भारत में साल 2014 के बाद से तीन चीजें बहुत चर्चा में रही हैं। पहली मोदी जी, दूसरा राहुल गांधी और तीसरा ईवीएम। पहले दो पर तो बिना बात के भी चर्चा की जा सकती है लेकिन ईवीएम पर चर्चा करने से पहले थोड़ा टेक्निकल ज्ञान होना भी जरूरी है। वैसे फिलहाल हम पहले स्थान पर काबिज भारत के प्रधानमंत्री मोदी जी से जुड़ी एक जानकारी आपको देने वाले हैं।

फिल्म का पोस्टर। फोटो सोर्स: गूगल

मोदी जी पर बहुत चीजें बनी। कवितायें, कहानियां, चुटकुले, स्पूफ, वेब-सीरीज और फिल्म आदि। इनसब में से सबसे ज्यादा लेथरई मोदी जी पर बनी फिल्म की हुई है। इस फिल्म को लेकर दुनिया भर का बवाला अपने देश में हुआ। चुनाव आयोग ने इस फिल्म को चुनाव के दौरान रिलीज़ करने से मना कर दिया था। इस वजह से अब फिल्म एक नए डेट पर रिलीज़ होगी।

फिल्म कब रिलीज़ होगी इसपर काफी सोच-विचार किया जा रहा था लेकिन मोदी जी और विवेक ओबेरॉय के फैंस के लिए अब एक खुशखबरी है

फिल्म की रिलीज़ डेट की घोषणा हो चुकी है। यह फिल्म लोकसभा चुनाव के वोट की गिनती के अगले ही दिन रिलीज़ होगी। यानि के 24 मई।

क्यों रोका गया था फिल्म की रिलीज़ को?

मोदी जी पर बनने वाली फिल्म नरेंद्र मोदी पहले 5 अप्रैल को रिलीज़ होने वाली थी लेकिन बाद में डेट को आगे बढ़ा दिया गया और घोषणा हुई कि फिल्म 11 अप्रैल को रिलीज़ होगी। रिलीज़ की नयी तारीख चुनाव के बीच में थी इस वजह से इस फिल्म की शिकायत चुनाव आयोग से की गयी। बवाल शुरू हो गया। चुनाव आयोग ने सरदर्दी बढ़ते देख फिल्म को बैन कर दिया। चुनाव आयोग के बैन से फिल्म के मेकर्स झुँझला गए और कोर्ट पहुँच गए। कोर्ट ने चुनाव आयोग को बुलाया और कहा कि एक टीम बनाओ और फिल्म देखो। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि फिल्म देखने के बाद बस वाह-वाह न किया जाये बल्कि एक रिपोर्ट भी बनाई जाये और 22 अप्रैल तक कोर्ट को सौंपी जाये।

चुनाव आयोग ने कोर्ट के आदेश के बाद 7 लोगों की टीम बनाई और सबको फिल्म दिखाई। फिल्म देख कर चुनाव आयोग ने रिपोर्ट बना कर इसे कोर्ट को सौंप दिया। पर, चुनाव आयोग ने इस तरह की बातें अपनी रिपोर्ट में लिखी कि कोर्ट का फिल्म को लेकर मूड खराब हो गया। कोर्ट ने फिल्म पर बैन को लगा रहने देने में ही चुनाव और देश की भलाई समझी और फैसला सुना दिया कि बैन लगा रहे। द लल्लनटॉप के हवाले से इस रिपोर्ट के कुछ अंश इस प्रकार हैं जो हमें लगा कि आपको बताया जाये:

”फिल्म की शुरुआत से लेकर आखिर तक नरेंद्र मोदी के किरदार का महिमामंडन साफ तौर पर नज़र आता है. ये किसी आम आदमी की कहानी से ज़्यादा किसी संत की जीवनी सरीखी लग रही है. फिल्म में कई सीन्स ऐसे हैं, जिनमें विरोधी पार्टियों को भ्रष्ट और गलत तरीके से दिखाया गया है. उन पार्टी को नेताओं का चित्रण इस प्रकार से किया गया है कि जनता को उन्हें पहचानने में कोई दिक्कत नहीं आएगी. ‘पीएम नरेंद्र मोदी’ फिल्म ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न करती है, जहां एक आदमी कल्ट स्टेटस पा जाता है. 135 मिनट लंबी ये फिल्म पूरी तरह से एकतरफा लगती है, जो अलग-अलग नारों, सीन्स और चिन्हों की मदद से एक आदमी को ऊंचा दर्जा देती है. व्यक्ति विशेष का महिमामंडन करती है और उसे संत-महात्मा जैसा कुछ साबित कर देती है.”

इस रिपोर्ट के बाद कोर्ट ने बैन को तो बरकरार रखा ही और साथ ही साथ यह भी कहा कि इस फिल्म के रिलीज़ डेट को लेकर चुनाव आयोग ही फैसला ले। कोर्ट का इस फिल्म से कोई लेना-देना नहीं है। इस फैसले के बाद से ही फिल्म की रिलीज़ डेट की घोषणा नहीं हुई थी लेकिन अब जाकर इसकी डेट को सरेआम किया गया है। खैर, जो होना है वो हो के ही रहेगा। फिल्म के साथ जो होना है वो होगा लेकिन एक बात तो तय ही है कि आएगा तो मोदी ही।

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