फेसबुक पर टहलते हुए हमें एक वीडियो मिला जो कि काफी इम्प्रेसिव वीडियो था तो सोचा कि क्यों न उस वीडियो का रिव्यु किया जाए. वीडियो है ऑप इंडिया वेबसाइट का, और वीडियो में आपको ऑप इंडिया के संपादक नज़र आयेंगे. तबरेज़ अंसारी की लिंचिंग वाली खबर पर ऑप इंडिया ने एक सीरीज चलाई है. यह उस सीरीज का पहला वीडियो है.

वीडियो के शुरुआत में ही खुद को सेफ साइड रखने के लिए वीडियो में उन्होंने कह दिया है कि ‘इस घटना को डिफेंड नहीं किया जा सकता है.’ सही बात है. डिफेंड करना भी नहीं चाहिए. पर अगर आखिरी तक आप इस वीडियो को ध्यान से सुनेंगे तो वीडियो कुछ और ही कहता हुआ दिखाई देगा. शुरुआत में ही मीडिया का हवाला देते हुए उन्होंने तबरेज़ को चोर बताया है जो कि सही है. ओवैसी और महबूबा मुफ़्ती के कमेंट का भी इन्होंने ज़िक्र किया है पर मोदी जी की बात मिस हो गई या भूल गए होंगे कोई बात नहीं है जल्दी-जल्दी में ऐसा हो जाता है.

ओवैसी के कमेंट को गलत बताते हुए इनका कहना है कि-

‘चंद अपराधों के कारण हर मुसलमान असुरक्षित नहीं हो जाता.’

बिलकुल सही बात.. हम भी ऐसा ही कहते हैं. पर… इनके इस कथन से ऐसा लग रहा है कि बीते कुछ सालों में होने वाली मॉब लिंचिंग की सैकड़ों घटनाएं इन्हें ‘चंद अपराध’ लग रहे हैं. इनका कहना है कि ऐसे चंद अपराधों के कारण ‘हर मुसलमान’ असुरक्षित नहीं हो जाता. पर इनसे एक मिस्टेक हो गई ज़रा से तथ्य छूट गए. वो ये कि अब तक हुई मॉब लिंचिंग की अधिकतर घटनाएं निशानदेही के आधार पर हुई हैं. निशानदेही धर्म की, निशानदेही पहचान की, निशानदेही मुस्लिम होने की. ऐसे में हर मुसलमान असुरक्षित नहीं है पर जितने भी मुसलमान खुद को डरा हुआ महसूस कर रहे हैं उनके डर का कारण भी तो ये ‘चंद अपराध’ ही हैं.

अपराध में धार्मिक रंग ये खुद डाल रहे हैं. अगर अपराध को अपराध की नज़र से देखते तो इन्हें मॉब लिंचिंग की सैकड़ों घटनाएं ‘चंद अपराध’ नहीं लगती. इन्होंने चंद शब्द इस्तेमाल किया है क्योंकि इनके हिसाब से मुसलमानों पर कम हमले हुए हैं. ऐसे में संपादक जी को एक ही बात कहनी है. सर, प्लीज़.. स्टे अपडेटेड.

खैर.. यहाँ तक तो एक बारगी सम्पादक महोदय की बात सहनीय थी पर अब जिस बात का सहारा लेकर वह भीड़ को इनडायरेक्टली जस्टिफाई करने की कोशिश कर रहे हैं वह बिलकुल गलत हैं. सर मैं झारखण्ड से ही आता हूँ और यह ये घटना मेरे घर से 35 किलोमीटर की दूरी पर घटी है. वहां ऐसा माहौल नहीं है कि एक ‘चोर’ मिले तो लोग उसे मरने की हालत तक पीटे. चोर को ‘चोर’ होने की सजा मिलती है. लोगों को पुलिस का डर भी होता है.

तबरेज़ अंसारी और उसकी बीवी/फोटो सोर्स :गूगल

संपादक जी के हिसाब से अगर लोग समझदार हो तो भीड़ से इंसान को बचाया जा सकता है. इसका यह मतलब साफ़ निकलता है कि धत्किदीह में एक भी लोग समझदार नहीं हैं. चलिए एक बार को आपकी बात मान भी ले तो क्या पुलिस भी समझदार नहीं है जो तबरेज़ को मौके पर अस्पताल लेकर नहीं गई?

संपादक जी कहते हैं जिस तरह से तबरेज़ के साथ जो भी कुछ हुआ है ‘भीड़ चोरों के साथ ऐसा ही करती है.’

संपादक जी ऐसा कह कर आप भीड़ को जस्टिफाई करते हुए लग रहे हैं. क्योंकि अगर भीड़ ऐसा करती है तो गलत करती है. उन्हें ऐसा करने से रोकना चाहिए और ऐसी घटना नहीं रुक पा रही है तो हमारा और आपका काम है कानून और सत्ता में बैठे लोगों से इस मुद्दे पर सवाल करना.

आप कहते हैं कि ‘जय श्री राम’ कहलवाना कुछ लड़कों की शरारतें हैं. मिनट भर के मज़े के लिए यह करवाया गया हो सकता है.’

चलिये मान लिया आपकी बात सही है. पर ये बताइये उस मिनट भर के मज़े के किसी की जान चली जाती है और उसे आप शरारत बता रहे हैं. ये कैसा मत है? बेहतर होता इन शरारती तत्वों को हम अपराधी मानते सिर्फ अपराधी, शरारती तत्व नहीं. इस घटना को हेट क्राइम का चोला आप जैसे ही मीडिया वालों ने पहनाया है.

क्या आपने अपने खबर में तबरेज़ के ‘धर्म’ पर ज़ोर नहीं दिया? अगर आरोपी को सिर्फ आरोपी रहने दिया जाए. उसे जाति और धर्म में न बांटा जाता तो मुद्दा कभी धार्मिक बनता ही नहीं. इसे धर्म से जोड़कर धार्मिक बक्से में हम ही डालते हैं और फिर एक वीडियो पब्लिश करके दूसरों को दोगला बता देते हैं.

दोहरे मापदंड का अदाहरण/फोटो सोर्स गूगल

इस वीडियो में आप सुनेंगे कि लिबरल होने के ऊपर भी भाषण दिया गया हैं. संपादक जी के अनुसार जैसे लिबरल होना कोई गुनाह है या गलत है. ठीक बात है, आजकल का एक बड़ा लिबरल वर्ग शायद स्यूडो (Pseudo) लिबरल की कैटेगरी में आने लगा है. पर ऐसे में आप सही को सही और गलत को गलत मानने वाले लोगों को दोषी तो नहीं ठहरा सकते न? ऐसे कई लोग मिलेंगे जो खुद को लिबरल बोलेंगे लेकिन आपकी ही थ्योरी पर जाए तो जैसे हर मुसलमान असुरक्षित महसूस नहीं करता उसी तरीके से हर लिबरल, मुखौटे वाला नहीं होता. लिबरलिस्म एक बड़ा टॉपिक है जिस पर इत्मीनान से बात की जा सकती है.

संपादक जी जिस दलित को खाट पर लेटा कर काट दिया गया उसके साथ अगर आप ‘दलित’ शब्द का इस्तेमाल नहीं भी करते तब भी लोगों तक खबर पहुँच जाती. पर नहीं वहाँ पर TRP और व्युज का ज़ोर ज्यादा चलता है. इसलिए संवेदनाओं से खेलने वाले जब मोरल की बात करते हैं तब हमें खटकते हैं. अपराध को एक अपराध की तरह भी देखा जा सकता है. ज़रूरी नहीं है की अपराध के बाद धर्म और जाति का सर्टिफिकेट पहले दिया जाए उसके बाद बाकी की ज़रूरी बातें की जाए?

आपने अपने दूसरे वीडियो का हवाला देते हुए कहा कि उसमें मारे गए हिंदुओं की लिस्ट है.

पर जहां तक हमें पता है आज तक किसी हिन्दू को बीफ खाने के ‘शक’ के आधार पर तो नहीं ही मारा गया है. कितने को ‘अल्लाह-हु-अकबर’ न बोलने के आधार पर मारा गया है? कितने हिंदुओं को टीका या जनेऊ पहनने की वजह से मारा गया है? इन सारी बातों पर गौर कीजिये, खबरें पढ़िये, विश्लेषण कीजिये. उसके बाद कहिए जो कहना चाहते हों? पर अभी आपकी बातें एकतरफा मालूम होती है.

फोटो सोर्स गूगल

आपके इस पूरे वीडियो में एक ही बात सही लगी जो आपने उस तबके के लिए कही जो गिने चुने मुद्दों पर ही सामने आते हैं. आपने कहा – “अगर आपको तबरेज़ की हत्या में उस समाज में दोष दीखता है तो आपको विनय की हत्या पर भी विचलित होना पड़ेगा.”

बिलकुल सही बात, हम हत्या को जस्टिफाई नहीं कर रहे और न ही अपराध को. हमारे लिए अपराध सिर्फ अपराध है, उसमें जाति, धर्म, वर्ग देखने के लिए हमें ज़ोर लगाना पड़ता है. हम ऐसा करने से बचते हैं. सबको बचना चाहिए. आजकल के माहौल के हिसाब से ये पहली और सबसे जरूरी शर्त होनी चाहिए मीडिया के लिए.

आखिर में इस तरह की घटनाओं को ‘चंद’ घटनाओं में गिनने से पहले आपको ज़रुरत है थोड़ी सी रिसर्च करने की. बहुत पीछे जाने की जरूरत नहीं है. आज का ‘इंडियन एक्सप्रेस’ अखबार खरीदिये. अखबार के 7 नंबर पेज पर जाइये वहां पिछले तीन साल में घटी ऐसी ‘चंद’ घटनाओं की रिपोर्ट है. रिपोर्ट में लिखा है कि 3 साल के अंदर मॉब लिंचिंग की यह 18वीं घटना है. अब आपको तो यह 18 भी कम लग रहा होगा, तो आपको बता दें कि यह 18 घटनाएं सिर्फ झारखंड की है. झारखंड के अलावा देश में 28 राज्य और भी हैं.

फोटो सोर्स – Indian Express E Paper

और सुनिए इन 18 घटनाओं में सिवाय दो घटनाओं के और किसी भी घटना में आरोपियों को अभी तक सजा नहीं हुई है. जितनी भी घटनाएं हुई हैं उनमें अधिकतर में या तो गाय तस्करी के आरोप में किसी को पीटा है या चोरी के आरोप में अफवाह के आधार पर भीड़ द्वारा सजा दी गयी है. उस पर भी इन घटनाओं में मात्र 8 घटनाएं ऐसी है जो रजिस्टर हुए हैं.

बाकी ऐसी ही जानकारी और खबरों के लिए बने रहिए द कच्चा चिट्ठा के साथ. शुक्रिया.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here