पहले शब्द हुए ‘मर्द’ और ‘औरत’, फिर शब्द आया ‘मर्दानगी’। इस श्रेणी में औरतों के लिए कोई शब्द नहीं आया।
अब जो मर्द उन मर्दों जैसे नहीं थे जो खुद को प्रचलित मर्दानगी के पैमाने (शारीरिक रूप से ताकतवर और मनोवैज्ञानिक रूप से भी मज़बूत) में फिट नहीं पाते थे, उन्हें ‘नामर्द’ कहा गया।

इन लोगों को मर्दों से नीचा दिखाने के लिए औरत की श्रेणी में रखा गया। यानी वो पुरुष जो मर्दों की प्रचलित परिभाषा पर खरे नहीं उतरते वो मर्दों से नीचे हैं और औरतों के बराबर हैं। अब एक शब्द आया ‘मर्दानी’। मर्दानी यानी वो औरत जिसमें मर्दों के तथाकथित गुण हों। यानी जो मानसिक, शारीरिक या दोनों रूप से (मर्दों के जैसे) मज़बूत हो।

प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स- गूगल

भाषा समाज बनाता है, और समय के साथ भाषा का विकास होता है। मगर ये तभी संभव है जब समाज अपने ज्ञान के साथ-साथ अपनी सोच का भी निरंतर विकास करता रहे। सुभद्राकुमारी चौहान जी की कविता में भी झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के लिए ‘मर्दानी’ शब्द का प्रयोग हुआ है जिसका अर्थ है ‘मर्दों जैसी’, यहाँ भी झांसी की रानी की बहादुरी और बलिदान की बात उन्हें मर्दों की श्रेणी में डाल कर ही कही गयी है। ये सिर्फ औरतों के लिए ही नहीं बल्कि मर्दों की लिए भी एक बहुत निराशाजनक बात है।

“खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी”

इन सब बातों में औरत कभी ऊपर आई ही नहीं, अगर वो आई तो वो मर्द जैसी हो गयी, यानी उसकी खुद की पहचान वहीं ख़त्म हो गयी जब उसने अपने देश, अपनी ज़मीन, अपने लोगों की आज़ादी के लिए तलवार उठाई और सभी जिम्मेदारियों को निभाते हुए विद्रोह में उतरी।

मेरे एक अज़ीज़ दोस्त तस्नीफ़ हैदर ने पिछले दिनों फेसबुक पर एक लेख लिखा जिसमें उन्होंने बताया कि काफ़ी रिसर्च के बाद उन्हें मालूम हुआ कि उर्दू भाषा में कोई ऐसा शब्द ही नहीं है जिसका इस्तेमाल बिना गाली दिए या बेइज्जती किए, किसी LGBTQ+ जेंडर के शख्स को एड्रेस करने के लिए किया जा सके।

फोटो सोर्स- गूगल

उर्दू का एक प्रचलित शब्द है ‘हिज़ड़ा’। हिज़ड़ा शब्द उर्दू में ‘हिज़’ और ‘ड़ा’ से मिल कर बना है, हिज़ का अर्थ है ‘औरत जैसा’ और ‘ड़ा’ अमूमन किसी को गाली देने या बेइज़्ज़ती करके नीचा दिखाने के लिए के लिए इस्तेमाल होता है। (जैसे-कस्साबड़ा)

हिन्दी में आयें तो ‘छक्का’, ‘किन्नर’ और ‘शिखंडी’ जैसे शब्द सुनने को मिलते हैं। अमूमन लोग ये समझते हैं कि किन्नर शब्द बोलाने में कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन ऐसा नहीं है। किन्नर शब्द मूलतः हिमाचल प्रदेश के ‘किन्नौर’ जिले में रहने वाले लोगों के लिए इस्तेमाल किया जाता है, यानि यहाँ भी तीसरे लिंग को भाषा से निराश होकर लौटना पड़ गया। ‘शिखंडी’ शब्द की बात करें तो वहाँ भी शिखंडी महाभारत का एक पात्र था। अब क्योंकि शिखंडी तीसरे लिंग का था इसी लिए हमारे समाज ने हर तीसरे लिंग को शिखंडी की संज्ञा दे दी, ये बात आप अगर सोचेंगे तो समझ आएगा कि यहाँ भी तीसरे लिंग के लोगों के पास खुद की पहचान के लिए कोई शब्द नहीं मिला, यहाँ भी उन्हें किसी और के नाम का सहारा लेना पड़ा।

इन सब के बाद हिन्दी भाषा में एक शब्द है जो तीसरे लिंग की साफ-सुथरी पहचान है, वो शब्द है ‘उभयलिंगी’। लेकिन उभयलिंगी शब्द के साथ दिक्कत ये है कि आम बोलचाल में ये शब्द न के बराबर इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा उभयलिंगी शब्द का एक्चुअल मतलब एक तरीके से बाईसेक्सुअल लोगों के लिए होता है. रोज़मर्रा की बातों में हमारा समाज इस तीसरे लिंग के लोगों के लिए ‘छक्का’ और ‘किन्नर’ ही इस्तेमाल करता है।

तो अब दोष किसे दिया जाये? भाषा को? साहित्यकारों को? इतिहास को? या अपने आप को?

फोटो सोर्स- गूगल

दो दशक से ज़्यादा कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद आखिरकार भारतीय न्यायालय से समलैंगिक और तीसरे लिंग के लोगों को अच्छी खबर सुनने को मिली, जब अंग्रेज़ो के शासन के वक़्त बनी धारा 377 को हटा दिया गया और समलैंगिक रिश्तों को कानूनी रूप से हरी झंडी दे दी गयी। लेकिन इस बात से हम मुँह नहीं मोड़ सकते की समलैंगिकता और तीसरे लिंग को हमारा समाज आज भी एक भद्दी नज़र से देखता है, और खुद से अलग मानता है। हाल ही में भारतीय महिला खिलाड़ी दूती चंद ने बताया कि वो समलैंगिक हैं। उनके इस खुलासे के बाद न सिर्फ़ उन्हें समाज के एक हिस्से से भद्दी-भद्दी बातें सुनने को मिली, बल्कि उनके परिवार की तरफ से भी उन्हें धमकियों का सामना करना पड़ा।

इन सभी बातों को हम अगर इकट्ठा करेंगे तो ये समझ में आता है कि चाहे वो भाषा की बात हो, या कानून की; हर जगह अगर किसी लिंग को शोषण का सामना करना पड़ रहा है तो उसके जिम्मेदार हम सब ही हैं। हमें अपने रीति रिवाजों, और मानसिकता में एक बड़े बदलाव की ज़रूरत है। साथ ही भाषाविज्ञों और साहित्यकारों की भी ज़िम्मेदारी है कि वो शब्दकोश में ऐसे शब्द शामिल करें जिनसे किसी तीसरे लिंग के व्यक्ति को पहचान मिल सके और हमारी रोज़मर्रा की भाषा की सफाई हो सके।

आप सोचिए की एक सामाजिक ढांचा जिसमें हर एक वर्ग, तबका, लिंग खुद को सर्वोपरि साबित करने में लगा रहता है, जिस समाज के एक हिस्से की खुद की पहचान ही नहीं है, वो कितने वक़्त तक टिका रहेगा? सोचिए, और कोशिश करिए की जो गलतियाँ आपके पहले की पुश्तों ने की हैं उन्हें सही किया जाये और इंसानियत की नींव पर एक नए समाज की इमारत खड़ी की जा सके।

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