इतिहास इस बात का गवाह है कि बेहतरीन कला और जुनून हमेशा एक साथ पाये जाते हैं। जुनून भी ऐसा जो पहले से तय किये जा चुके ढर्रों को तोड़ कर मुश्किलों के बावजूद बगावत पर उतर आए। हिन्दी सिनेमा में ऐसे ही एक जुनूनी कलाकार हुए हैं जिनका नाम था के.आसिफ। आसिफ़ अपने जीवनकाल में सिर्फ दो फिल्में पूरी कर सके और उन दो फिल्मों में से एक ने उन्हें अमर कर दिया। जमाने को अफसोस इस बात का रह गया की आसिफ़ अपनी, या कह ले कि पूरे हिन्दी सिनेमा की सबसे शानदार फिल्म की सफलता देखने के लिए इस दुनिया में नहीं रहे।

के.आसिफ़, फोटो सोर्स- गूगल

आज आसिफ़ के जन्मदिन पर हम उनकी ज़िंदगी, व्यक्तित्व और जुनून के बारे में बात करेंगे और समझने की कोशिश करेंगे की आसिफ़ में ऐसा क्या था जिसके कारण लोग उन्हें पागल और सनकी फिल्म निर्माता भी कहने लगे थे।

आसिफ़ का जन्म 14 जून 1922 के दिन उत्तर प्रदेश के इटावा में हुआ था। आसिफ़ ज़्यादा पढे लिखे नहीं थे, लेकिन फिल्मों को लेकर उनके दिल में जो जुनून था उसने उन्हें हिन्दी सिनेमा के सबसे महान फिल्म निर्माता के पटल पर रख दिया था। आसिफ़ के निर्देशन में बनी पहली फिल्म ‘फूल’ 1945 में रिलीज़ हुई और कुछ खास कमाल नहीं दिखा पाई। इसके बाद आसिफ़ के सर पर मुग़ल बादशाह अकबर के दरबार की नर्तकी ‘अनारकली’ के जीवन पर एक फिल्म बनाने का जुनून सवार हो गया और इसी जुनून ने आसिफ़ को एक फिल्म निर्माता के रूप में अमर कर दिया। आसिफ़ ने इस फिल्म का नाम रखा मुग़ल-ए-आज़म। ये फिल्म सय्यद इम्तियाज़ आली ताज़ के उपन्यास ‘अनारकली की कहानी पर बनी थी।

मुग़ल-ए-आज़म बनाने में आसिफ़ को अनेकों दिक्कतों का सामना करना पड़ा। इतना कि इस फिल्म को पूरा करते-करते आसिफ़ को 14 साल का वक़्त लग गया। आसिफ़ ने मुग़ल-ए-आज़म में करीब 1.5 करोड़ रुपये लगा दिये। मुग़ल-ए-आज़म पर हुए खर्च की भव्यता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि जितने रुपए में मुग़ल-ए-आज़म का एक गीत ‘प्यार किया तो डरना क्या’ बनाया गया, उतने रुपए में उस वक़्त के फिल्म निर्माता एक अच्छी ख़ासी फिल्म बना लेते थे। ‘प्यार किया तो डरना क्या’ फिल्माने में करीब 10 लाख रुपए का खर्च आया था। मुग़ल-ए-आज़म बनाने के लिए आसिफ़ ने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था और अफसोस कि अपनी सबसे मशहूर फिल्म की सफलता देखने के लिए आसिफ़ इस दुनिया में नहीं रहे।

प्यार किया तो डरना क्या गीत का सेट, फोटो सोर्स- गूगल

मुग़ल-ए-आज़म अपनी रिलीज़ के बाद एक फ्लॉप फिल्म साबित हुई थी। अपनी फिल्म की असफलता देखकर आसिफ़ की आर्थिक स्थिति और मानसिक अवस्था को बहुत बड़ा धक्का लगा। बॉलीवुड के जानकार कहते हैं कि मुग़ल-ए-आज़म की असफलता ही आसिफ़ की मौत का कारण बनी थी। मुग़ल-ए-आज़म के बाद आसिफ़ बहुत तनाव में रहते थे, इस फिल्म के निर्माण के लिए उन्होनें एक बहुत बड़ी रकम लगा दी थी और बहुत लोगों से एक बड़ी रकम उधार भी ले रखी थी।

9 मार्च 1971 को मुंबई में आसिफ़ का निधन हो गया और बॉलीवुड ने एक सच्चा जुनूनी कलाकार खो दिया। एक ऐसा कलाकार जिसकी बनाई फिल्म उसकी मृत्यु के बाद हिन्दी सिनेमा के सर्वश्रेष्ठ फिल्म के रूप में साबित होने वाली थी। आसिफ़ की मृत्यु के कुछ साल बाद उनकी बनाई मुग़ल-ए-आज़म ने हिन्दी सिनेमा की दुनिया में एक भूचाल-सा ला दिया। ये फिल्म लोगों ने पूरी दुनिया में देखी। लोगों ने मुग़ल-ए-आज़म को इतना पसंद किया कि ये फिल्म भारत के साथ-साथ पाकिस्तान, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान, इटली और श्रीलंका जैसे देशों में कई भाषाओं में रिलीज़ करनी पड़ी। इस फिल्म ने पूरी दुनिया में करोड़ों रुपए कमाए। 2004 में मुग़ल-ए-आज़म एक बार फिर से रंगीन पर्दे पर रिलीज़ की गयी और लोगों ने दोबारा से इसे देखा। हिन्दी सिनेमा पसंद करने और बनाने वाली नई नस्लों के लिए मुग़ल-ए-आज़म एक बेहतरीन सिनेमा की मिसाल बनी।

पृथ्वीराज कपूर, इमेज सोर्स- गूगल

मुग़ल-ए-आज़म में अकबर का किरदार अपने वक़्त के बड़े अभिनेताओं में से एक पृथ्वीराज कपूर ने निभाया था और अकबर के बेटे सलीम के किरदार में दिलीप कुमार नज़र आए थे, वहीं अनारकली के किरदार के लिए आसिफ़ ने मधुबाला को चुना था। मुग़ल-ए-आज़म के बाद दिलीप कुमार और मधुबाला देश भर में रातों-रात स्टार के रूप में उभर आए।

दिलीप कुमार और मधुबाला, इमेज सोर्स- गूगल

आसिफ़ ने मुग़ल-ए-आज़म के बाद एक और सिनेमा पर काम शुरू किया था जो पूरा नहीं हो सका। ‘लव एंड गॉड’ नाम की इस फिल्म में आसिफ़ गुरु दत्त और निम्मी के साथ काम कर रहे थे, लेकिन इसकी शूटिंग पूरी होने से पहले ही आसिफ़ का देहांत हो गया। इसके बाद 1986 में आसिफ़ की पत्नी अख्तर आसिफ़ ने अपने पति की याद में उनकी अधूरी फिल्म रिलीज़ की।

जब भी हम एक महान कलाकार की बात करते हैं या उसके बारे में पढ़ते हैं तो हमें समझ में आता है कि हर वो कलाकार जिसने कुछ ऐसा काम कर दिया जो उसकी मृत्यु के बाद भी उसे अमर कर गया, उसने दुनिया को एक अलग नज़रिये से देखा। हर बड़ा कलाकार जुनूनी रहा है, चाहे वो फ्लोरेंस का द विंची रहा हो या हिस्पानिया का पिकासो, सबके अंदर अपनी कला को लेकर एक ऐसा जुनून रहा है जो उसे महानता की सीढ़ी पर बहुत ऊपर ले गया।

आज के.आसिफ़ के जन्मदिन पर हम ‘द कच्चा चिट्ठा’ की तरफ से एक अच्छा सिनेमा देने के लिए उनका शुक्रिया करते हैं।

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