केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि मानव मूत्र से यूरिया बनाया जाना चाहिए। रविवार को नागपुर नगर निगम के मेयर इनोवेशन पुरस्कार कार्यक्रम में कहा कि देश में मूत्र से यदि यूरिया बनाया जाने लगा तो उर्वरक आयात करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। मंत्री ने इस कार्यक्रम को दौरान कहा, “‘मैंने हवाई अड्डों पर मूत्र को एकत्र करने को कहा है। हम यूरिया आयात करते हैं।लेकिन अगर हम पूरे देश में मूत्र इकट्ठा करना प्रारंभ कर दें तो हमें यूरिया के आयात की आवश्यकता ही नहीं होगी। इसमें इतनी क्षमता है और कुछ भी नष्ट नहीं होगा।”

उन्होंने प्राकृतिक कचरे से बायोगैस बनाए जाने का उदाहरण देते हुए कहा कि इसी तरह से हमें मानव मूत्र से उर्वरक बनाए जाने पर काम करना चाहिए।

मोदी सरकार के मंत्रालय में ऐसे भी नितिन गडकरी को सबसे काबिल मंत्री माना जाता है। गडकरी किसी भी मामले में सोच-समझकर और गंभीरता से बयान देते हैं। उनके ज्यादातर बयानों पर मीडिया को फैक्ट चेक करने की जरूरत नहीं होती है। लेकिन केंद्रीय मंत्री गडकरी के यूरिया वाले बयान में हमने फैक्ट चेक करना उचित समझा।

गडकरी ने अपने बयान में दो महत्वपूर्ण बातें कही है-

  • पहली बात यह है कि मानव मूत्र से यूरिया बनाया जा सकता है।
  • दूसरी बात यह है कि मूत्र से यूरिया बनाया जाना संभव हुआ तो उर्वरक का आयात नहीं करना होगा।

इन दोनों ही बातों को हमने सोशल मीडिया और कुछ विशेषज्ञों के जरिये जानने का प्रयास किया। सबसे पहले हमने इंटरनेट पर सर्च करके पता किया कि क्या सच में मानव मूत्र से यूरिया का निर्माण किया जा सकता है। हमने ‘डीडब्लू.कॉम’ नाम की एक वेबसाइट पर पाया कि बेल्जियम के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी मशीन बना ली है जो मानव-मूत्र को पेयजल में बदल सकती है।

इसके अलावा इस प्रक्रिया में उर्वरक भी बनते हैं जो कि विकासशील देशों के लिए बहुत उपयोगी है। इसके अलावा हमने दैनिक जागरण की एक ख़बर में यह भी देखा कि बिहार में ‘समता’ नाम की एक संस्था के द्वारा मानव मूत्र ‘इको फ्रेंडली खाद’ बनाया जा रहा है। इस तरह हमारी फ़ैक्ट चेक टीम ने पाया कि गडकरी का यह कहना कि मूत्र से उर्वरक बनता है बिल्कुल सही है।

मानव मूत्र में मौजूद रसायन की मदद से उर्वरक के अलावा कीटनाशक भी बनाया जा सकता है

इसके बाद हमने किसी रिपोर्ट पर भरोसा करने के बजाय कृषि विज्ञान केंद्र, खगड़िया के समन्वयक डॉ. ब्रजेंदु कुमार से फोन के माध्यम से संपर्क किया। डॉ. ब्रजेंदु कुमार कहते हैं कि मूत्र में यूरिया, नाइट्रोजन, सोडियम, क्लोराइड, पोटेशियम, फॉस्फेट, अमोनिया के अलावा बहुत सारे तत्व होते हैं।

इनसे फसल उत्पादन बढ़ना तय है। डॉ साहब का यह भी कहना है कि मूत्र से उर्वरक बनाया जा सकता है। लेकिन दूसरा सवाल पूछते ही वो ज्यादा डीटेल के लिए बाद में बात करने के लिए कहते हैं। हलांकि, इससे यह साबित हो गया कि मूत्र से देश में उर्वरक बनाया जा सकता है। लेकिन इसके साथ ही गडकरी का यह कहना कि मूत्र से यूरिया बनाए जाने पर खाद आयात करने की जरूरत नहीं होगी, जितना मज़बूती से गडकरी ने यह बात कही उतना आसान नहीं है।

dw.com वेबसाइट का स्क्रीनशॉट

दरअसल, इसकी सबसे बड़ी वज़ह यह है कि इतनी मात्रा में मूत्र को संग्रहित करके उर्वरक में बदल पाना मुश्किल होगा। यदि देश भर में नई तकनीक के जरिये मूत्र को संग्रहित करके यूरिया में बदल भी दिया जाने लगा फिर भी इतनी मात्रा में उर्वरक बना पाना संभव नहीं होगा कि विदेश से उर्वरक को आयात करने की जरूरत ही नहीं पड़े।

ऐसा इसलिए क्योंकि 26 नवंबर के एनबीटी की एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल देश के कुछ कारखानों को मरम्मत किए जाने की वज़ह से बंद किया गया। इस वज़ह से यूरिया उत्पादन मौजूदा वित्त वर्ष में 3,00,000 टन घटकर 2.41 करोड़ टन रहने का अनुमान बताया गया। यही वज़ह थी कि इस साल देश में यूरिया की कमी हो गई। इसके बाद राजस्थान व मध्य प्रदेश में किसानों ने हिंसक रूप से सड़क पर उतरकर अपना विरोध जाताया था।

अपने देश में यूरिया की सलाना मांग लगभग 3.2 करोड़ टन है, लेकिन यूरिया के इस सलाना मांग के हिसाब से देश में उर्वरक निर्माण नहीं हो पा रहा है। यही वज़ह है कि बड़े पैमाने पर विदेश से यूरिया को आयात करना होता है। ऐसे में मानव मूत्र से इतनी मात्रा में यूरिया तैयार करना तभी संभव है जब किसान केमिकल उर्वरक की बजाय जैविक उर्वरक यूज करे।

इस तरह गडकरी के बयान पर फैक्ट चेक में हमने पाया कि मूत्र से यूरिया तो बनाया जा सकता है, लेकिन इतनी ज्यादा मात्रा में नहीं कि मूत्र से उर्वरक बनाकर हमें उर्वरक आयात करने की जरूरत ही नहीं पड़े।

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