फिल्म – द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर
कास्ट – अनुपम खेर, अक्षय खन्ना, विपिन शर्मा, आहाना कुमरा, सुज़्ज़ेन बर्नट, अर्जुन माथुर और राजनीति के कई नेताओं के डिट्टो मेकअप में ढले हुये बाकी किरदार.
डायरेक्टर – विजय रत्नाकर गुट्टे

देश की पहली मूवी जिसके प्रमोशन की ज़िम्मेदारी BJP वालों ने ली थी. ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर.’ फिल्म को कॉन्ट्रोवर्सी वाले एंगल से प्रमोट किया जा रहा था. पर पूरी फिल्म में कहीं भी कॉन्ट्रोवर्सी नहीं है. फिल्म के ‘ट्रेलर फैंस’ के लिए ये निराश करने वाली ख़बर हो सकती है. द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर में मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री ‘कार्यकाल’ को दिखाया गया है. ये उनकी बायोपिक नहीं है. 2004 से 2008 के बीच प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार रहे संजया बारू ने फुरसत निकाल कर किताब लिख डाली थी. सेम किताब के नाम पर ही फिल्म बना दी गई है.

फोटो सोर्स: युट्यूब

अब आते है फिल्म की कहानी पर. संजया बारू की किताब में जो-जो, जैसा-जैसा छ्पा था; वो-वो, वैसा-वैसा फिल्म में छाप दिया गया है. फिल्म में अक्षय खन्ना संजया बारू के कैरेक्टर में है. फिल्म में बतौर नरेटर यानि सूत्रधार भी अक्षय खन्ना ही दिखाई दे रहे है. स्क्रीन पर उनकी एक्टिंग, कैरेक्टर के लिहाज से अपीलिंग लगती है. पूरी फिल्म के दौरान एक ही टाइम में संजया बारू कैरेक्टर में रहते हुये बतौर नरेटर भी ऑडिएन्स को फिल्म के साथ जोड़े रखते है. उनकी स्क्रीन प्रेजेंस फिल्म को उबाऊ होने से रोके रखती है.

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फिल्म का दूसरा और सबसे इम्पॉर्टेंट कैरेक्टर है मनमोहन सिंह. अनुपम खेर मनमोहन सिंह के किरदार में पूरी तरह सूट करते है. लेकिन कुछ जगहों पर उनके कुछ एक्स्ट्रा एफर्ट्स नकली से दिखाई देते है. मसलन, मनमोहन सिंह की तरह उनका चलने का तरीका. गले की एक्स्ट्रा ख़राश. पर इन सबके बाद भी अनुपम खेर ने मनमोहन सिंह को पर्दे पर काफी बढ़िया तरीके से उतारा है. मनमोहन सिंह को फिल्म में इतना लाचार नहीं दिखाया गया है जितना कि ट्रेलर देखकर अंदाजा लगाया जा रहा था. बस, सोनिया गांधी को विलेन बना दिया गया है. लेकिन, हम क्यों टिप्पणी करे? हैं? हमको क्या?

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फिल्म में सोनिया गांधी के कैरेक्टर में सुज़्ज़ेन बर्नट है. प्रियंका गांधी के कैरेक्टर में आहना कुमरा है. राहुल गांधी के कैरेक्टर में अर्जुन माथुर है. जो कभी-कभी राहुल गांधी जैसे लगते है. फिल्म में एक और कैरेक्टर है अहमद पटेल, जो कि सोनिया गांधी के पर्सनल असिस्टेंट रहे है. अहमद पटेल के कैरेक्टर में विपिन शर्मा ने बेहतरीन काम किया है. फिल्म की सबसे बढ़िया बात है इसके कैरेक्टर्स और उनका मेकअप. फिल्म में नेताओं के लुक्स और मेकअप पर ज़ोर दिया गया है. स्क्रीन पर दिखने वाले नेताओं के चेहरों को उनके बेहतरीन मेकअप की वजह से पहचानने में ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती है. इसे फिल्म की यूएसपी माना जा सकता है. पर, यही बात फिल्म के ख़त्म होने तक इसकी कमजोरी भी बन जाती है. कैसे?

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वो ऐसे कि फिल्म बनाते समय सारा फोकस किरदारों के मेकअप पर ही रखा गया है. इसके अलावा बाकी सारी चीजे फिल्म में पीछे छूटती हुई नज़र आती है. जैसे – फिल्म के कई हिस्से में लिए गए कैमरा शॉट्स बहुत कमज़ोर और औसत से नज़र आते है. बैकग्राउंड में इस्तेमाल किए गए VFX साफ-साफ नकली नज़र आते है. फिल्म की डीटेलिंग पर बिलकुल भी ध्यान नहीं दिया गया है. डायरेक्टर विजय रत्नाकर गुट्टे ने शायद पहली फिल्म डायरेक्ट की है. जिसमें वो डायरेक्शन की छाप छोड़ पाने में नाकामयाब रहे है. इंसिडेंट और बुक बेस्ड होने के साथ फिल्म बायोपिक और डाक्युमेंट्री के बीच झूलती हुई नज़र आ रही है. फिल्म शुरू होकर आधी कहानी कहते-कहते खत्म हो जाती है.

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कुल मिलाकर फिल्म में बेहतरीन जैसा कुछ नहीं है, बेहतर भी नहीं है. फिल्म बस ठीक-ठाक से एक लेवल ऊपर आकर बढ़िया है. वन टाइम वाच मूवी है. बिना पॉपकॉर्न लिए जाकर देख आओ. फिल्म के आखिर में क्रेडिट पार्ट तक रुकेंगे तो बाबा नागार्जुन की लिखी मौजदार कविता सुनने को मिलेगी.

पाँच में से दो स्टार वाली फिल्म है. चले जाओ.
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