जब भी मुस्लिम महिलाओं के मौलिक अधिकारों की बात होती है तो तीन तलाक़ पर सबसे ज़्यादा बहस होती है। तीन तलाक़ या ‘तलाक़-ए-बिद्दत’ एक ऐसी प्रथा है जिसने मुस्लिम समाज में महिलाओं के साथ बहुत अन्याय किया है और जिसके खिलाफ़ महिलाएं सालों से आवाज़ उठाती आ रही हैं। आज हम इसी तीन तलाक़ से जुड़े एक मामले के बारे में आपको बताएंगे और साथ ही ये समझने की कोशिश करेंगे कि असल में तीन तलाक़ है क्या और किस तरह से इसने मुस्लिम महिलाओं के साथ धार्मिक प्रथा के नाम पर एक लंबे वक़्त से शोषण किया है।

प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स- गूगल

ग्रेटर नोएडा के दादरी थाना क्षेत्र से तीन तलाक़ से जुड़ा एक मामला सामने आया है। दर्ज़ कराई गई FIR के अनुसार, ज़ायनाब नाम की एक औरत ने जब अपने शौहर साबिर से सब्जी खरीदने के लिए 30 रुपए मांगे तो साबिर ने उसे बेरहमी से मारा और 3 बार तलाक़ बोल कर उसे तलाक़ दे दिया। ज़ायनाब ने पुलिस को ये भी बताया की इसके पहले भी साबिर, साबिर की माँ नज्जो और बहन शमा उसके साथ बुरा सलूक और मार पीट करते रहे हैं। ज़ायनाब के पिता ने भी बताया कि पहले भी साबिर ने ज़ायनाब के सर पर डंडे से मारा था जिसके बाद ज़ायनाब काफी चोटिल हो गयी थी।

पुलिस ने साबिर, नज्जो और शमा के खिलाफ़ IPC की धारा 498A, 504 और 506 के तहत FIR दर्ज कर ली है और साबिर को गिरफ्तार कर कर लिया गया है। शमा और नज्जो की तलाश अभी भी जारी है।

पिछले कई सालों से तीन तलाक़ को लेकर हमारे देश में एक लंबी बहस चलती आई है जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक घोषित करते हुए कहा कि ये मुस्लिम महिलाओं के मौलिक अधिकारों का हनन है। कोर्ट के इस डिसीज़न के बाद जनता की अलग-अलग तरह की प्रतिक्रिया देखने को मिली। कुछ ने इस डिसीजन को मुस्लिम समुदाय के अधिकारों के खिलाफ़ कहा और कुछ ने कोर्ट ने इस निर्णय का स्वागत किया।

तीन तलाक के खिलाफ प्रदर्शन, इमेज सोर्स- गूगल

इस डिसीजन के बाद कोर्ट ने सरकार को तीन तलाक़ के खिलाफ़ कानून लाने के लिए 6 महीने का वक़्त दिया, जिसके बाद सरकार ने लोक सभा से तीन तलाक़ बिल पारित कर दिया, लेकिन अफसोस राज्य सभा में ये पारित नहीं हुआ और 6 महीने का वक़्त खत्म हो गया।

इसी साल के जून महीने में केन्द्रीय मंत्री प्रकाश जावडेकर ने ये घोषणा की है की सरकार दोबारा से एक दूसरा तीन तलाक़ बिल संसद में पेश करेगी जो तीन-तलाक़ को एक कानूनन जुर्म की कैटेगरी में ले आएगा और इसका उल्लंघन करने वालों को 3 साल की सज़ा का प्रावधान होगा।

कोर्ट द्वारा दिये गए 6 महीने के वक़्त में भी तीन तलाक़ बिल संसद से पास न करवा पाने के लिए सरकार की आलोचना हो रही है और होनी भी चाहिए। अगर सरकार तीन-तलाक़ के मामले को लेकर संजीदा रवैया रखी होती तो शायद तीन तलाक़ जैसी असामाजिक प्रथा बहुत पहले ही खत्म हो जाती।

सुप्रीम कोर्ट, इमेज सोर्स- गूगल

कोर्ट के फैसले के बाद मुस्लिम समाज से बहुतायत में उठे विरोध को देखा गया। ये विरोध कौन कर रहा था? क्या वो महिलाएं जिन्हें एक लंबे वक़्त से नैतिक न्याय नहीं मिला वो इसका विरोध करेंगी? या वो मर्द जिन्हें ये लगने लगा कि औरतों की ज़िंदगी में धर्म द्वारा दिया गया अपर हैंड उनसे छिन जाएगा।

तीन तलाक़ के मामलों में अक्सर देखा गया है की मर्द किसी छोटी-सी बात के लिए औरत को तलाक़ दे देते हैं और फिर औरत को सामाजिक, आर्थिक और तमाम दिक्कतों से जूझना पड़ता है। ज़ायनाब के मामले में सब्जी के लिए मांगे गए 30 रुपए तलाक़ का कारण बने, किसी मामले में दाल में पड़ा ज़्यादा नमक तलाक़ का कारण बनता है, किसी मामले में सेक्स न करना वगैरह-वगैरह।

तीन तलाक(प्रतिकात्मक तस्वीर), इमेज सोर्स- गूगल

इन सारी बातों को अगर एक साथ रखकर इसके पीछे के कारण को समझने की कोशिश की जाये कि कोई मर्द खुद को ऐसी कौन-सी सत्ता पर पाता है कि वो मामूली से कारणों के लिए अपनी बीवी से कुछ पल में एक शब्द तीन बार बोलकर शादी तोड़ देता है? जवाब आएगा धर्म में मौजूद पितृसत्ता। इस पितृसत्ता को जब धर्म में जोड़ दिया गया तो ईश्वर के डर से औरतों ने आवाज़ भी नहीं उठाई और एक लंबे वक़्त में इसे बिलकुल नॉर्मलाइज़ कर दिया गया। लेकिन अच्छी बात ये हुई की वक़्त के साथ-साथ मुस्लिम समुदाय की महिलाओं ने एक जुट होकर इसके खिलाफ़ आवाज़ उठाना शुरू कर दिया है। अब पूरी दुनिया का ध्यान इस मुद्दे की ओर आ गया है जिसकी वजह से अब बदलाव होने भी शुरु हो गए हैं।

जब कोर्ट ने तीन तलाक़ को असंवैधानिक घोषित किया तो मर्दों के साथ-साथ औरतों का भी एक हिस्सा इस डिसीजन के खिलाफ़ प्रदर्शन में उतरा। इसके पीछे के कारण को भी हमें समझना पड़ेगा कि ऐसा क्या है कि एक ऐसा बदलाव जिसका फायदा मुस्लिम समाज की औरतों को ही होगा उसके खिलाफ़ मुस्लिम समाज की ही कुछ औरतें विरोध में उतर आईं।

इमेज सोर्स- नेशनल हेराल्ड

इसके पीछे का कारण है अंध भक्ति। जब धर्म या कोई भी चीज़ हमारे ऊपर एक हद से ज़्यादा हावी हो जाता है तो वो हमारे विवेक को धीरे-धीरे दीमक की तरह खत्म करने लगती है। हम सही-गलत में मॉरल तरीके से अंतर करने में विफल  होने लगते हैं और ये धारणा बना लेते हैं कि जो कुछ भी हमारे धर्म के हिसाब से सही है वही एक मात्र सत्य है।

एक लोकतांत्रिक देश में जहां सभी धर्मों को बराबरी का स्थान दिया गया है, वहाँ किसी एक धर्म का ये मांग करना कि हमें सामाजिक मुद्दों पर अपने धर्म के हिसाब से निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र किया जाये बेहद अजीब और ऐबसर्ड बात है।

धर्म द्वारा मर्द को मिली बेबुनियाद ताक़त ही कारण है कि साबिर ने ज़ायनाब को 30 रुपए के लिए पहले बुरी तरह पीटा उसके बाद उसे कुछ पलों में तलाक़ दे दिया। ये वही बेबुनियाद और झूठी ताक़त है जिसके कारण मर्द औरतों को आज भी घर से निकल कर नौकरी करने की बात पर भौहें सिकोड़ने लगता है। ये वही ताक़त है जिसके नशे में किसी मॉडल या किसी भी लड़की को सोशल मीडिया पर बिकनी या मॉडर्न कपड़े पहनने के लिए भद्दे शब्द सुनने को मिलते हैं।

तीन तलाक़ आज एक बहुत बड़ा मुद्दा है। इसके कानूनन जुर्म घोषित होने के साथ एक और बात जो बेहद ज़रूरी है वो ये कि मुस्लिम समाज के मर्द और औरतें ये बात समझें कि ये कितनी घटिया प्रथा है और इसे समाज के साथ-साथ अपनी सोच से निकाल फेंकना भी कितना ज़रूरी है।

हम उम्मीद करते हैं कि सरकार जल्द से जल्द तीन तलाक़ जैसी घटिया प्रथा को जुर्म घोषित करे ताकि दोबारा किसी शायरा बानो या ज़ायनाब को ऐसी परिस्थितियों का सामना न करना पड़े और साबिर जैसे लोगों को उनके गुनाहों की सज़ा देना और भी आसान हो जाये।