16 दिसंबर 1971 ,ये तारीख भारत के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखी गयी है, इस दिन भारतीय सेना ने पाकिस्तान के विरुद्ध होने वाला 71 का निर्णायक युद्ध जीता था. देश की रक्षा करते हुए इस युद्ध में भारत माँ के कई वीर सपूतों ने अपनी जान न्योछावर कर दी थी. 37 साल बीत जाने के बाद आज भी इन वीर जवानों के बलिदानों की कहानियाँ हमारे देश में गूँजती हैं. आज की तारीख में बहुत ही कम लोग हैं जिनको 71 की जंग में शहीद हुए योद्धाओं के 10 नाम भी पता होंगे. आज हम आपको भारतीय वायुसेना के एक ऐसे ही जाँबाज योद्धा की कहानी सुनाएँगे जिसने अकेले दम ही पाकिस्तान की वायुसेना को उल्टे पैर भागने पर मजबूर कर दिया था. नाम है फ्लाइंग ऑफिसर निर्मलजीत सिंह सेखों.

फ्लाइंग ऑफिसर निर्मलजीत सिंह सेखों. फोटो सोर्स - गूगल

फ्लाइंग ऑफिसर निर्मलजीत सिंह सेखों. फोटो सोर्स – गूगल

पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध में 14 दिसंबर, 1971 को शहीद हुए निर्मलजीत  को मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था. बता दें कि निर्मलजीत सिंह सेखों भारतीय वायुसेना के अकेले ऐसे जवान हैं जिनको परमवीर चक्र दिया गया है.

जन्म

भारत के जाँबाज योद्धा निर्मलजीत सिंह सेखों का जन्म 17 जुलाई, 1943 को पंजाब राज्य के लुधियाना जिले के अंतर्गत आने वाले छोटे से गाँव इस्वाल दाखा में हुआ था. उनका ये गांव लुधियाना के करीब हलवाड़ा में स्थित भारतीय वायुसेना बेस के करीब था. पिता का नाम तारालोचन सिंह सेखों और माता का नाम हरबंस कौर था. निर्मलजीत के पिता भारतीय वायुसेना में अपनी सेवाएं देते हुए फ्लाइट लेफ्टिनेंट के तौर पर सेवानिवृत्त हुए थे.

वायुसेना बेस के पास गाँव होने के चलते बचपन से ही निर्मलजीत के अंदर विमानों और वायुसेना जीवन को लेकर खास आकर्षण था. इसके अलावा उनको अपने पिता से भी लगातार देशभक्ति की प्रेरणा मिलती रही. इन सब कारणों की वजह से सेखों ने अपने बचपन में ही फ़ैसला कर लिया था कि वो भारतीय वायुसेना (IAF) में शामिल होकर देशसेवा करेंगे.

अपने दोस्त के साथ फ्लाइंग ऑफिसर निर्मलजीत सिंह सेखों. फोटो सोर्स - गूगल

अपने दोस्त के साथ फ्लाइंग ऑफिसर निर्मलजीत सिंह सेखों. फोटो सोर्स – गूगल

निर्मलजीत की शुरुआती पढ़ाई लुधियाना के करीब स्थित खालसा हाई स्कूल अजितसर मोही से हुई. इसके बाद साल 1962 में उन्होंने आगरा स्थित दयालबाग इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन लिया. लेकिन, इंजीनियरिंग की पढ़ाई बीच में छोड़ते हुए निर्मलजीत भारतीय वायुसेना में शामिल होकर अपने सपने को पूरा किया.

वायुसेना कैरियर

4 जून, 1967 निर्मलजीत को भारतीय वायुसेना में औपचारिक रूप से फाइटर पायलट के तौर पर कमीशन किया गया. अपनी ट्रेनिंग पूरी करने के बाद अक्टूबर 1968 में फ्लाइंग अफसर निर्मलजीत की नियुक्ति वायुसेना की 18 नंबर की स्क्वॉड्रन में हुई. भारतीय वायुसेना की इस स्क्वॉड्रन को ‘फ्लाइंग बुलेट्स‘ के नाम से जाना जाता था.

1971 का भारत – पाकिस्तान युद्ध

साल 1971 में भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध शुरू हो गया. पाकिस्तानी वायुसेना (PAF) अमृतसर, पठानकोट और श्रीनगर के महत्वपूर्ण हवाईअड्डों को तबाह करने लिए लगातार हवाई हमले कर रही थी. युद्ध के दौरान ही फ्लाइंग अफसर निर्मलजीत की जीनैट दस्ते में पायलट के तौर पर श्रीनगर में तैनाती की गयी.

पाकिस्तान के साथ युद्ध शुरु होने से पहले श्रीनगर में भारतीय वायु सीमा की रक्षा के लिए भारतीय वायुसेना का कोई लड़ाकू विमान तैनात नहीं था. ऐसा 1948 में हुई अंतर्राष्ट्रीय संधि की वजह से था.

1971 की जंग में पहली बार श्रीनगर में वायुसेना के लड़ाकू विमानों की तैनाती की गयी. ऐसे हालातों में दुश्मनों को जवाब देने के लिए निर्मलजीत के दस्ते  की तैनाती की गयी थी जिनको कश्मीर की भौगोलिक स्थिति से बारे में ज्यादा पता नहीं था. ऊपर से कश्मीर की जमा देने वाली ठंड और सर्द हवा में काम करने की उनकी कोई ट्रेनिंग नहीं हुई थी. श्रीनगर की जलवायु उनके अनुकूल नहीं थी. इतनी विकट  परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अपने दस्ते के साथ पूरी बहादुरी और समझदारी से पाकिस्तानी घुसपैठी विमानों का सामना किया था.

14 दिसंबर, 1971 को श्रीनगर एयरफील्ड में पाकिस्तानी वायुसेना के 26 स्क्वॉड्रन के 6F-86 जेट्स ने हमला किया. उस समय निर्मलजीत फ्लाइट लेफ्टिनेंट बलधीर सिंह घुम्मन के साथ श्रीनगर एयरफील्ड में स्टैंड-बाय-2 ड्यूटी (जिनको लड़ाई के आदेश मिलने पर 2 मिनट के भीतर हवाई जहाज पर पहुँचना होता है) पर तैनात थे. ड्यूटी पर तैनात फ्लाइंग ऑफिसर निर्मलजीत को पाकिस्तानी लड़ाकू विमान को धूल चटाने के लिए दो जीनैट विमान में उड़ान भरनी थी. उनका नेतृत्व फ्लाइट लेफ्टिनेंट घुम्मन करने वाले थे. जब रनवे पर पहला बम गिरा तो रनवे पर धूल और धुआं भर गया जिस कारण वह तुरंत उड़ान नहीं भर पाए.

1971 जंग के दौरान की एक तस्वीर, फोटो सोर्स - गूगल

1971 जंग के दौरान की एक तस्वीर, फोटो सोर्स – गूगल

धुआँ छटने के बाद जब रनवे उड़ान भरने के लिए साफ हुआ तभी एक साथ दुश्मनों के 6 लड़ाकू विमानों की आवाज सुनाई दी जो एयरफील्ड पर बम बरसा रहे थे. इस हमले के बीच निर्मलजीत का उड़ान भरना खतरनाक साबित हो सकता था. लेकिन, परवाह न करते हुए उन्होंने उड़ान भरी और पाकिस्तान के 4 सेबर जेट से अकेले भिड़ गए. निर्मल अपने जेट विमान से दुश्मन विमानों पर फायरिंग करते हुए चक्कर लगाने लगे. तभी कंट्रोल रूम में रेडियो संचार के जरिये निर्मलजीत का एक संदेश आया जिसमें वो कह रहे थे.

“मैं दो सेबर जेट जहाजों के पीछे हूँ…मैं उन्हें जाने नहीं दूँगा…”

इनमें से एक सेबर जेट को निर्मलजीत ने निशाना लगाकर फौरन मार गिराया. वहीं निर्मलजीत ने हमले में दुश्मन के दूसरे विमान को भी काफी नुकसान पहुंचाया था जिसकी वजह से दुश्मन के विमान में आग लग गयी थी.

1971 जंग के दौरान की एक तस्वीर, फोटो सोर्स - गूगल

1971 जंग के दौरान की एक तस्वीर, फोटो सोर्स – गूगल

थोड़ी ही देर में दुश्मन का दूसरा विमान भी जमीन पर आ गिरा. हालांकि, इस हवाई युद्ध के दौरान निर्मलजीत का विमान भी दुश्मन के निशाने पर आ गया. निर्मलजीत के विमान को क्षतिग्रस्त देखकर उनको बेस पर लौटने की सलाह दी गई. लेकिन, किसी कारण कंट्रोल सिस्टम ठीक से काम नही किया और ये मेसेज़ उन तक नहीं पहुंचा. थोड़ी ही देर में निर्मलजीत का विमान गिर गया और वह शहीद हो गए. कुछ देर की शांति के बाद कंट्रोल रूम में फ्लाइंग ऑफिसर निर्मलजीत सिंह सेखों का सन्देश सुना गया जिसमें उन्होंने कहा था –

“शायद मेरा नेट भी निशाने पर आ गया है…घुम्मन, अब तुम मोर्चा संभालो”

यह फ्लाइंग ऑफिसर निर्मलजीत सिंह का अंतिम सन्देश था. अपने काम को पूरी तरह से अंजाम तक पहुंचाने के बाद वह वीरगति को प्राप्त हो गए.

निर्मलजीत सिंह सेखों की याद में बनाई गयी मूर्ति, फोटो सोर्स - गूगल

निर्मलजीत सिंह सेखों की याद में बनाई गयी मूर्ति, फोटो सोर्स – गूगल

लेकिन उनकी ये शहादत बेकार नहीं गई. दो सेबर जेट मार गिराए जाने के बाद से ही दुश्मनों के खेंमे में हड़कंप मच गया था. जिसके बाद श्रीनगर शहर और वायुसेना की एयरफील्ड पर हो रहे दुश्मनों के हमले रुक गये. थोड़ी ही देर में दुश्मन लड़ाकू विमान  एयरफील्ड से भाग खड़े हुए. फ्लाइंग ऑफिसर निर्मलजीत सिंह सेखों ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए दुश्मन के 6 लड़ाकू विमानों का मुकाबला किया था. युद्धक्षेत्र में इस असाधारण वीरता के लिए फ्लाइंग ऑफिसर निर्मलजीत को युद्धकाल के सर्वोच्च वीरता पदक ‘परमवीर चक्र’ से सम्मानित किया गया.

1971 में भारत-पाकिस्तान के बीच लड़ा गया युद्ध कई अर्थों में महत्वपूर्ण माना जाता है . इस युद्ध की शुरुआत ही पाकिस्तान की आंतरिक समस्या से हुई थी. पाकिस्तान का एक हिस्सा पूर्वी पाकिस्तान बांग्ला भाषी क्षेत्र था, जो भारत के विभाजन के बाद पूर्वी बंगाल से पूर्वी पाकिस्तान हो गया था. पाकिस्तान 1971 के युद्ध में भारत से बुरी तरह हारा था इसके अलावा इस युद्ध के बाद पूर्वी पाकिस्तान एक आजाद मुल्क के रूप में स्थापित हो चुका था, जिसका नाम बांग्लादेश पड़ा.