पीरियड या मासिक धर्म के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है. समाज इन बातों को लेकर पहले के मुकाबले काफी जागरूक हुआ है इसलिए आज हम महिलाओं को होने वाले पीरियड के बारे में बात नहीं करेंगे.

प्रतीकात्मक तस्वीर फोटो सोर्स – गूगल

क्या होता है ट्रान्सजेंडर पुरुष या ट्रांस मैन?

ट्रांसजेंडर पुरुष और नॉन बाइनरी लोगों को भी माहवारी होती है. ट्रांस मैन वो लोग होते हैं जो जन्म तो लेते हैं पुरुष के तौर पर, लेकिन उनकी शारीरिक संरचना(गुप्तांग) को देखते हुए जन्म के बाद डॉक्टर उन्हे महिला घोषित कर देते हैं. आम तौर पर ट्रांस मैन अपना जेंडर उस हिसाब से ऑपरेशन करके बदल लेते हैं जिस हिसाब से वह दिखते हैं या दिखना चाहते हैं।

नॉन बाइनरी लोग कौन होते हैं? 

कुछ लोग पूरे तरीके से पुरुष या महिला की श्रेणी में फिट नहीं बैठते. ऐसे लोगों को हम नॉन बाइनरी की कैटेगरी में गिनते हैं. अगर शरीर के बनावट की बात करें तो कई बार ऐसे लोगों के गुप्तांग स्त्री और पुरुष दोनों से मिलते जुलते होते हैं. लोगों को लगता है कि ये खुद भी अपने पसंद न पसंद को लेकर कन्फ्युज़ रहते हैं. पर ऐसा नहीं है इन्हे पता रहता है कि ये क्या हैं और किसके तरफ ये आकर्षित होते हैं.

किन्हें होता है पीरियड ?

महिलाओं के अलावा ट्रांस मैन और नॉन बाइनरी लोगों को भी पीरियड उसी प्रकार होता है जैसे महिलाओं को. कुछ मामलों में वह महिलाओं की तरह ब्लीड नहीं करते पर महसूस उसी तरह से करते हैं जैसे महिलाओं का मूड पीरियड के दौरान होता है जैसे सूजन होना, पीरियड के दौरान कमर में दर्द आदि. आज भी महिलाएं इन मुद्दों पर खुल कर बात करने से कतराती हैं। जब समाज महिलाओं के होने वाले मासिक धर्म को हमारा समाज सहजता से नहीं लेता तो ट्रांस लोगों के लिए इस मुद्दे पर खुल कर सामने आना कितना कठिन होगा आप खुद भी समझ सकते हैं.

कुछ महिलाओं को मासिक धर्म अनियमित समय पर होता है. अधिकतर महिलाओं को हर महीने मासिक धर्म होता है पर कुछ को एक या दो महीने बाद या कभी-कभी एक महीने में 2 बार भी हो जाता है. ट्रांस महिलाओं के साथ भी कुछ इसी प्रकार का मामला सामने आया है। इनके केस में भी ज़रूरी नहीं है कि हर महीने इन्हें पीरियड हो.

ट्रांस मैन फोटो सोर्स – गूगल

मासिक धर्म को भारत में एक सोशल टैबू माना जाता है और हम अक्सर देखते हैं कि इस विषय पर चर्चा नहीं कि जाती है. पीरियड्स को इस हद तक कलंकित किया जाता है कि कई महिलाएं मासिक धर्म के कारण अपने अधिकारों से वंचित रह जाती हैं.

क्या ‘सिसजेंडर’ लोगों को भी पीरियड हो सकता है?

सिसजेंडर वो लोग होते हैं जिनका सेक्स और उनकी पहचान वैसे ही रहती है जैसे वे पैदा होते हैं. ऐसे लोगों को माहवारी नहीं होती है. ‘मेल पीरियड’ करके कुछ भी नहीं होता. यह भी कह सकते हैं कि जो पूर्ण रूप से पुरुष में आते हैं उन्हें पीरियड नहीं होता.

पुरुषों कि अगर बात की जाये तो महिलाओं के जैसे इन्हें भी मूड स्विंग्स होते हैं जिसे IMS (इरिटेबल मेल सिंड्रोम) कहते हैं. पुरुषों के टेस्टोस्टोरेन में गिरावट की वज़ह से उन्हें यह होता है. IMS कभी भी हो सकता है. क्योंकि पुरुषों में हर 24 घंटे में हार्मोनल साइकल होता है. आमतौर पर सुबह के समय इसका लेवल सबसे हाई होता है और शाम होते-होते यह लेवल कम हो जाता है. जो पुरुष इरिटेबल मेल सिंड्रोम का अनुभव करते हैं वे क्रोधित या मूडी हो सकते हैं. कुछ मामलों में इसकी वज़ह से लोग चिंतित और उदास भी होते हैं.

माहवारी को औरत के साथ इस तरह जोड़ दिया गया है कि अब लोग इस शब्द को और किसी के साथ जोड़ना पसंद भी नहीं करते. सवाल उठता है कि ट्रांस लोग इस बात को लेकर सामने कैसे आए? भारत में पहले लोग मानते ही नहीं थे कि ट्रांसजेंडर भी इंसान होते हैं और वह इन सब बातों को अफवाह मानते थे. ऐसे में जब अभी ट्रांस लोग बाहर आना शुरू हुए हैं और अपनी पहचान बताना शुरू किए हैं तो उनके लिए भी काफी मुश्किल है इस सच को सबके सामने लेकर आ पाना. ट्रांस पुरुषों के लिए यह एक सामाजिक शर्म की बात जैसा हो गया है जिसे वह समाज से छिपाना चाहते हैं क्योंकि वह जानते हैं कि समाज मे इसे अपनाने वालों से ज्यादा इसका मज़ाक बनाने वाले घूम रहे हैं।

एक ‘ट्रांसफेथ’ संस्था है जिसके अनुसार 36% नॉन बाइनरी लोग स्वास्थ्य केंद्र डर से नहीं जाते. उन्हे डर है भेदभाव का कि लोगों को अगर उनके पीरियड होने के बारे में पता लग जाएगा तो फिर उनके साथ भेदभाव होगा. कई ट्रांस पुरूषों को डिस्फोरिया जैसी बीमारी से ठीक किया गया है. इस बीमारी में उन्हें ऐसा लगता है कि वह पुरुष हैं पर महिला के रूप में कैद हैं. हाव-भाव सब उनका पुरुषों वाला होता है पर अंदर से उन्हें लगता है कि वह स्त्री हैं.

ऐसे लोग बताते हैं-

“महावारी के वक़्त वह काफी थका हुआ महसूस करते हैं और काफी उदास हो जाते हैं. ऐसा इसलिए भी होता है क्योंकि उनकी बॉडी उनके जेंडर से मैच नहीं करती.”

सभी ट्रांस पुरूष अपने युटेरस से परेशान नहीं रहते. ऐसे लोगों को परेशानी होती है गायनाकोलॉजिस्ट खोजने में जो उनकी मदद कर पाये और उन्हें यूटेरस और ब्लीडिंग से छुटकारा दिला पाये. रोज़मर्रा के ज़िंदगी में एक और दिक्कत का इन्हें सामना करना पड़ता है और वह है मेल वशरूम में अपना पैड चेंज करना. इतिहास में भी ट्रांस पुरुष और माहवारी को लेकर ज़्यादा बातचीत नहीं की गयी है. इसलिए लोगों ने भी इन बातों को नज़रअंदाज़ किया है.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here