एक आवाज जो कानों में गूँजते हीं भरोसे की पतली लकीर खींच जाती है। बोलना एक कला है। आपके बोलने पर हीं निर्भर करता है कि सामने वाला आपके साथ किस तरह से डील करता है। बोलते तो सभी हैं पर कुछ लोगों का बोलना कानों में चुभ जाता है। उनकी बोली से मन खराब हो जाता है। ऐसे लोगों को चुप रहना चाहिए। तब तक चुप रहना चाहिए जब तक सुनने वालों में से कोई आखरी इंसान बचा हो। अपने बोलने से आप किसी को बरगला सकते हैं या तो सच बता सकते हैं पर आज के संदर्भ में बोल कर बरगलना ज्यादा आसान है। किसी को किसी से कोई मतलब नहीं।

अभिव्यक्ति की आजादी है तो बोलने के बजाय गालियां हीं दे दी जाए तो ज्यादा बेहतर होगा। बेहतर होगा आपके लिए, जिसे आप गालियां देंगे उसके लिए, इस समाज के लिए, संसार के लिए, ब्रह्मांड के लिए। आप जब गालियां दे रहे होंगे तो सभी आपको एक-टक देख रहे होंगे। वो आपके इस शानदार उपलब्धि के लिए आपको भगवान का दर्जा दे चुके होंगे। आपके पास एक माध्यम होगा जिसके जरिये आप रोज किसी न किसी को गालियां देंगे। आपके सारे शब्द खत्म हो जाएंगे। आप ग्लानि से भर जाएंगे। आप सिर्फ गालियां देंगे।

बिहार के मोतीहारी से आने वाले पत्रकार रवीश कुमार ने जब पहली बार दिल्ली देखा होगा तो चौक तो गया हीं होगा। उसने सोचा होगा कि इन बड़े इमारतों में इंसान रहते हैं या यहीं कहीं स्वर्ग और नर्क वाला सिस्टम फिट है? उसने इसे किसी जन्नत से कम न सोचा होगा। उसे अपने गाँव की याद आती होगी। वो अपने घर जाना चाहता होगा लेकीन, कुछ था जिसने उसे रोक दिया। वह बोलता बहुत अच्छा था। वह सच बोलता था। उसने आकाओं की भाषा को दरकिनार कर आम आदमी की भाषा को चुना था। वो वही बोलता था। उसे जो दिखता था, सच लगता था वह बोल देता था। उसने आज बोलना नहीं सीखा, वह बहुत पहले से हीं अच्छा बोलता था।

आज के ‘पत्तलकार‘ अपने आका के सामने या उसके पीठ पीछे कुछ नहीं बोल पाते, उन्होने अपनी रीढ़ उसके हाथों गिरवी रख दी है। ये ‘पत्तलकार‘ पूछते हैं कि रवीश कुमार 2014 से पहले कुछ क्यों नहीं बोलते थे? ये पूछने वाले पत्तलकार निरा बेवकूफ़ हैं। क्योंकि उन्होने रवीश कुमार को देखा है, रवीश कुमार को बनते नहीं देख है। उनकी आँखों पर ‘झूठियाबिंद‘ हो गया है। रवीश कुमार वो है जो पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से भी सवाल करता था और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी सवाल करता है पर, दोनों में समानता क्या है कि न वहाँ से कोई जवाब आता था और न यहाँ से कोई जवाब आता है।

क्या हमारे प्रधानमंत्री भी कमजोर हैं?

वो इस मुद्दे पर भी बोलता है। वो प्रधानमंत्री और बाकी नेताओं द्वारा शेर-ओ-शायरी करने पर भी कुछ कहता है। वह जब बिहार जाता है तो वहाँ के हालातों पर भी बोलता है। वह सब कुछ आज के समय में नहीं हो रहा था। वो समय मनमोहन का था। वो समय मोदी का नहीं था।

बिहार कितना बदला और वहाँ कितना कुछ वैसा हीं रह गया।

वो तब भी पूछता था कि मनमोहन कितने सफल हुए? उन्होने अपना काम पूरा किया या नहीं? उसे फर्क पड़ता था। जब मनमोहन सिंह के कार्यकाल में कुत्ता मरा तब भी उसने सवाल उठाया था। उसने पूछा था कि यह कुत्ता कुछ दिन और जिंदा रहता तो शायद अपने नए मालिक के लिए पूंछ हिलाता। क्या यह आपको मंजूर नहीं था?

क्या सोनिया मैडम ने आपको इसकी इजाजत नहीं दी थी? उसने कहा था कि इसके पिल्लों का अब क्या होगा? पिल्ले बड़े होंगे तो नए मालिक आ चुके होंगे। वो वहाँ दुम हिलाएँगे। नया मालिक रोटी फेकेगा तो वो लपक कर उसे पकड़ने की कोशिश करेंगे। उसने कहा था कि उस दौर में ये पिल्ले किसी को भी काट लेंगे। इनका मुंह हमेशा खुला रहेगा। इनके मुंह से हमेशा लार टपकता रहेगा।

मनमोहन को कितने नंबर

आप भूल रहे हैं कि जब 2013 का आम बजट आया तब भी उसने यह सवाल उठाया कि क्या यह बजट 2014 के आम चुनावों को ध्यान में रखते हुए बनाया गया है? उस बजट को ‘रिझाने वाला बजट‘ भी कहा।

यह अब भी होता है और तब भी होता था। कुछ भी बदला नहीं है। बदला है तो कुछ लोगों का नजरिया। इस नजरिए में यह इतना बड़ा बदलाव क्यूँ आया है? ऐसी क्या बात हुई जिसके बदले फेक न्यूज़ फैलाने के मामले में आगे रहने वाले वेबसाइट ऑप इंडिया के संपादक अजीत भारती कहते हैं कि मोदी राज में यदि कुत्ता भी मर जाए तो ये रवीश कहेगा कि मोदी राज में हीं कुत्ता क्यों मरा?

अजीत भारती का वीडियो बेहद शर्मनाक और कुंठा से ग्रसित मालूम होता है। आप एक छोर पर रवीश को वरिष्ठ भी कहते हैं और दूसरे छोर पर गालियां देते हैं। आप कहते हैं कि वो पत्रकार हैं, शब्दों से खेलना जानते हैं। आप भी उसी पत्रकार धर्म को निभाते हुए शब्दों से खेल जाते तो कोई आपत्ति नहीं थी। लेकिन मालिक, आप जिस तरह के शब्दों से खेलते हैं उसे देखकर आपको और इस ‘पत्तलकार समाज’ को शर्म से डूब जाना चाहिए।

ऑप इंडिया वेबसाइट का स्क्रीनशॉट

आपके सुनहरे शब्दों का पत्रकारिता पर खूब अहसान रहेगा साहब। आप किस भाषा के ‘पत्तलकार’ हैं?

इस आर्टिकल में प्रयोग किए गए शब्दों पर गौर कीजिए।

ये क्रांतिकारी शब्द हैं। सालों बाद जब ‘पत्तलकारिता’ पढ़ाई जाएगी तो इन शब्दों को अलग से पढ़ाया जाएगा। क्योंकि इन शब्दों का पत्रकारिता में कोई जगह नहीं है।

इस आर्टिकल में सबसे पहले मुझे कैटेगरी दिखे और यह गौर करने लायक भी है।

विचार- विचार शब्दों से आता है। आपके शब्द हीं जब दया के पात्र हैं तो विचारों से क्या हीं उम्मीद की जा सकती है। पत्रकारिता में आपको समझाया गया होगा कि व्यंग और फूहड़ता में एक पतली सी लकीर है। आपने उस लकीर को अपने मुंह पर खींच लिया है। अब आप आजाद हैं।

राजनैतिक मुद्दे- जिस मुद्दे की शुरुआत हीं गधे के लिंग से हो उस मुद्दे को कहाँ तक समझा और समझाया जा सकता है? इसलिए इस पर बात करना ही बेकार है।

राष्ट्रीय सुरक्षा- अब तो बस चुप रहना हीं ज्यादा उचित है। भाई आपके गालियों से देश बचने लगे तो फिर सीमा पर इतने सैनिक और गोले बारूद खामखा हीं बर्बाद किए जा रहे हैं। गरियाओ पाकिस्तान को ऐसे हीं मर जाएगा।

आप कहते हैं कि रवीश के पास खूब अनुभव है। यदि आप इस बात को समझते हैं तो उनके अनुभव से हीं सुषमा स्वराज वाले एपिसोड को समझने का प्रयास करते न कि अपने विवेक से। सभी इस बात को भली-भांती जानते हैं कि यह मोदी युग है पर किसी भी युग में इंसान को अपना अस्तित्व और अपनी पहचान तो गिरवी नहीं हीं रखनी चाहिए। भगवान सदबुद्धी दे।

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