डॉ ग्रेगरी स्टैंटन यू.एस. कांग्रेस में जब यह कहते हैं कि “भारत में बड़े नरसंहार की तैयारी चल रही है।“ तब यह सिर्फ एक बयान नहीं रह जाता। सच में कश्मीर और असम में मुसलमानों का उत्पीड़न किसी नरसंहार की ओर इशारा कर रहा है। नोआम चोम्स्की यह लिखते हैं कि “कोल्ड वॉर के अंत के साथ ही पूरी दुनिया में इस वास्तविक प्रलय को नकारा जाने लगा। पिछले कई दशकों से लेखकों ने नरसंहार शब्द को इतना परहेज या संतुलित रूप में प्रयोग किया है कि एक वक्त के बाद, जिन अपराधों के लिए यह शब्द उपयोग में लाया गया वो आधारहीन लगने लगे। वो कई बार इसे इस बात से भी जोड़ कर देखते हैं कि इस शब्द का प्रयोग करना नाज़ियों की यादों के साथ बुरा व्यवहार होगा।“

साल 1970 की शुरुआत में नोआम चोम्स्की और एडवर्ड हरमन ने इस नरसंहार पर एक शॉर्ट स्टडी की। यह स्टडी वियतनाम, फिलीपींस, थाईलैंड, इंडोनेशिया, कंबोडिया, पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) और बुरुंडी में की गई। स्टडी में पाया गया कि अमरीका अपनी प्रभावी प्रवत्ति और अपने खिलाफ उठने वाली क्रांति को दबाने की आदत की वजह से इस तरह के घिनौने और खतरनाक खून-खराबे पर चुप बैठा है और उसे अंजाम दे रहा है।

भारत, अमेरिका से कई मायनों में अलग है। लेकिन, हर समय जब भी विश्व में किसी के दमन के खिलाफ क्रांति उठती दिखाई देती है तो वो इन घिनौने हथकंडों को अपनाने में देर नहीं करता है। जैसे भारत अमेरिका से अलग है वैसे ही कश्मीर और असम मुद्दे भी वियतनाम और विश्व के बाकी नरसंहारों से अलग हैं।

डॉ ग्रेगरी स्टैंटन की एक और स्टडी है, द टेन स्टेजेज़ ऑफ जेनोसाइड। नरसंहार कभी भी किसी अकेले इंसान द्वारा नहीं हो सकता है। इसके पीछे एक बड़ा समूह या कोई सरकार जरूर होती है। लगातार होता पक्षपात भी नरसंहार का एक कारण है। डॉ स्टैंटन ने दस स्टेजेज़ का जिक्र करते हुए बताया है कि नरसंहार की स्थितियों की पहचान कैसे करें।

नरसंहार किसी एक्शन का नाम नहीं होता है। वो उस एक्शन को करने और उसके हो जाने के बीच का प्रोसेस होता है। उस प्रोसेस को आप साफ-साफ देख पाएंगे। वो सब कुछ आपकी आँखों के सामने होता रहेगा। लेकिन, वो इतना कठोर या निष्ठुर नहीं होगा कि आप उसके खिलाफ कुछ करें या कुछ कहें। इसे हर स्टेज पर रोका जा सकता है। इस प्रोसेस की शुरुआत होती है वर्गीकरण से, वर्गीकरण अर्थात बांटना। दुनिया में कई संस्कृतियाँ हैं। सभी संस्कृतियों में कुछ ऐसी श्रेणियाँ बनीं हैं जिनके अंतर्गत लोगों को ‘मैं और तुम’ में बांटा जाता है, जैसे वंश, धर्म, रंग और राष्ट्रियता। यदि समाज इस आधार पर बहुत ज्यादा बंटता रहा तो उस स्थिति में नरसंहार की संभावनाएं बढ़ जाएंगी। ये नरसंहार बहुत छोटे स्तर से लेकर बहुत बड़े स्तर का भी हो सकता है। ऐसी स्थिति में लोगों को यह कोशिश करना चाहिए कि अलग-अलग श्रेणियों के लोग ज्यादा से ज्यादा एक साथ रहें। ऐसा करके हम उस परिस्थिति को रोक सकते हैं। इससे लोग एक दूसरे के प्रति ज्यादा सहिष्णु होंगे और एक दूसरे को समझेंगे। लेकिन यह संभव कैसे है?

इसे सबसे छोटे स्तर से शुरू किया जा सकता है। यानि कि स्कूलिंग के दौरान। स्कूल ही एक मात्र ऐसा स्थान है जहां किसी के साथ ऐसा भेदभाव नहीं होता है। हमें इसी लेवल पर यह कोशिश करनी चाहिए कि बच्चे इस वर्गीकरण को समझ ही न पाएँ या यदि समझें तो बेहतर ढंग से समझें। यहाँ से एक बेहतर भविष्य की कामना की जा सकती है।

इस प्रोसेस की दूसरी स्टेज होती है प्रतीकीकरण, प्रतीकीकरण अर्थात किसी की पहचान को कोई प्रतीक दे देना। वह प्रतीक किसी के लिए भी हो सकता है, वो किसी का नाम, धर्म, पहनावा और राष्ट्रियता कुछ भी हो सकता है। जैसे हम यहूदियों और जिप्सीज़ की उनके पहनावे या रंगों से पहचान करते हैं। वर्गीकरण और प्रतीकीकरण आम तौर पर किसी बड़ी घटना को आमंत्रित नहीं करते हैं क्योंकि यह इंसानी प्रवत्ति में ही शामिल होते हैं। लेकिन, ये आपको अमानवीकरण की ओर जरूर धकेल सकते हैं। जब यह सब कुछ किसी खास घृणा के अंतर्गत होता है तो इस प्रोसेस में अल्पसंख्यकों को न चाहते हुए भी किसी खास चिन्ह या प्रतीक को इस्तेमाल करने के लिए मजबूर किया जा सकता है। जैसे नाज़ियों ने यहूदियों को पीला स्टार और कंबोडिया में सत्ता ने खमेर रूज़* के अनुयाइयों को पीला स्कार्फ पहनने को कहा। कई बार कुछ संस्था खुद ही रंगों और ऐसे प्रतीकों को अपने पहचान के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। यह उस संस्था का अधिकार है कि वो किसी भी प्रतीक या रंग को अपनी पहचान के लिए इस्तेमाल कर सकती है लेकिन, वह तब उलटा पड़ जाता है जब उनके खिलाफ ही भेदभाव शुरू हो जाता है। हेट सिंबल्स भी उतने ही खतरनाक साबित हो सकते हैं जितनी हेट स्पीच। इसे कानूनी तौर पर रोक देना चाहिए। लेकिन, सारे कानून वहाँ धरे के धरे रह जाते हैं जब समाज इन प्रतीकों के खिलाफ बने कानून को अपना समर्थन नहीं देता है।

वर्गीकरण और प्रतीकीकरण हमेशा खतरनाक नहीं होते हैं पर जब ये बड़े स्तर पर होने लगे तो यह अमानवीकरण की ओर धकेलता है। अमानवीकरण वो है कि जब एक वर्ग दूसरे वर्ग को दोयम दर्जे का समझने लगे। इस दोयम दर्जे के वर्ग को इतना दोयम बना दिया जाता है कि इसको बीमारी, जानवर, कीड़े और परजीवी तक की संज्ञा दे दी जाती है। यदि किसी एक वर्ग के बारे मे यह धारणा बना ली जाए कि यह इन्सानों से कमतर हैं तो उनकी हत्या भी आसानी से की जा सकती है। इस प्रक्रिया के दौरान मीडिया का सहारा लेकर पीड़ितों को ही खलनायक बना दिया जाता है। आपके बोलने की आजादी आपसे छीन ली जाती है। यदि एक लोकतान्त्रिक देश, इस स्थिति से गुजर रहा है तो वह अब कतई भी लोकतान्त्रिक नहीं रह जाएगा। इस अमानवीकरण की प्रक्रिया को रोकने के लिए सबसे पहले हेट स्पीच और गलतबयानी पर पूरी तरह से रोक लगाना चाहिए।

नरसंहार कभी एक अकेला इंसान नहीं कर सकता। यह हमेशा संगठित तौर पर होता है खासकर किसी मजबूत सरकार द्वारा या कभी-कभी इन सबसे इतर किसी आतंकवादी संगठन द्वारा। इस प्रक्रिया को भी रोका जा सकता है पर इसमें एक पेंच है। पेंच यह है कि आतंकवादी संगठन पर यूएन द्वारा कोशिश कर रोक लगाया जा सकता है। लेकिन, यदि नरसंहार की प्रक्रिया किसी देश की सरकार द्वारा चलाई जा रही हो तो वहाँ इसे रोकना असंभव तो नहीं पर काफी चुनौतीपूर्ण जरूर हो जाता है। इस स्थिति में सीधे एक्शन की कोई गुंजाइश नहीं है पर जांच और ट्रायल्स चलाकर इसे जरूर रोका जा सकता है जैसा कि पूर्व में रवांडा के नरसंहार के बाद किया गया।

इसके बाद जो प्रक्रिया आती है वो ध्रुवीकरण की होती है। जब एक समूह दूसरे समूह के लिए भ्रांतियाँ और पक्षपातपूर्ण बातें करने लगे तो यह खतरनाक होने लगता है। एक समूह दूसरे समूह से दूरी बनाने लगता है। ऐसे में उदरवादी नेता ही काम आते हैं और यही वो लोग होते हैं जिनकी हत्या पहले की जाती है।

इसके बाद की जो प्रक्रिया है उसके तहत नरसंहार की असल तैयारी होती है। यह तैयारी पीड़ितों को खलनायक के रूप में प्रदर्शित करके की जाती है। देश के अल्पसंख्यकों के खिलाफ एक माहौल तैयार किया जाता है। जनता को यह बताया और भरोसा दिलाया जाता है कि आपको इन अल्पसंख्यकों से खतरा है। यह भी बताया जाता है कि आप इन्हें जान से मार दें। यदि आप इन्हें नहीं मरेंगे तो ये कल आपको मार देंगे। इस प्रक्रिया को वो कई नामों से बुलाते हैं जैसे, नैतिक सफाई, शुद्धिकरण, आतंकवाद विरोधी कदम।

पीड़ितों को उनके धर्म और पहनावे के हिसाब से पहचान कर अलग कर दिया जाता है। मौत की रेखा खींच दी जाती है। सरकारों द्वारा प्रायोजित नरसंहारों में पीड़ितों को किसी खास तरह के प्रतीक पहनने के लिए कहा जाता है। उनकी संपत्तियाँ जब्त कर ली जाती हैं। उन्हें जर्जर बस्तियों में रहने को मजबूर किया जाता है, शिविरों में रखा जाता है, भूखा छोड़ दिया जाता है और मारने के लिए तैयार किया जाता है।

इतना सब कुछ होने के बाद असल तबाही शुरू हो जाती है। यहाँ इसे सिर्फ तबाही इसलिए कहा जाता है क्योंकि आम लोगों के लिए पीड़ित, इंसान के बराबर नहीं होते हैं। जब नरसंहार सरकार द्वारा प्रायोजित होता है तो सैन्य बल स्थानीय समूहों के साथ मिलकर इस कत्लेआम को अंजाम देता है। एक बड़ा समूह दूसरे छोटे समूह पर हमला करता है। जवाब में छोटा समूह भी बराबर हमला करता है। इससे स्थिति दंगे जैसी हो जाती है।

इन सबके बाद और एकदम आखिर में इनकार की प्रक्रिया शुरू होती है, जहां किसी भी प्रकार के सबूत को नष्ट किया जाता है। नरसंहार में मारे गए लोगों की लाशों को जलाया या दफना दिया जाता है, इसके साथ ही गवाहों को डराया-धमकाया जाता है ताकि वो अपने बयान बदल दें या बयान ही न दें। सरकार इस बात से साफ इनकार कर देती है कि ऐसी कोई भी घटना उसके राज्य में हुई है। वो सरकार किसी भी प्रकार की जांच को रोक देती है या जबरन रुकवा देती है और तब तक सत्ता में बनी रहती है जब तक कि उसे बल पूर्वक निकाला न जाए। उस वक़्त के नेता ताउम्र उस घटना को सिरे से नकारते रहते हैं। तब भी, जब उन्हें सरकार बदलने पर ट्रायल के लिए किसी स्पेशल कोर्ट में पेश किया जाता है।

ये नरसंहार की वो प्रक्रियाएँ थीं जिन्हें हमें जानना जरूरी है। हमारे देश में भी हालात नरसंहार से कम नहीं हैं। डॉ ग्रेगरी स्टैंटन इन्हीं प्रक्रियाओं को ध्यान में रखते हुए यह कहते हैं कि कश्मीर और असम में नरसंहार के हालात सिर्फ एक कदम से पीछे रह गए हैं। जिस प्रकार से ऊपर नरसंहार की दस स्टेजेज़ बताई गई हैं, ठीक उन्हीं स्टेजेज़ को फॉलो करते हुए असम भी दिख रहा है। उनके साथ हर प्रकार का भेदभाव होता आया है चाहे वो उन्हें वर्गों में बांट देना हो या उन्हें विदेशी कहकर बुलाना हो, उन्हें किसी खास प्रतीक या चिन्ह से सूचित करना हो। यहाँ तक बात संभाली जा सकती है। लेकिन, जैसे ही नरसंहार की प्रक्रिया अमानवीकरण की ओर बढ़ने लगती है यहाँ से सब कुछ गर्त में जाने लगता है। आम लोग अल्पसंख्यकों के साथ जानवरों सा व्यवहार करने लगते हैं। लोग उन्हें आतंकवादी, जिहादी, जानवर जैसी संज्ञा देना शुरू कर देते हैं। लोग उन अल्पसंख्यकों को राज्य की राजनीति के शरीर पर हुए कैंसर सा समझने लगते हैं।

नरेंद्र मोदी की सरकार में वो सब कुछ हो रहा है जो नाज़ियों के वक़्त यहूदियों के साथ हुआ था। राष्ट्रवाद को फांसीवाद में तब्दील कर दिया गया है। इसी सभा में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये बोलते हुए डॉ अंगना चटर्जी ने कहा कि पिछले 5 अगस्त से कश्मीर में जो बंद के हालात हैं वो कहीं से भी सही नहीं है। रिपोर्ट्स के अनुसार राज्य में कई जगहों से औरतों, बच्चों, बूढ़ों के साथ अमानवीय व्यवहारों की पुष्टि की गयी है। सरकार के सुरक्षा बलों ने लोगों के घरों में घुस कर सम्पत्तियों को नुकसान पहुंचाया और खाने मे कैरोसिन मिला दिया। कई दिनों से वहाँ संपर्क और सूचना व्यवस्था ठप है। पिछले दो महीनों में सेब किसानों को लाखों का नुकसान हुआ।

जम्मू-कश्मीर के पत्रकार रक़ीब हमीद नाईक ने बताया कि यह लॉकडाउन पिछले एक दशक में सबसे बुरा था। आधिकारिक तौर पर तो राज्य में किसी भी प्रकार का कोई बंधन या रोक-टोक नहीं है। लेकिन, यह स्थिति किसी अघोषित आपातकाल से कम भी नहीं है। भारत सरकार ने कहा है कि उनके सुरक्षा बलों द्वारा कश्मीर में किसी की जान नहीं ली गयी है। लेकिन, यह झूठ है, बीते तीन महीनों में 5 लोगों को सुरक्षा बलों द्वारा मारा गया है। यह नंबर और भी अधिक हो सकता है। चूंकि, राज्य में संचार व्यवस्था काम नहीं कर रही थी इसलिए कुछ भी ठीक से बता पाना मुश्किल है। कई नाबालिगों को भी बिना किसी जुर्म के उठा कर जेल में डाल दिया गया। उनमें से एक मुज़ामिल फिरोज राह (17) को पुलिस ने श्रीनगर के उसके घर से आधी रात को उठा लिया था।

राह ने बताया कि जब पुलिस वाले उसे लेने आए और उसे मारने लगे तो उसकी माँ इस बात के विरोध में उन्हें रोकने लगी, इस पर एक पुलिस वाले ने कहा कि चुप रहो वरना इसे मार देंगे। उसे किसी छोटे और अंधेरे सेल में 15 अन्य नाबालिगों के साथ रखा गया। उसे किसी सामान की तरह एक पुलिस स्टेशन से दूसरे पुलिस स्टेशन ले जाया गया। यहाँ तक कि जब उसके पिता उससे मिलने जेल गए तो उन्हें भी दो दिन के लिए जेल में डाल दिया गया। संचार व्यवस्था के ठप होने से राज्य एकदम ठहर सा गया था। हेल्थकेयर, बैंकिंग, एजुकेशन और आई.टी. सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। ई-कॉमर्स जो पूरा का पूरा इंटरनेट पर ही निर्भर है वो पूरी तरह से बंद हो गया। उसके बंद होने से करीब 10,000 लोगों की नौकरियाँ चली गईं। बच्चे मेडिकल और इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षाओं के फॉर्म तक नहीं भर पाए। यातायात बंद होने के कारण लोग अस्पताल नहीं जा पा रहे। जरूरी दवाएं और सुविधाएं पहुँचने में बहुत देर हो रही है।

कुछ ऐसे ही हालात असम में भी हैं। असम में मानवाधिकार के लिए काम करने वाली तीस्ता सीतलवाड़ ने कहा कि असम में एनआरसी के कारण लोगों के मानवाधिकारों का हनन हुआ है। इसके पालन में कई नियम और कानून हैं जिन्हें बिलकुल नजरंदाज करते हुए खूब मनमानी की गयी है। एनआरसी के जारी करने का सबसे बड़ा कारण है बहुभाषी और कई अलग-अलग संस्कृतियों को आपस में लड़ाना। इससे शांति भंग हुई है। उन्होंने सीएबी की भी निंदा करते हुए कहा कि यह भारत गणराज्य पर चोट है। यह भारत की आत्मा, उसके संविधान के साथ छल है। देश के गृह मंत्री अमित शाह लोगों को इस बिल से ठग रहे हैं। हमारा देश धर्मनिरपेक्ष रहा है। यहाँ धर्म के आधार पर किसी की नागरिकता नहीं तय की जाएगी।

ये स्टडी भी अपने आप में सोचने पर मजबूर करती है। देश के प्रधानमंत्री जब साफ-साफ कहने लगते हैं कि आप उनके कपड़ों से पहचानिए कि ये विरोध करने वाले कौन लोग हैं, तो आपको अपने दिमाग में नरसंहार की प्रक्रिया प्रतीकीकरण के बारे में सोचना चाहिए। जब उन्हें गृह मंत्री यह कहकर अलग बताने लगें कि वो घुसपैठिए हैं तो इसे आप अमानवीकरण की प्रक्रिया को ध्यान में ले आइये। जब सोशल मीडिया पर नागरिकता संशोधन कानून का विरोध करते छात्रों की तस्वीरें और वीडियो वायरल होने लगते हैं और देश की आम जनता उन्हें आतंकवादी और जिहादी बताने लगे तो आप इसे नरसंहार की प्रक्रिया अमानवीकरण से जोड़ कर देखें। यह सब कुछ आप जोड़ें, देखें और समझें। देश, बेहतर भविष्य की कामना करते-करते भूतकाल में अटक गया। भारत समय में पीछे की ओर चला जा रहा है। जो एक नए भारत का सपना था, वो शायद इसी भारत का सपना था।

                                                    -करुणेश किशन

*खमेर रूज़- [वो नाम जिससे कंबोडिया (तब के कम्पोचिया) की साम्यवादी पार्टी के अनुयायियों को संबोधित किया जाता था।]