इमरान खान जब से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने हैं, तब से किसी न किसी चुनौती का सामना उन्हें करना पड़ ही रहा है. एक नयी विपदा उन पर और आन पड़ी है. इस विपदा को नया बोलना सही नहीं होगा क्योंकि पकिस्तान के लिए यह पुराना मसला है लेकिन इमरान जी के लिए ये नया है.

क्या हो गया?

प्रधानमंत्री इमरान खान ने सोमवार को पाकिस्तान को संबोधित किया. अपने संबोधन में उन्होंने सभी पाकिस्तानी नागरिकों से आग्रह किया है कि पाकिस्तान को पटरी पर लाने के लिए और गरीबों की ज़िन्दगी में सुधार लाने के लिए सभी लोग अपनी अपनी जिम्मेदारियां निभाएं. इसके साथ ही उन्होंने सभी नागरिकों से कहा है कि 30 जून तक सभी अपनी संप्पति की घोषणा कर दें ताकि वैध और बेनामी संपत्ति का फर्क पता चल सके.

हमारे हिसाब से हर देश के लोग एक जैसे ही होते हैं और कोई चोर कभी सामने आ कर नहीं कहता कि वह चोर है. तो अगर लोगों के पास बेनामी सम्पत्ति होगी भी, तो भी वो इसे जग ज़ाहिर नहीं करेंगे. उन्होंने कहा कि 30 जून तक सभी अपनी बेनामी संपत्ति, बेनामी बैंक अकाउंट और विदेश में रखे पैसे को शेयर कर दें माने कि सरकार को इसकी जानकारी दे दें. 30 जून के बाद उन्हें समय नहीं मिलेगा. इसका मतलब क्या समझा जाए? 30 जून के बाद पकिस्तान में भी नोटबंदी तो कहीं नहीं लगेगा? हो सकता है इमरान खान ने देखा होगा कि नोटबंदी करके भी अगर कोई दूसरी बार प्रधानमंत्री बन सकता है तो, मेरा तो यह पहला टर्म है. पकिस्तान के प्रधानमंत्री ने कहा-

“पिछले 10 साल में पाकिस्तान का क़र्ज़ छह हज़ार अरब से 30 हज़ार अरब रुपए तक पहुंच गया है. जो हम चार हज़ार अरब रुपए का सालाना टैक्स इकट्ठा करते हैं उसकी आधी रक़म क़र्ज़ों की किस्तें अदा करने में जाती हैं. बाक़ी का पैसा जो बचता है उससे मुल्क का खर्च नहीं चल सकता है. पाकिस्तानी वो कौम है जो दुनिया भर में सबसे कम टैक्स अदा करते हैं लेकिन उन चंद मुल्कों में से है जहां सबसे ज़्यादा ख़ैरात का बोझ है. अगर हम तैयार हो जाएं तो कम से कम हर साल 10 हज़ार अरब रुपए इकट्ठा कर सकते हैं.”

इमरान खान/फोटो सोर्स गूगल

यह बात सबसे पहले शायद वहां की सेना को समझ आई. शायद इसी वजह से उन्होंने रक्षा का बजट भी कम कर दिया है. पाकिस्तानी सेना को अपने अगले वित्तीय वर्ष के लिए अपने रक्षा बजट में कटौती पर मजबूर होना पड़ा है. इमरान खान ने इस फैसले का स्वागत किया है. इमरान ने सेना के इस फैसले पर ट्वीट करते हुए लिखा है-

“कई सुरक्षा चुनौतियों के बावजूद आर्थिक संकट की घड़ी में सेना की ओर से अपने ख़र्चे में की गयी कटौती के फ़ैसले का स्वागत करता हूँ. हम इन बचाए गए रुपयों को बलूचिस्तान और क़बायली इलाक़ों में ख़र्च करेंगे.”

पाकिस्तानी करेंसी/ फोटो सोर्स गूगल

वैसे अच्छा ही सोचा है पाकिस्तानी सेना ने क्योंकि जिस तरह से देश का पैसा सिर्फ बम, बारूद, हथियार और मिसाइलों को खरीदने में लग रहा था, ऐसा ही चलता रहता तो एक दिन उनका देश ही बिक जाता. कई लोगों ने इस फैसले को सराहा है. अब भले ही इसे लाचारी कहा जाए या जो भी, ये वही आर्मी है जिन्होंने फरवरी में कटौती करने से मना कर दिया था. स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के मुताबिक़, 2018 में पाकिस्तान का कुल सैन्य खर्च 11.4 अरब डॉलर था जोकि पाकिस्तान की जीडीपी के चार फीसदी के बराबर की थी. जबकि भारत का सैन्य खर्च 66.5 अरब डालर था.

पकिस्तान के प्रधानमंत्री ने यह भी कहा है-

“मैं आप सबसे अपील करता हूं कि संपत्ति घोषित करने की जो योजना लेकर आया हूं उसमें आप सभी लोग शामिल हो जाएं. हमें ख़ुद को तब्दील करना पड़ेगा. अल्लाह क़ुरान में कहता है कि हम किसी कौम की हालत नहीं बदलते जब तक कि वो कौम ख़ुद अपनी हालत बदलने को तैयार न हो. आपके पास 30 जून तक वक़्त है कि बेनामी संपत्ति सार्वजनिक कर दें. हमारी सरकार के पास वो सूचना है जो पहले किसी भी सरकार के पास नहीं थी. विदेशों में पाकिस्तानियों की संपत्ति और बैंक अकाउंट की सूचना भी मेरे पास है.”

पकिस्तान की करेंसी/फोटो सोर्स गूगल

कल पाकिस्तान ने बजट पेश किया था. विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान पर अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था है, जो अपने सदस्य देशों की वैश्विक आर्थिक स्थिति पर नज़र रखने का काम करती है. यह अपने सदस्य देशों को आर्थिक और तकनीकी सहायता प्रदान करती है. यह संगठन अन्तर्राष्ट्रीय विनिमय दरों को स्थिर रखने के साथ-साथ विकास को सुगम करने में सहायता करता है) का दबाव है.

पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से 6 अरब डालर का क़र्ज़ ले रहा है. इस क़र्ज़ के एवज़ में इमरान खान के सरकार ने वादा किया है कि उनके देश की आर्थिक नीतियाँ अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ही तय करेगा. देखा जाए तो इस वक़्त पाकिस्तान की स्थिति ऐसी हो गयी है कि उसे अब खुद के देश की आर्थिक स्थिति भी संभालने की छुट नहीं है. कोई और ही उनके देश का खर्चा बनाएगा. पाकिस्तान पर यह भी दबाव है कि वह अगले 12 महीने में 700 अरब रूपए के फंड की व्यवस्था करें. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने पाकिस्तान को टैक्सों में बढ़ोत्तरी और खर्चे में कटौती करने को कहा है.

चिंतित मुद्रा में इमरान खान/फोटो सोर्स गूगल

हाल ही में पाकिस्तान में ऑटोमोबाइल की बड़ी-बड़ी ब्रांडों को खोला गया था. जबकि यहाँ के शहरों में लोग 2 जून की रोटी को तरस रहे हैं. पाकिस्तान की पिछली मुस्लिम लीग ने अपने आर्थिक सर्वे में बताया था कि कैसे आयात और निर्यात के बीच का अंतर बढ़ता जा रहा है.

अगर पाकिस्तान में पिछले चुनाव के समय में जाए तो इमरान खान ने अपने ही रैलियों में कहा था कि वह क़र्ज़ लेने से बेहतर खुदखुशी करना पसंद करेंगे. पर उनकी हरकतें देख कर लग नहीं रहा कि वह खुदखुशी करेंगे. देश का हाल देख कर ऐसा लग रहा है कि वहां के लोग ऐसा कर सकते हैं. पाकिस्तान में लगातार विदेशी मुद्रा भण्डार घटते जा रहा है. हाल में ही भारत में आम चुनाव हुआ था जिसमें 7 अरब डॉलर खर्च हुए थे. इतनी ही रकम पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार में बची हुई है. ऐसे में पाकिस्तान का हाल ‘हम करें तो करें क्या बोले तो बोले क्या‘ वाली हो गयी है !

पाकिस्तानी आर्मी/फोटो सोर्स गूगल

आईएमएफ यानि अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा दिया गया यह पाकिस्तान को 22वां क़र्ज़ है. पाकिस्तान पुरे साल में जितना इकठ्ठा कर पाता है टैक्स के ज़रिये उसका 30.7 % उनका क़र्ज़ चुकाने में ही चला जाता है. साल 2015 में पकिस्तान 2.7 अरब डॉलर के घाटे में चल रहा था जो 2018 में बढ़कर 18.2 अरब डॉलर हो गयी थी. चीन पकिस्तान इकनोमिक कॉरिडोर जब से बनना शुरू हुआ है तब से पाकिस्तान की आयात में वृद्धि हुई है. सीपीईसी चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना वन बेल्ट वन रोड का हिस्सा है जिसके तहत उसने पाकिस्तान में क़रीब 60 अरब डॉलर का निवेश किया है.

2018 में जून महीने के अंत तक पाकिस्तान का कुल सरकारी क़र्ज़ 179.8 अरब डॉलर हो गया था. 25 अरब तो केवल एक साल में बढ़ गया है. 2018 के जून तक पाकिस्तान पर विदेशी क़र्ज़ 64.1 अरब डॉलर था जो जनवरी 2019 में बढ़कर 65.8 अरब डॉलर हो गया. महंगाई दर 9.4 फीसदी के पार चली गयी है.

पाकिस्तान में महंगाई की मार से सबसे ज्यादा कौन परेशान है?

महंगाई बढ़ने का सबसे ज्यादा असर मध्यम व्यापारी, मध्यमवर्ग के लोग और लघु उद्योग वालों को पड़ा है. हालत वहां का ये है कि अगर इसी तरह से महंगाई बढ़ते रही तो वे इसका मार झेल नहीं पायेंगे. वहां रहने वाली महिलाएं छोटे-छोटे व्यापार करने के लिए मजबूर हैं. वह अपनी बजट पर ही निर्भर रहती थी पर, धीरे-धीरे अब वह भी खत्म हो रहा है.

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