यदि आपके शहर में कई हजार पेड़ काटे जा रहे हों लेकिन, उसके बदले में मेट्रो देने का वादा हो, जो हर रोज की भीड़ से आपको निज़ात दिलाएगी. तो आप उस वादे के साथ जाएंगे या खांसते हुए अपने फेफड़ों के साथ, जो बार-बार साफ़ हवा की मांग कर रहे हैं.

मुंबई शहर के लोग इस सवाल को सोच ही रहे थे कि हाई कोर्ट ने सवाल का जवाब खुद दे दिया। कोर्ट से जवाब आया है कि पेड़ काटे जाएंगे।

क्या है पूरा मामला?

मुंबई के बीचो-बीच एक इलाका है जिसे ‘आरे’ कहते हैं. आरे हजारों पेड़ों से भरा है इसलिए इसे ‘आरे इलाका’ की जगह ‘आरे जंगल’ भी कहते हैं. इसके बगल में संजय गाँधी नेशनल पार्क और आदिवासियों से भरी कॉलोनियां भी हैं. मोटा-मोटा समझाएं तो मक्खियों के छत्ते जैसे शहर मुंबई में कुछ शहद है तो वो आरे ही है.

लोग कहते हैं कि आरे की खास बात यह है कि आरे मुंबई के बीचो-बीच है. अब यही बात मुसीबत का कारण भी बन गई कि आरे मुंबई के बीचो-बीच है.

कुछ ऐसा दिखता है आरे (फोटो क्रेडिट- BBC)
कुछ ऐसा दिखता है आरे (फोटो क्रेडिट- BBC)

प्रशासन का कहना है कि उन्हें कुछ हज़ार पेड़ काटने पड़ेंगे ताकि वो उस जगह पर मुंबई मेट्रो का एक कार पार्किंग शेड बना सकें। प्रशासन की ये दलील है कि मुंबई मेट्रो से वो 17 लाख लोगों को हर रोज यहां से वहां लेकर जाएंगे और आरे में जितने पेड़ कटेंगे, उससे कई गुना पेड़ लगा भी देंगे।

इसके खिलाफ विरोध

मामला उतना भी सीधा नहीं है जितना पिछले एक मिनट में आप ने पढ़ लिया। प्रशासन ने कहा कि मेट्रो लोगों को सुविधा देगी, लोगों ने भरोसा कर लिया क्योंकि बाकी शहरों में मेट्रो ने सुविधा दी है. ट्रैफिक भी कम किया है. प्रशासन ने कहा कि हम पेड़ लगा कर पर्यावरण बचाएगें, पर लोगों ने भरोसा नहीं किया। क्योंकि सरकारों का ट्रैक रिकॉर्ड खराब रहा है.

विरोध कर रहे लोग (फोटो क्रेडिट- The Print)
विरोध कर रहे लोग (फोटो क्रेडिट- The Print)

देश में जितने भी डैम बने हैं, उनसे हुए नुकसान की भरपाई आज तक नहीं हुई है. जितने भी लोगों को विकास के नाम पर उनकी जगह से हटाया गया है, उन्हें नए बसेरों का अब तक इंतजार है. ऐसे में लोगों को ये शक है कि शहर के बीचो-बीच इस जगह का धीरे-धीरे बाज़ारीकरण कर दिया जाएगा। रही बात नए पेड़ लगाने की तो लोगों की ये दलील है कि नए पौधे यदि आज लगाए जाएंगे तो वो पेड़ तो कई सालों में बनेंगे। तब तक ऑक्सीजन कौन देगा? मेट्रो?

कोर्ट का आदेश, रिश्ता वही सोच नई

पर्यावरण की चिंता करने वाले लोग जब पेड़ काटे जाने के खिलाफ हाई कोर्ट गए तो जज साहेब ने भी उन्हें पुराना पकवान नई थाली में परोस कर दे दिया। कोर्ट ने कहा कि लोगों की चिंता ठीक है, उनकी दलीलें भी ठीक हैं लेकिन, फिर भी पेड़ काटे जाएंगे क्योंकि इससे बहुत सारे लोगों का भला भी होगा.

तो अब?

कोर्ट का आदेश एक बार आ गया तो सरकार ने भी शुभ काम में देरी नहीं की. पेड़ कटने शुरू हो चुके हैं. तमाम लोग इसका विरोध कर रहे हैं. मसलन पॉलिटिकल पार्टीज़, NGO और स्थानीय नागरिक। महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन में बैठी शिव सेना खुद आरे के काटे जाने का विरोध कर रही है. लेकिन, जिसकी लाठी उसकी भैंस.

पिछले ही महीने अमेज़न के जंगलों में लगी आग के कारण पूरे विश्व को दोबारा याद आया था कि पर्यावरण नाम की भी कोई चीज़ होती है. ग्रेटा थनबर्ग के भाषण के बाद तमाम पर्यावरणवादियों को लगा था कि अब सरकारें जाग जाएंगी। लेकिन, ऐसा न हुआ.

सपना टूटा, नींद खुली, मुंबईकर खुद को मेट्रो में बैठे पाते हैं और स्पीकर से आवाज़ आती है, अगला स्टेशन विकास है.

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