एक लड़की तीन मूर्ति भवन की ओर बढ़ रही है क्योंकि उसे पंडित नेहरू से मिलना है। जब वो तीन मूर्ति भवन के बाहर पहुंची तो दरबान ने पूछा, किससे मिलना है? उस लड़की ने जवाब दिया ‘पंडितजी’ से। उस लड़की को अंदर जाने दिया गया। जवाहर लाल नेहरु अपनी अंबेस्डर कार में बैठने वाले थे। उस लड़की ने नेहरू को देखकर हाथ हिलाया। पंडित नेहरु ने भी जवाब में हाथ हिलाया। ये नेहरु का समय था। जो आगे चलकर इंदिरा, राजीव और सोनिया का होने वाला था। ये लड़की जो नेहरू को हाथ हिला रही थी वो कांग्रेस की रजिया सुल्तान बनने वाली थी। जो अकेले ही दिल्ली पर कई सालों तक राज करने वाली थी। तब की बात में आज कहानी दिल्ली की तीन बार मुख्यमंत्री बनीं शीला दीक्षित की।

Image result for sheila dixitशीला कपूर का जन्म 31 मार्च 1938 को हुआ। शीला ने दिल्ली के मिरांडा हाउस से पढ़ाई की और मिस मिरांडा भी बनीं। इसी दौरान उनकी मुलाकात एक लड़के से हुई जिसकी वजह से वे राजनीति में आ पाईं। उनकी मुलाकात कांग्रेस के बड़े नेता उमाशंकर दीक्षित के बेटे विनोद दीक्षित से हुई। दोनों की मुलाकात एक काॅमन फ्रेंड की वजह से हुई। बाद में मुलाकात नजदीकियों में तब्दील हो गई। शीला अक्सर बस से घर जाया करतीं थीं। इसी कारण से विनोद भी बस से सफर करते थे और एक दिन उसी बस में विनोद ने शीला के सामने प्यार का इजहार कर दिया। दो साल बाद दोनों की शादी हो गई और शीला कपूर, शीला दीक्षित बन गईं।

शादी के बाद शीला दीक्षित अपने ससुर उमाशंकर दीक्षित से राजनीति के गुर सीखने लगीं। वे उनके साथ ही उनके ऑफिस में काम करतीं। साल 1969 में जब इंदिरा गांधी को कांग्रेस से निकाला गया तो उमाशंकर दीक्षित ने इंदिरा गांधी का साथ दिया। उसी फैसले का फायदा पहले उमाशंकर दीक्षित और बाद में उनकी बहू शीला दीक्षित को मिला। इंदिरा गांधी ने नई कांग्रेस पार्टी बनाई और सत्ता में भी आईं। साल 1974 में इंदिरा वाली कांग्रेस ने चुनाव जीता और इंदिरा फिर से प्रधानमंत्री बनीं। उमाशंकर दीक्षित को फायदा मिलना था सो उनको देश का गृह मंत्री बना दिया गया। इसके बाद आया संजय राज।

शीला दीक्षित, कांग्रेस, लव स्टोरीसंजय गांधी ने कांग्रेस को अपने हिसाब से बदलना शुरू कर दिया। संजय ने कांग्रेस के बुजुर्गों को राज्यपाल बनाकर राजनीति से मुक्त कर दिया। उमाशंकर दीक्षित को भी कर्नाटक का राज्यपाल बना दिया। संजय गांधी को अपने जैसे युवा राजनेताओं की जरूरत थी।

शीला दीक्षित अपने ससुर का दफ्तर छोड़कर कांग्रेस में सक्रिय हो गईं। इस दौरान पति विनोद दीक्षित की हार्ट-अटैक से मौत हो गई। शीला दीक्षित ने अपने बच्चों और ससुर उमाशंकर दीक्षित की राजनैतिक विरासत को संभालना शुरू कर दिया। संजय गांधी की मौत के बाद वे राजीव गांधी की भी करीबी बन गईं। उनकी करीबी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब इंदिरा गांधी की हत्या की खबर राजीव गांधी को दी गई। तब राजीव गांधी एक प्लेन में हवाई यात्रा पर थे, उस प्लेन में शीला दीक्षित भी थीं।

इसके बाद राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने। इस के बाद आया साल 1984। पूरे देश में इंदिरा गांधी की मौत की सहानुभूति की लहर चल रही थी। कांग्रेस ने इतिहास की सबसे बड़ी जीत दर्ज की। इस लोकसभा चुनाव में शीला दीक्षित को भी मौका दिया गया। शीला दीक्षित को कांग्रेस से उत्तर प्रदेश की कन्नौज सीट से चुनाव लड़ने के लिये मैदान में उतारा गया। शीला दीक्षित के सामने थे छोटे सिंह यादव। सहानुभूति की लहर में शीला दीक्षित ने अपना पहला लोकसभा चुनाव जीत लिया और संसद में जगह पक्की कर ली।

Image result for sheila dixit and rajeev gandhiजल्दी ही वे राजीव के कार्यकाल में राज्य मंत्री भी बना दी गईं। इन पांच सालों में कांग्रेस पर आरोप लगते रहे, कभी बोफोर्स और कभी सिख दंगा। जनता के बीच कांग्रेस की छवि बुरी तरह से धूमिल हो गई। कांग्रेस के धड़े से ही निकल वी.पी. सिंह ने कांग्रेस के खिलाफ नया धड़ा खड़ा कर दिया। इन सबकी बदौलत 1989 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस बुरी तरह से हारी। इस बार दोबारा शीला दीक्षित को कन्नौज से लड़ाया गया और वह बुरी तरह से हारीं।

कन्नौज में बीजेपी के कंडिडेट राम प्रकाश त्रिपाठी ने शीला दीक्षित को 53 हजार वोट से हराया था। ये आखिरी मौका था जब शीला दीक्षित उत्तर प्रदेश से सियासत में दिखीं थीं। हालांकि दिल्ली में तीन दशक गुजारने के बाद शीला दीक्षित 2017 में दोबारा विधानसभा चुनाव में दिखीं थीं।

1991 में शीला दीक्षित के ससुर उमाशंकर दीक्षित का देहांत हो गया। इसके बाद शीला दीक्षित ने दिल्ली की ओर रूख किया। तब तक कांग्रेस सत्ता में आ चुकी थी लेकिन कुर्सी पर नरसिम्हा राव बैठे थे। ये वो दौर था जब गांधी परिवार के करीबी लोगों को सत्ता से दूर किया जा रहा था। जल्दी ही 5 साल गुजर गये और सत्ता में बीजेपी आ गई। अब कांग्रेस की कमान सोनिया गांधी के हाथों में थी। साल 1998 शीला दीक्षित के लिये सबसे अहम रहा। दिल्ली में विधानसभा चुनाव थे, सुषमा स्वराज मुख्यमंत्री थीं।

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तभी प्याज के दाम बढ़ गये और कांग्रेस को सत्ता में आने का मौका मिल गया। तब सोनिया गांधी को ऐसा सीएम चाहिये था जो उनके परिवार का विश्वासपात्र हो और सरकार को अच्छी तरह से चला पाये। इन सभी गुणों में माहिर थीं शीला दीक्षित। शीला दीक्षित पहली बार दिल्ली की मुख्यमंत्री बनीं और फिर इतिहास गवाह है लगातार तीन बार दिल्ली पर उनका एकछत्र राज रहा।

2013 में अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली से शीला दीक्षित और कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया। 2014 में उनको केरल का राज्यपाल बना दिया गया और 2017 में वे फिर से उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उतरीं लेकिन कांग्रेस को उभार नहीं पाईं। ये शीला दीक्षित की कहानी है, ये दिल्ली की मुख्यमंत्री की कहानी है जो अपने ससुर की राजनैतिक विरासत को लेकर आगे बढ़ीं।

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