8 जुलाई 2016 के दिन सुरक्षा बलों ने कश्मीर के त्राल इलाके में आतंकी बुरहान वानी को मार गिराया था. तब से 8 जुलाई का दिन घाटी के लिए कुछ अलग मायने रखता है. अलगाववादी नेता 8 जुलाई को आतंकी बुरहान वानी की शहादत दिवस के रूप में मानते आये है. वहीं दूसरी तरफ नापाक पाकिस्तान आतंकी बुरहान वानी को मसीहा बताकर घाटी में आतंकवाद की आग को जलाये रखना चाहता है. पिछले एक साल में पाकिस्तानी आतंकी सगठनों ने सोशल मीडिया और फिल्मों के जरिए बुरहान वानी को कश्मीर की आजादी के लिए शहादत देने वाले हीरो के तौर पर पेश किया है.

प्रतीकात्मक तस्वीर , फोटो सोर्स- गूगल

पिछले तीन सालों से लगातार कश्मीरी नौजवान अलगाववादियों के बहकावे में आकर 8 जुलाई के दिन कश्मीर के अलग-अलग इलाकों में इकट्ठा होकर सेना और भारत के खिलाफ नारेबाजी करते हुए पत्थरबाजी करते थे. लेकिन इस बार कश्मीर में ऐसी कोई अप्रिय घटना नहीं घटी.

प्रतीकात्मक तस्वीर , फोटो सोर्स – गूगल

इस बार की 8 जुलाई घाटी के लिए अच्छे दिनों के संकेत लेकर आई है. जिन इलाको में हर साल हिंसा और उपद्रव हुआ करता था इस बार 8 जुलाई को उन इलाको में शांति छाई रही. यहाँ तक की बुरहान वानी कश्मीर के जिस त्राल इलाके से आता था वहाँ भी कोई घटना नहीं घटी है.

अब सवाल ये है कि इस साल घाटी में आखिर ऐसा क्या हुआ जिसकी वजह से कश्मीर के हालत बदले हुये नजर आ रहे है.

सबसे पहली वजह है, स्थानीय लोगों का आतंकवादियों के लिए बदला हुआ नजरिया। धीरे-धीरे ही सही पर अब आतंकवादियों को लेकर स्थानीय कश्मीरियों की मानसिकता में बदलाव आ रहा है. पहले जहां मारे गए आतंकियों के जनाजे में भारी तदात में कश्मीरी युवा शामिल हुआ करते थे. वहीं इस साल मारे गए आतंकियों के जनाजे में लोगों की भीड़ में कमी आई है. यहाँ तक कि इस साल मारे गए आतंकियों के घरो में स्थानीय लोगों का आना-जाना लगभग बंद हो गया है.

प्रतीकात्मक तस्वीर , फोटो सोर्स – गूगल

कश्मीर में बदले हुए हालातों की जो दूसरी वजह सामने आई है वो ये है कि 8 जुलाई के दिन सीमा पार के आतंकी संगठन कश्मीरियों को जिहाद और पैसे के बल पर बरगलाने की कोशिश किया करते थे. लेकिन इस बार कश्मीर की जनता इनके बहकावे में नहीं आई.

प्रतीकात्मक तस्वीर , फोटो सोर्स – गूगल

बुरहान वानी की मौत के बाद पिछले तीन सालों से 8 से 10 जुलाई के बीच दक्षिण कश्मीर में जो हिंसा का दौर चला था वो 90 के दशक के कश्मीर के हालातों की याद दिलाता था.

अब बात करते है दक्षिण कश्मीर के त्राल इलाके की जिसे बुरहान वानी का गढ़ माना जाता था
प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स: गूगल
प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स: गूगल

बुरहान वानी त्राल का रहने वाला था. बुरहान वानी का परिवार आज भी त्राल में ही रहता है. उसकी कब्र भी इसी इलाके में बनाई गयी है. इन सबके बावजुद इस साल त्राल में एक भी घटना नहीं घटी. जो अपने आप में कश्मीर के सुधरते हुये हालातों की गवाही दे रहा है.

त्राल जैसी शांति दक्षिण कश्मीर के बाकी जिलों की भी रही. पुलवामा , अवन्तीपुरा, शोपियाँ, पांपोर और अनंतनाग जैसे जिले जिनकी गिनती कश्मीर के सबसे अशांत इलाको में की जाती हैं. इस बार ये इलाके सबसे शांत रहे. न कोई पत्थरबाजी न ही सुरक्षाबलों के खिलाफ़ कोई नारेबाजी.

हलांकी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुये इन इलाकों में सुरक्षाबलों की तैनाती की गई थी. जिस कारण शहरी इलाको के बाजार बंद रहे लेकिन कस्बो और ग्रामीण इलाको की दुकाने खुली रही. लोगों की आवाजाही बनी रही.

पिछले तीन सालों में बुरहान वानी की बरसी के दिन हुई घटनाओं का आकलन करते हैं.

2017 में 8 से 10 जुलाई के बीच दक्षिण-कश्मीर के त्राल इलाके में पत्थरबाजी की 35 घटनाएं हुई थी. कई जगहों पर  सुरक्षाबलों की चौकियों और बेस कैंपों को भी निशाना बनाया गया था. वहीं 2018 में बुरहान वानी के बरसी के दिन कश्मीर के कई इलाकों में घटनाएं घटी लेकिन 2017 के तुलना में काफी कमी आई। इस बार दक्षिण-कश्मीर में पत्थरबाजी की सिर्फ 20 घटनाएं दर्ज हुई. सबसे अहम बात इस साल तो कश्मीर में ऐसा कुछ हुआ जो इससे पहले कभी नहीं हुआ था.

बुरहान वानी की जनाजे की एक तस्वीर, फोटो सोर्स – गूगल

बुरहान वानी की बरसी के दिन पाकिस्तान कश्मीर में अशांति फैलाने, उपद्रव मचाने और पत्थरबाजी कराने के लिए कश्मीरी युवाओ को बहकाने की कोशिश करता आया है, लेकिन इस साल नापाक पाकिस्तान की कोई भी चाल कश्मीर की जनता पर अपना प्रभाव नहीं छोड़ पायी.

कश्मीर के बदलते हालात , फोटो सोर्स – गूगल 

बीते 8 जुलाई के दिन कश्मीर की आम जनता का सड़कों पर न उतरना इस बात की तरफ इशारा करता है कि इस बार अलगाववादियों और पाकिस्तान का कश्मीर की शांति भंग करने का कोई पैतरा काम नहीं कर पाया है.

अब कश्मीर में तैनात भारतीय सुरक्षाबलों ,स्थानीय प्रशासन और सरकार के सामने कई चुनौतियां है. पहली ये कि आखिर किस तरह पाकिस्तान परस्त ताकतों के प्रभाव कश्मीर से खत्म किया जाए? दूसरी चुनौती होगी कश्मीर को विकास की मुख्य धारा के साथ जोड़ने की.

आपको बताते चले कि अलगाववादी नेताओं ने बीते 8 जुलाई को बुरहान वानी की शहादत को याद करने के लिए कश्मीर बंद का अवाहन किया था. एहतियादान सेना और प्रशासन ने घाटी की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए थे. दक्षिण-कश्मीर के अंतर्गत आने वाले अनंतनाग, पुलवामा, कुलगाम और शोपियां जिलों में इंटरनेट पर रोक लगा दी गयी है. वहीं एक दिन के लिए अमरनाथ यात्रा को भी स्थगित किया गया था.

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