पूरे देश का विकास करते-करते गोद लिए बच्चों का विकास कैसे भूल गए?

 

भारत देश में विकास करने की चाह रखने वाले प्रधानमंत्री मोदी, जिनके हिसाब से गरीबों और किसानों के हित के बारे में सही सोच सिर्फ प्रधानमंत्री और भारतीय जनता पार्टी ही रखती है। साल 2014 में सरकार द्वारा लॉन्च की गयी ‘सांसद आदर्श ग्राम योजना’ के तहत प्रधानमंत्री मोदी ने वाराणसी में जयापुर और नागेपुर नाम के दो गाँव और मिर्ज़ापुर जिले का टेढ़वा गाँव को गोद लिया था।

जिन लोगों को नहीं पता कि यहाँ किस योजना की बात हो रही है तो उन लोगों को बता देते हैं कि ‘सांसद आदर्श ग्राम योजना’ को साल 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गाँव के विकास के लिए शुरू किया था। इस योजना के तहत पार्टी के हर सांसद को अपने संसदीय क्षेत्र से एक-एक गाँव चुन कर साल 2016 तक उन्हें ‘मॉडल विलेज‘ बनाने का काम सौपा गया था। इसी योजना के तहत साल 2019 तक सभी सांसदों को तीन-तीन गाँवों को मॉडल विलेज का रूप देने का प्लान बना था। फिलहाल इस योजना का एक्स्टेंडेड प्लान भी चल रहा है। माना जा रहा है कि साल 2024 तक हर सांसद पर आठ गाँव को मॉडल विलेज बनाने का जिम्मा सौंपा जाएगा।

साल 2024 बहुत दूर है और आठ गांवों की बात भी काफी मुश्किल डगर पर लगती है। पहले अभी के परिणाम देख लेते हैं। उसको जानने और समझने के लिए आपको इन आंकड़ो को देखना और समझना होगा।

क्या कहता है आंकड़ा?

बिज़नस टुडे की एक रिपोर्ट बताती है कि गाँव को चुनने के पहले चरण में 796 सांसदों (500 लोकसभा सांसद और 203 राज्यसभा सांसद) ने इस योजना के तहत अपने संसदीय क्षेत्र से एक-एक गाँव को मॉडल विलेज बनाने के लिए चुना। बिलकुल वैसे ही जैसे इस योजना के मुताबिक होना चाहिए था। यहाँ तक सब ठीक था। लेकिन इस योजना की गाड़ी तो शुरू होते ही रुक-रुक के चलने लगी।

ऐसा हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि जब दूसरा गाँव चुनने की बारी आई तो पता नहीं किन कारणों से गाँव को चुनने वाले सांसदों का आंकड़ा कम होता गया। दूसरे गाँव को चुनने वाले सांसदों की संख्या कम होकर 497 (364 लोकसभा और 133 राज्यसभा) तक पहुँच गयी। हो सकता है कि बाकी बचे हुये सांसद किसी अन्य मुद्दे पर विकास करने के प्रयास में व्यस्त हो गए होंगे। आखिर परेशानियाँ सिर्फ गांवों तक ही सीमित तो नहीं हैं।

पर तीसरे चरण में आंकड़े देख कर सवाल उठाना बनता है कि स्वयं प्रधानमंत्री मोदी द्वारा बनाई गयी इस योजना से आखिर उन्हीं की पार्टी के सांसद क्यों पीछे हट गए? तीसरे गाँव को चुनने के वक़्त मोदी जी के सांसदों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गयी। आंकड़े बताते हैं कि सिर्फ 225 लोकसभा और 58 राज्यसभा सांसद ही ऐसे थे जिन्होंने तीसरे गाँव को मॉडल विलेज बनाने के लिए चुना। इन गिरते आंकड़ों का जवाब तो प्रधानमंत्री को देना ही चाहिए।

हालांकि उत्तरप्रदेश विकास की इस रेस में बाकी राज्यों से आगे खड़ा दिखाई देता है। 80 में से 60 लोकसभा और 31 में से 6 राज्यसभा सांसदों ने तीन-तीन गाँव के विकास की ज़िम्मेदारी ली। केरल और तमिलनाडु में भी बेहतर काम हुआ। यह काबिले तारीफ है!

अब इस विषय पर थोड़ा और गहराई में चलते हैं और जानते हैं कि भाजपा के दावों में यह योजना जितनी सफल दिखाई या सुनाई देती है क्या वाकई में उतनी सफल है भी या नहीं?

सबसे पहले बात करते हैं जयापुर और नागेपुर की। जिसका जिम्मा प्रधानमंत्री नें खुद लिया था।

जयापुर गाँव

साल 2016 में एक मीडिया रिपोर्ट आई थी। इस रिपोर्ट में जयापुर के सरपंच ने मीडिया को बताया था कि किस तरह सुर्खियों में आने की वजह से जल्दीबाजी में काम को शुरू कर दिया गया था। इसकी वजह यह भी थी कि प्रधानमंत्री ने खुद इस गाँव को गोद लिया था। शुरुआत में ऐसा लगा कि शायद हर समस्या का सामाधान हो जाएगा। चाहे वो पक्की सड़क हो, शौचालय का काम हो या फिर स्ट्रीट लाइट की व्यवस्था हो। कुछ काम हुए भी जैसे कि 25 किलोवाट का सोलर पैनल जिससे गाँव के लोगों को शाम 6 बजे से सुबह 6 बजे तक बिजली मिलने लगी। वह बताते हैं कि गाँव में महिलाओं को प्रशिक्षण और रोजगार उपलब्ध कराने के लिए खादी बुनाई की सुविधा भी स्थापित की गई है।

जयापुर गाँव। फोटो सोर्स: गूगल

खुद को बीजेपी के समर्थक बताने वाले जयापुर के सरपंच नारायण पटेल बाद में कहते हैं कि सरकार को तारीफ़ें बटोरने की जल्दी ज़्यादा थी इसीलिए इतनी तेज़ी में काम करवाया गया कि सरकार काम की क्वालिटी पर ध्यान देना ही भूल गयी। पटेल आगे बताते हैं कि दो साल के अंदर ही सड़कों में गड्ढे हो गए। 400 शौचालय में से सिर्फ 20% ही गाँव वालों द्वारा इस्तेमाल में आते हैं। शौचालय के दरवाजों में छेद है। पानी की कोई व्यवस्था नहीं है, रोशनी नहीं है और ज़्यादातर शौचालयों का इस्तेमाल अब गाय का गोबर रखने के काम में आता हैं। स्ट्रीट लाइट के नाम पर सरपंच बताते हैं कि पूरे गाँव में सिर्फ एक चौक पर लाइट लगाई गयी है। बाद में सोलर पैनल की बैटरियां भी चोरी हो गईं जिसकी कम्प्लेन सरपंच ने कई बार करवाई लेकिन अफसोस इस मामले में कोई खास कार्यवाही अबतक नहीं हो पायी है।

फोटो सोर्स: गूगल

नागेपुर गाँव

प्रधानमंत्री जी द्वारा चुने हुए दूसरे गाँव नागेपुर का हाल तो और भी ज़्यादा सवाल उठाने पर मजबूर करता है। यहाँ के स्थानीय निवासी और सरपंच पारसनाथ राजभर जयापुर के हालात को देखने के बाद अपने गाँव को लेकर सतर्क हो गए हैं। एक लोकल कार्यकर्ता नंदलाल जो लोक कल्याण नाम के एनजीओ के लिए काम करते हैं वह बताते हैं कि जयापुर खेती प्रधान गाँव है वहीं नागेपुर सिलाई बुनाई के लिए जाना जाता है। नंदलाल कहते हैं कि अगर खादी बुनाई से जुड़ी संस्था जयापुर के बजाय यहाँ स्थापित करी जाती तो गाँव की औरतों को रोजगार मिलने में ज़्यादा फायदा होता लेकिन सुर्खियां बटोरने की जल्दी में जरूरतें कहाँ याद रहती हैं।

सरपंच के भाई श्याम सुंदर ने मीडिया को बताया कि उन्होंने सरकार से हायर सेकेंडरी स्कूल खोलने की मांग की थी क्योंकि गाँव में सिर्फ प्राइमरी स्कूल है और हायर सेकेंडरी स्कूल सिर्फ दो हैं। लेकिन वो गाँव से 7-8 किलोमीटर दूर हैं। जिसकी वजह से कई बच्चों (खास तौर पर लड़कियों) को पढ़ाई छोड़ने पर मजबूर होना पड़ता है। राज्य की हैल्थ मिनिस्टर अनुप्रिया पटेल ने अस्पताल की व्यवस्था करने का वायदा भी किया था लेकिन अभी तक वो पूरा नहीं हुआ है।
इसके साथ-साथ पोस्ट ऑफिस, बारात घर और जानवरों के अस्पताल जैसे कई और मुद्दे हैं जिनकी मांग गाँव वालों ने की थी लेकिन अबतक कुछ भी नहीं हुआ है।

टेढ़वा

वहीं टेढ़वा में गाँव की औरतें रोजगार ना होने के कारण सबसे ज़्यादा परेशानी मे हैं। यह इस योजना के तहत प्रधानमंत्री द्वारा चुना गया तीसरा गाँव है। औरतों के एक समूह ने मीडिया को बताया कि उन्हें उज्ज्वला स्कीम के तहत गैस सिलेन्डर तो मिल गये लेकिन उन्हें दोबारा भरवाने के लिए उनके पास पैसे नहीं है। गांव की ही एक महिला गुड्डी देवी ने बताया कि उन्हें शौचालय बनाने के लिए शुरुआत में पैसा तो मिला लेकिन काम को आधे में ही रोकना पड़ा और इसकी वजह भी वह पैसों की कमी बताती हैं। सुपति देवी नाम की महिला कहती हैं कि गाँव में किसी के पास भी पक्के मकान नहीं हैं और ना ही तो पानी की व्यवस्था है।

ये तो थी भाजपा और देश के मुखिया नरेंद्र मोदी के गोद लिए हुए गाँव की बात। लगभग लगभग सभी गोद लिए हुए गांवों का यही हाल है। चलिये अब आपको एमपी के एक गाँव का हाल बता देते हैं जहाँ के लोग बीजेपी सरकार की इस योजना से कुछ ज़्यादा ही नाराज़ नज़र आते हैं।

बात है वर्धा जिले के तरोड़ा गाँव की जिसका जिम्मा बीजेपी सांसद रामदास तड़स ने साल 2014 में उठाया था। गाँव वाले सांसद साहेब पर आरोप लगाते हैं कि जो 25 करोड़ का फ़ंड सांसद महोदय को इस गाँव के विकास के लिए मिला था, उस रकम को सांसद साहेब ने अपने खुद के गाँव के विकास के लिए इस्तेमाल कर डाला है। इस गाँव की आबादी करीब 3,390 है जिसमें से 2,900 लोग वोटर हैं।

रामदास तड़स। फोटो सोर्स: गूगल

इसी गाँव के एक निवासी श्रीनिवास चमभरे ने मीडिया को बताया कि रामदास तड़स 5 साल में सिर्फ पाँच बार ही इनके गाँव में झाँकने आए हैं। वो बताते हैं कि थोड़ा बहुत काम जो सड़कों और नालियों में दिख रहा है वो इस योजना के आने के पहले से हैं। इसके अलावा श्रीनिवास ने कहा कि गाँव को देख कर इस बात का अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि न तो गाँव में स्ट्रीट लाइट की व्यवस्था है और न ही ढंग से पानी आता है। वो कहते हैं

पहले बेसिक सुविधाओं पर ध्यान दिया जाना चाहिए था, सिर्फ गाँव को सुंदर बनाने से परेशानियाँ कम नहीं होने वाली।

इसी गाँव की एक महिला ललिता शेन्दे बताती हैं कि वह मिट्टी और लकड़ियों से बने कच्चे मकान में रहती हैं। सरकार का कहना था कि गाँव में सबको पक्के मकान मिलेंगे लेकिन ऐसा होता कहीं भी दिखाई तो नहीं दिया। ललिता कई बार सरकार की ‘घरकुल’ स्कीम के तहत पक्के मकान मिलने की अर्ज़ी दे चुकी हैं लेकिन आज तक किसी ने उनकी नहीं सुनी है। वह बताती हैं कि उनके पड़ोस की महिला को तो ‘घरकुल’ योजना से घर मिलना भी था लेकिन आज तक नहीं मिला और इसकी वजह बताई गयी कि घर की ज़मीन उनके नाम नहीं है।

प्रधानमंत्री जी की योजना के हिसाब से गाँव के हर परिवार के पास पक्का मकान होना चाहिये। पाँच साल हो गए हैं लेकिन गाँव मे आज भी कच्चे मकान ही नज़र आते हैं। मीडिया से बातचीत में गाँव वालों ने बताया कि वो खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं और वह रामदास को वोट नहीं देंगे क्योंकि गाँव वाले नहीं चाहते कि उनके साथ दोबारा ऐसा हो।

ये सभी बातें सरकार और खासतौर पर प्रधानमंत्री मोदी जी की बातों पर बहुत सारे सवाल उठाती हैं कि एक तरफ प्रधानमंत्री फ़ाईटर प्लेन,  मॉडल विलेज जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं और दूसरी तरफ आज भी सड़कों में गड्ढे और बाथरूम के दरवाजों में छेद है। लोगों के पास रहने को घर नहीं है, पीने को पानी नहीं है और देखने को रौशनी नहीं है। ये कैसा विकास है?

इन सब आंकड़ों को देख कर बस यही कहने का मन होता है कि प्रधानमंत्री जी, काँच के घर तो बनवाते जा रहे हैं पर एक बार देख भी लीजिये कि उन घरों में रहने वाले लोगों के पास पहनने के लिए कपड़े भी हैं या नहीं।

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