दुनिया भर में यदि किसी शब्द को सुनते ही दहशत घर कर जाता है तो वो शब्द “आतंकवाद” है। पिछले दिनों जिस तरह से श्रीलंका में हुए एक के बाद एक कई आंतकी धमाकों में तीन सौ से अधिक लोगों को जान गंवानी पड़ी। इस घटना ने दुनिया भर के लोगों के सामने आतंक के बेहद खौफनाक दृश्य को लाने का काम किया।

यह पहली बार नहीं हुआ है जब किसी आतंकी ने सैकड़ों मां के गोद को सुना कर दिया। यह भी पहली बार नहीं हुआ कि अपने पति के चिथड़े उड़े लाशों पर विधवाएं विलाप करती नजर आई। चारों ओऱ बिखरे लाशों के आस-पास लोगों के चिखने-चिल्लाने की आवाज गुंजने लगी।

इसे भी पढ़ें: राहुल गांधी को किसी और से नहीं बल्कि मां सोनिया से बहुत कुछ सीखने की जरूरत है!

दुनिया के किसी न किसी मुल्क में अक्सर ऐसी घटनाएं घटती रहती है। पूरी दुनिया आतंक के खिलाफ़ लड़ाई लड़ने के लिए संकल्पित है। ऐसे समय में कोई आतंकी भला त्याग, तपस्या और बलिदान का प्रतिक कैसे हो सकता है?

दरअसल, मध्य प्रदेश में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह ने बुधवार को कहा कि आतंकवाद त्याग, तपस्या और बलिदान का प्रतीक होता है। मीडिया से आ रही खबरों के अनुसार, एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए सिहं ने कहा, ‘भगवा कभी आतंकवाद नहीं होता, भगवाधारण करने वाला कभी आतंकवादी नहीं होता, आतंकवाद तो त्याग, तपस्या और बलिदान का प्रतीक होता है।’ राकेश सिंह ने आगे कहा, ‘और जब चुनाव का समय आता है तब कांग्रेस के नेता और ये दिग्विजय सिंह जगह-जगह पर इसी भगवा पर माथा टेकते हुए दिखाई देते हैं।

राकेश सिंह ने ये भी कहा कि भाजपा ने साध्वी प्रज्ञा को अपना उम्मीदवार बनाया है। यह साफ है कि भोपाल से आध्यात्मिकता और विकास की नई ऊर्जा प्रवाहित होगी और इसका केंद्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास होगा।

मालूम हो कि प्रज्ञा ठाकुर पर मालेगांव बम धमाके का आरोप है। उनके अलावा लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित और छह अन्य आरोपी हैं।

इसे भी पढ़ें:SC के जजों द्वारा सिर्फ पुरूष स्टाफ की मांग करना लैंगिक समानता पर बड़ा सवाल उठाता है!

नासिक जिले के मालेगांव में भिकू चौक के निकट 29 सितंबर 2008 को हुए बम विस्फोट में छह लोगों की मौत हुई थी और 101 से अधिक घायल हो गए थे। वह फिलहाल इस मामले में ज़मानत पर बाहर हैं

जानकारी के लिए बता दें कि इससे पहले भोपाल से भाजपा उम्मीदवार साध्वी प्रज्ञा के उस बयान पर विवाद खड़ा हो गया था जिसमें उन्होंने मुंबई में 26/11 के आतंकी हमले में शहीद हुए पुलिस अधिकारी हेमंत करकरे को श्राप देने की बात कही थी।

दरअसल, बात ये थी कि भोपाल में मीडिया से मुखातिब होते हुए साध्वी प्रज्ञा ने कहा था – ‘एटीएस मुझे 10 अक्टूबर 2008 को सूरत से मुंबई लेकर गई थी। वहां 13 दिन तक बंधक बनाकर रखा गया। पुरुष एटीएस कर्मियों ने इस दौरान मुझे खूब प्रताड़ित किया। पूर्व एटीएस चीफ हेमंत करकरे को संन्यासियों का श्राप लगा और मेरे जेल जाने के करीब 45 दिन बाद ही वह 26/11 के आतंकी हमले का शिकार हो गए।

साध्वी का यह बयान बेहद निचले स्तर का था। साध्वी को इतना तो समझना ही चाहिए था कि अपनी ड्यूटी निभाते हुए कोई जवान किसी के श्राप की वज़ह से शहीद नहीं होता है। बल्कि वह अपने मुल्क और तिरंगे की शान को बचाए रखने के लिए शहीद होता है।

देश के अंदर और देश की सीमा पर शहीद होने वाले देशभक्त क्या किसी साधू के श्राप से मरते हैं? ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। वो देश के करोड़ों लोगों और लाखों परिवारों की हिफ़ाज़त के लिए शहीद होते हैं। ऐसे में साध्वी द्वारा यह कहना कि ‘बुरे कर्मों की वज़ह से करकरे मरे’ ये न सिर्फ ग़लत बल्कि घटिया है।

साध्वी के इस बयान के बाद भाजपा को सफाई देनी पड़ी है। भाजपा ने जो कहा वो किसी भी तरह से पर्याप्त नहीं है। भाजपा का ओर से सफाई में मीडिया प्रमुख अनिल बलूनी ने कहा कि हमारी पार्टी ने हेमंत करकरे को हमेशा शहीद माना है।