मैं ऐसी जगह जाना पसंद करता हूं जहां सुकून हो, शांति हो और सबसे बड़ी बात भीड़ न हो। लेकिन जबसे कुंभ के बारे में पता चला था तो दिमाग में बस जाने का सुरूर चढ़ा हुआ था। बस तय नहीं कर पा रहा था कि कब जाऊं? एक दिन अचानक प्लान बना और कुंभ जाना पक्का हो गया। कुंभ इस बार प्रयागराज में हो रहा था। मुझे उस जगह को अच्छी तरह से देखना था।

13 जनवरी 2019 की रात को मैं दिल्ली से प्रयागराज के लिए निकल पड़ा। रात का सफ़र मुझे भाता नहीं है क्योंकि अंधेरा सब अपने में समेट लेता और मैं देख पाता हूं तो अंधेरा और सुनसान सड़क। 12 बजे बस किसी ढाबे पर रूकी। मेरा कुछ लेने का मन नहीं था क्योंकि इधर से कुछ लेना मतलब जेब ढीली करना। तभी मेरी नज़र कुल्हड़ वाली चाय पर पड़ी। मुझे चाय पसंद नहीं है लेकिन कुल्हड़ वाली चाय को मना भी नहीं कर पाता।

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रास्ते में चाय का मजा।

कुल्हड़ वाली चाय मंहगी होनी थी। मैं ये देखकर दंग था कि कुल्हड़ वाली चाय सस्ती और सादा चाय महंगी थी। मैंने चाय की पहली सिप ली कि मन गद-गद हो गया। मैंने कभी भी इतनी अच्छी चाय नहीं पी थी। लग रहा था कि मलाईदार चाय पी रहा हूं। चाय खत्म हुई और बस के चलने का इशारा हो गया। मैं वापस आकर बस में बैठा और बस में उसी चाय के बारे में सोचते-सोचते मेरी आंख लग गई। आंख खुली तो सब कुछ साफ नज़र आ रहा था। दुकानें हमारे प्रयागराज में होने का इशारा कर रहीं थीं। थोड़ी देर में हम सड़क किनारे खड़े थे।

हम सोच रहे थे कि अब सीधे कुंभ मेले ही जाना है। लेकिन अभी तो हम प्रयागराज शहर ही नहीं पहुंचे थे। हम अण्डवा बाई-पास पर खड़े थे। कई ऑटो वालों से मोल-भाव करने के बाद एक ऑटो जाने को तैयार हो गया। लगभग 1 घंटे की यात्रा के बाद हम शहर में ब्रिज के नीचे खडे़ थे। ब्रिज के खंभों पर ऋषियों-देवताओं के चित्र उकेरे हुए थे। सच में ये चित्रकारी सुंदर लग रही थी। वहां से मैं अपने दोस्त के कमरे पर पहुंचा जो सिविल लाइंस में था।

prayagraj city
शहर को देखकर लग ही नहीं रहा था कि यह वही इलाहाबाद (प्रयागराज) है जिसे मैंने 2015 में देखा था। शहर का तो पूरा कायापलट हो गया था। सड़के चौड़ी हो गईं थीं, कोई अतिक्रमण नहीं दिख रहा था। शहर में जगह-जगह शिवलिंग बने हुए हैं। सरकारी स्कूलों पर भी चित्रकारी की गई है। शहर किसी दुल्हन की भांति सजा हुआ प्रतीत हो रहा था। ऑटो में बैठे एक सज्जन कह रहे थे, कि ये सिर्फ राजनीति है। योगी आदित्यनाथ ने प्रयागराज कर दिया है। अखिलेश यादव की सरकार आयेगी तो फिर इलाहाबाद हो जायेगा। ऑटो-चालक को इलाहाबाद से गुरेज़ था। अब किसी की भी सरकार आ जाये, अब प्रयागराज ही रहेगा।

कुंभ चलें

सामान रखकर हम फिर से उसी ब्रिज के नीचे खड़े थे, जहां हम पहले थे। यहीं से अब 3 किलोमीटर चलना था तब संगम तक पहुंच सकता था। रास्ता लंबा जरूर था लेकिन थकाने वाला नहीं। मैं अकेला तो पैदल चल नहीं रहा था। मेरे साथ थे हजारों-लाखों लोग।

जगह नई हो तो पैदल चलने में भी कोई गुरेज नहीं होता। शुरूआत में ही पुलिस का कैंप दिखाई दिया। उसके साथ ही अग्नि-शमन का भी टेंट लगा हुआ था। माइक से लगातार आवाज़ आ रही थी, किसी का बच्चा खो गया है, तो किसी का सामान। लोगों के मिलने की तो सूचना आ रही थी लेकिन सामान खोने के बाद फिर मिले, ऐसी कोई सूचना अब तक नहीं सुनाई दी थी।

color of city
शहर में कलाकारी।

रास्ते में कई प्रकार की दुकानें लगीं थीं। यहां वो सब था जो एक आम मेले में मिलता है। दो-तीन जगह करतब भी हो रहे थे, वो रस्सी वाला। जिस पर एक बच्ची चलती है। कहीं बच्ची डंडा लेकर चल रही थी तो कहीं सिर पर कुछ सामान रखकर। बच्ची की हिम्मत और कला की तारीफ की जानी चाहिए। लेकिन एक छोटी-सी बच्ची से काम कराना सही है। ये अपराध है जो ऐसी जगह पर हो रहा था जिसका आयोजन सरकार ने किया था। चारो तरफ प्रशासन था लेकिन शायद इस तरफ उनकी आंखें बंद थीं।

कुछ आगे चले तो एक चढ़ाई चढ़नी थी। वहीं पर फिर एक कलाकारी दिखी। एक छोटी लड़की दुर्गा का रूप रखकर पैसा मांग रही थी। पैसा मांग नहीं रही थी छीन रही थी। वो छोटी-सी लड़की किसी का भी रास्ता रोककर खड़ी हो जाती और पैसा मांगती। जो नहीं देते, उनको पकड़ लेती। कुछ लोग दे देते और कुछ जोर लगाकर बच निकलते। उस लड़की के साथ एक औरत भी थी। जो अपने चेहरे पर काला रंग लगाकर काली मां बनी हुई थी। जब मैं पास गया तो साफ हुआ कि वो महिला नहीं कोई पुरूष है। ये पैसा भी न, क्या-क्या करवा देता है?

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कुंभ के रंग में रंग रहा है प्रयागराज।

मुझे पहली बार कुंभ में आने का मौका मिला था। जब मैं हरिद्वार रहता था तब भी कुंभ हुआ था लेकिन भीड़ के डर से मैं बाहर ही नहीं निकला था। अब समय बदल चुका है और मैं भी। जिस कुंभ के लिये सात-समुंदर पार से लोग आ रहे हैं तो मैं क्यों नहीं। मैं भी उस कुंभ की भीड़ का एक हिस्सा बन गया था। मैं उनके पीछे-पीछे कदम बढ़ रहा था। ये मानकर कि ये कुंभ नहीं मेरी एक और यात्रा है।

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