थी. महाराष्ट्र में ‘मराठा मानुसों’ को एक इशारे पर इकट्ठा कर लेने वाले ठाकरे साहेब को आसानी से इग्नोर कर पाना मुश्किल काम है. कम से कम फिल्म के देखने के दौरान तो ऐसा ही लगता है.

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नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी वो एक्टर है जो खुद को कैरेक्टर की जगह पर छाप देता है. मांझी से लेकर मंटो तक के गूगल सर्च पर नवाज़ुद्दीन की शक्ल दिखाई देती है. सेम यही चीज ठाकरे के साथ होने वाली है. मतलब, नवाज़ुद्दीन ने बाला साहेब को इतने बेहतरीन तरीके से पर्दे पर उतारा है कि जिन लोगों ने बाला साहेब ठाकरे को बोलते, चलते और भाषण देते हुये नहीं देखा है ये फिल्म देखने के बाद उनके लिए नवाज़ुद्दीन ही बाला साहेब ठाकरे हो जाएंगे. शायद नवाज़ुद्दीन की वजह से ठाकरे अब तक की सबसे बेहतरीन बायोपिक्स में से एक है. पूरी फिल्म में बाला साहेब ठाकरे (नवाज़ुद्दीन) का कब्जा
होने के बाद भी फिल्म में दूसरे कैरेक्टर्स को पूरी जगह मिली है. बाला साहब की पत्नी मीना ताई ठाकरे के रोल में अमृता राव ने भी बेहतरीन काम किया है. नवाज़ और अमृता की केमेस्ट्री जमती है. अमृता राव के सीन्स ज्यादा नहीं थे फिर भी उन्होंने अपने हिस्से की बढ़िया एक्टिंग की है.

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फिल्म का दूसरा सबसे स्ट्रॉंग प्वाइंट है, फिल्म का डायरेक्शन. मैंने डायरेक्टर अभिजीत पानसे की पहली फिल्म देखी है और पहली फिल्म से ही इनके डायरेक्शन की भर-भर कर तारीफ कर रहा हूँ. फिल्म में डिटेलिंग पर काफी ध्यान दिया गया है. कई जगह ऐसे बेहतरीन शॉट्स लिए गए है. जिनको याद रखने के लिए एक्स्ट्रा एफर्ट लगाने की जरूरत नहीं पड़ी है. जैसे कि फिल्म में मेरा फेवरेट हिस्सा है कि फिल्म में एक जगह हिन्दू-मुस्लिम दंगो का सीन दिखाया गया है जहां एक जगह सड़क पर भगवा और हरे रंग के झंडे जमीन पर गिरे हुये दिखे है दोनों झंडो के बीच सड़क पर बिखरा हुआ खून और कीचड़ दिखाई देता है और बैकग्राउंड म्यूज़िक में ‘सारे जहां से अच्छा’ की धुन बज रही है. फिल्म के आखिर तक ऐसे कई छोटे-छोटे सींन्स है जो आपको बांधे रखते है. बाकी नवाज़ुद्दीन की एक्टिंग तो है ही.

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फिल्म में कमी के नाम पर बस इतना ही है कि बायोपिक फिल्म के लिहाज से कई चीजे फिल्म में मिसिंग है. पर शायद वो उन्हीं लोगों को समझ में आएंगी जिन्होंने बाला साहब के बारे में पहले से थोड़ा-बहुत पढ़ रखा होगा. जैसे कि फिल्म में दक्षिण भारतीय और बंगाली लोगों के लिए बाला साहब के भेदभाव वाले रवैये को तो दिखाया गया है पर वहीं दूसरी तरफ उत्तर भारतीय और बिहारी लोगों पर की गई टिप्पणी को दिखाने से बचने की कोशिश की गई है. अब ऐसा फिल्म में तथ्यों की कमी के चलते किया गया है या फिल्म के बिजनेस के लिहाज से ये तो फिल्म के प्रोड्यूसर संजय राउत ही जाने. हालांकि संजय राउत खुद शिवसेना पार्टी के नेता रह चुके है.

कुल मिलाकर फिल्म शानदार है, जोरदार है और जबरदस्त तक आते-आते खत्म हो जाती है. बेहतरीन बैकग्राउंड स्कोर के साथ फिल्म देखने में मज़ा आयेगा. फिल्म बोरिंग नहीं है. पैसा वसूल है. देख डालो. बाला साहब ठाकरे के लिए न सही तो नवाज़ुद्दीन की एक्टिंग के लिए ही देख आओ.

तरन आदर्श ने फिल्म को साढ़े तीन स्टार दिये है. हम चार दे रहे है. क्या समझे. चलो, कर लो टिकट बुक.
‘आरामखोर लौंडो’ का मूवी रिव्यू देखने के लिए यहाँ क्लिक करें –