अर्नब गोस्वामी. रिपब्लिक टीवी और रिपब्लिक भारत के सर्वे-सर्वा हैं. बोले तो बॉस हैं. पेशे से पत्रकार हैं. पर आज-कल अपना काम-धाम भूल कर लोगों को राष्ट्रवाद की घुट्टी पिला रहे हैं. “नेशन वान्ट्स टू नो” करते हुए आए थे. ‘सरकार वन्ट्स टू नो’ कर रहे हैं. साफ है सरकार के बेहद करीब हैं. इतने करीब हैं कि इनके लिए एक संगठन बना दिया गया है. इस संगठन का नाम है NBF (News Broadcasters Federation). अर्नब गोस्वामी इस संगठन के अध्यक्ष बन गए हैं.

इनका काम है देश की मीडिया हाउसेज में क्या चल रहा है? उस पर नज़र रखना. यानि, कोई चैनल या पत्रकार कोई भ्रामक, झूठी या जनता को गुमराह करने वाली ख़बर तो नहीं फैला रहा है. अगर कोई ऐसा कर रहा है तो उसकी ख़बर ली जाएगी. उस पर कार्रवाई की जाएगी. साथ ही ऐसी स्थिति से कैसे बचा जाए इसके बारे में ब्रॉडकास्टिंग मिनिस्ट्री को सुझाव भी दिए जाएंगे.

मतलब अब एक चोर बताएगा कि दूसरे चोर को कैसे पकड़ा जाए, एक आतंकी बताएगा कि दूसरे आतंकी को कैसे पकड़ा जाए, एक दंगाई बताएगा कि दूसरे दंगाई को कैसे पकड़ा जाए, स्थिति कुछ ऐसी ही है.

अर्नब गोस्वामी रिपब्लिक टीवी और रिपब्लिक भारत के सर्वे-सर्वा, फोटो सोर्स: गूगल

अर्नब गोस्वामी रिपब्लिक टीवी और रिपब्लिक भारत के सर्वे-सर्वा, फोटो सोर्स: गूगल

इस संगठन के अंदर कुल 78 चैनल्स हैं. जिन्होंने अर्नब गोस्वामी को अपना सर्वे-सर्वा चुना है. सबसे ताज्जुब की बात ये है कि इनमें रिपब्लिक भारत और TV9 भारतवर्ष को बाहर निकाल दें तो बांकी तमाम चैनल क्षेत्रीय स्तर के हैं. जिसका सीधा अर्थ है कि एबीपी न्यूज़, इंडिया टुडे, आज तक जैसे तमाम राष्ट्रीय चैनल्स इस संगठन से बाहर हैं.

इस चीज को समझिए सरकार से आप जितना करीब रहेंगे उतनी आपको तरक्की मिलेगी. अर्नब सीधे तौर पर सरकार का समर्थन करते हैं. जिसका फायदा ये है कि सराकार से जुड़े तमाम विज्ञापन सीधे रिपब्लिक भारत को मिलते हैं. साथ ही सरकार का संरक्षण भी मिलता है. अब यही सब कुछ अर्नब गोस्वामी की छत्रछाया में बाकी के चैनलों को भी मिलेगा. जो खुद वही करते हैं जो अर्नब गोस्वामी करता है. सरकार की चापलूसी, भ्रामक और झूठी खबरों का प्रसारण. इन सब के लिए पैसा ही भगवान है.

जिसका नुकसान आप झेलेंगे अब लीगल तरीके से आपको भ्रामक खबरें परोसी जाएंगी. जिसका नतीजा ये होगा कि आप और ज़्यादा उग्र होकर हिंदू-मुस्लिम करेंगे और अपने बेसिक मुद्दों को भूल जाएंगे.

अर्नब अभी जिस संगठन (NBF) के अध्यक्ष बने हैं. उससे पहले से ही एक संगठन मौजूद है NBA (News Broadcasters Association). इसके अंदर तमाम राष्ट्रीय और क्षेत्रीय चैनल्स आते हैं. इसका काम भी चैनलों से जुड़े नियम-कायदे तय करना है. इसने मीडिया से जुड़े तकरीबन 3,000 से ज्यादा मामलों का निपटारा किया. साथ ही इसके द्वारा दिए गए सुझाव और फैसलों को सरकार से लेकर चुनाव आयोग तक ने मान्यता दी है. अभी वर्तमान में पत्रकार और इंडिया टीवी के चैयरमेन रजत शर्मा इसके अध्यक्ष हैं.

NBA के रहते NBF की जरूरत क्यों पड़ गई?

इसकी वजह है अर्नब गोस्वामी और NBA के बीच की तकरार. अर्नब गोस्वामी ने टाइम्स नाउ और रिपब्लिक भारत में रहते हुए कई बार NBA द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का उल्लंघन किया. इतना ही नहीं गोस्वामी ने NBA द्वारा जारी नोटिस तक का उल्लंघन किया. मार्च (2019) महीने में तो हद ही हो गई, गोस्वामी ने अपनी साथी पैनलिस्ट के साथ मिलकर एक मुस्लिम पैनलिस्ट को धमकाया और उसे भारत माता की जय बोलने के लिए मजबूर किया. जिसके बाद NBA ने अर्नब गोस्वामी को अपने चैनल पर माफी चलाने को कहा लेकिन, गोस्वामी ने ऐसा नहीं किया.

ये तो कुछ भी नहीं है. NBA ने तो अर्नब गोस्वामी के रिपब्लिक टीवी की वैधता तक पर सवाल उठा दिए थे. उसने चैनल की वैधता को चुनौती देते हुए TRA (Telecom Regulatory Authority) को पत्र तक लिख दिया था.

अर्नब गोस्वामी ने भी इसको लेकर अपना बदला निकाला. मुंबई में बुलाई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में NBA के नोटिस पर पूछे गए सवालों में अर्नब ने कहा था कि

NBA चार-पांच लोगों का एक गिरोह है, जो अब बेकार हो चुका है. अब तक आप समझ गए होंगे कि NBA की जगह NBF क्यों आया. अब ये दो बयान देखिए.

पहला बयान NBF के अध्यक्ष अर्नब गोस्वामी का है. उन्होंने कहा है कि

लंबे समय से कुछ मुट्ठी भर दिल्ली स्थित चैनलों ने फर्जी तरीके से भारतीय प्रसारकों की नुमाइंदगी करने का दावा किया है. अब ये बदल जाएगा और बेहतर होगा.

सूचना और प्रसारण मंत्री प्रकाश जावडेकर, फोटो सोर्स: गूगल

सूचना और प्रसारण मंत्री प्रकाश जावडेकर, फोटो सोर्स: गूगल

वहीं सूचना और प्रसारण मंत्री प्रकाश जावडेकर का NBF के गठन को लेकर कहना था कि

मुझे उम्मीद है कि NBF सरकार को अपनी सिफारिशें देगा और प्रसारण में अनुशासन को सुनिश्चित करेगा ताकि सच की हत्या न होने पाये.

इन बयानों से ये बात पुख्ता हो जाती है कि अर्नब गोस्वामी सरकार के कितने नज़दीक हैं. सरकार ने पहले मीडिया को गोदी मीडिया में तबदील किया और जब प्रेस की स्वतंत्रता पर सवाल उठने लगे तो इस तरह का संगठन बना कर इसे लीगल करने की चाल चल दी. इसमें नुकसान अगर किसी का है तो सिर्फ जनता का है. ये अब जनता को तय करना है कि वो इनकी बातों में आती है या नहीं. वैसे भी अब जनता की मदद जनता के हाथों में ही है.