हिंदी साहित्य की दुनिया के लिए बीता मंगलवार बुरा दिन साबित हुआ. साहित्य की दुनिया के बड़े लेखक और एक ऊंचे ओहदे के आलोचक नामवर सिंह का निधन हो चुका है. 19 फरवरी को रात लगभग 11:51 बजे दिल्ली के एम्स अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली. आज बुधवार दोपहर बाद लोधी रोड पर उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा.

बताया जा रहा है की 93 वर्ष के नामवर सिंह की तबियत पिछले कई महीनों से खराब चल रही थी. पिछले महीने घर में फिसलकर गिरने की वज़ह से उनके सिर में गंभीर चोट लगी थी. जिसके बाद इलाज के लिए उन्हें एम्स में भर्ती कराया गया था.

हिंदी आलोचना जगत के शिखर पुरूष 28 जुलाई, 1926 में बनारस के जीयनपुर गांव में जन्मे थे. हिंदी में अपने लेखन की शुरूआत इन्होंने कविताएं लिखने से की थी. बीएचयू से एम.ए करने के बाद में वहीं हिंदी के व्याख्याता हो गए थे. पर हालांकि बाद में कुछ कारणों से उन्होंने बीएचयू छोड़ दिया था. 1971 में इन्हें कविता के नए प्रतिमान के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया.

बाद में नामवर सिंह ने कुछ साल तक सागर यूनिवर्सिटी में भी नौकरी की. बाद में वो जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी पहुंचे और 1974 में जवाहर लाल यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर नियुक्त हुए. वहां इन्होंने भारतीय भाषा केन्द्र की स्थापना की. 1992 में जवाहरलाल यूनिवर्सिटी से रिटायर हुए.

नामवर सिंह. फोटो साभार- गूगल

नामवर सिंह ने हिंदी साहित्य में आलोचना के स्तर को एक नया मुकाम दिया. उनका जाना साहित्य की दुनिया के लिए एक बहुत बड़ी क्षति है. बड़े-बड़े लेखको ने उनकी मृत्यु पर शोक दर्ज कराया है.

अपने मरने की बात पर अक्सर नामवर सिंह अज्ञेय की ये पक्तिंया कहते थे-

“मैं मरूँगा सुखी, मैंने जीवन की धज्जियां उड़ाई हैं”

उन्होंने अपने हिस्से का भरपूर जीवन जिया. साहित्य में उनका जो योगदान रहा है उसका लाभ आने वाली कई पीढ़ियां उठाएंगी. जेएनयू में पढ़ने वाले लोग उनके कई किस्से सुनाते हैं, जो उनसे बहुत करीब से मिलवाते हैं.

उनको याद करते हुए पढ़िए उनकी ये कविता-

बुरा ज़माना, बुरा ज़माना, बुरा ज़माना
लेकिन मुझे ज़माने से कुछ भी तो शिकवा
नहीं, नहीं है दुख कि क्यों हुआ मेरा आना
ऐसे युग में जिसमें ऐसी ही बही हवा

गंध हो गई मानव की मानव को दुस्सह
शिकवा मुझ को है ज़रूर लेकिन वह तुम से—
तुम से जो मनुष्य होकर भी गुम-सुम से
पड़े कोसते हो बस अपने युग को रह-रह
कोसेगा तुम को अतीत, कोसेगा भावी
वर्तमान के मेधा! बड़े भाग से तुम को
मानव-जय का अंतिम युद्ध मिला है चमको
ओ सहस्र जन-पद-निर्मित चिर-पथ के दावी !
तोड़ अद्रि का वक्ष क्षुद्र तृण ने ललकारा
बद्ध गर्भ के अर्भक ने है तुम्हें पुकारा ।

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