लोकतंत्र का महापर्व शुरु हो चुका है। इस महापर्व में राजनीति की कई अलग-अलग तस्वीरों का दिदार हो रहा है। कभी इवीएम मशिन को लेकर तस्वीरें बदल रही है तो कभी चुनाव में उम्मीदवारों के बदजुबानी बयान से। कुछ ऐसे भी मुद्दे हैं जो इस चुनावी मौसम के तापमान को हमेशा गरम रखने में मदद कर रहे हैं। चाहे वो राजनितिक दलों द्वारा जातिवाद के नाम पर मतदाताओं का आपस में बंटवारा कर देना हो या फिर एक दूसरे पर बयानबाजी का हुजूम। किसी भी तरह से इस लोकसभा चुनाव के माहौल को राजनीतिक तपीस में जलाने के लिए हर संभव प्रयास किया जा रहा है।

फोटो सोर्स: गूगल

लोकसभा चुनाव का पहला पड़ाव 11 अप्रैल को समाप्त हो गया। जिसके बाद लोगों में चुनाव को लेकर उठ रहे सवालों का थोड़ा बहुत जवाब मिल गया होगा। खैर यह तो महज ट्रेलर था जो पहले चरण के मतदान में दिखा। पूरी फिल्म अभी बाकि है क्योंंकि अभी कुछ जगहों पर उम्मीदवार तय नहीं है तो कुछ जगहों पर घोषित उम्मीदवार अपना चुनाव का प्रचार-प्रसार करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। देश के चुनिंन्दा कुछ लोकसभा सीटों पर सबकी निगाहें टिकी हुई है। पूरे भारत की निगाह इस वक्त उत्तर प्रदेश पर टिकी हुई है। ऐसा इसलिए नहीं कि उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव में टक्कर त्रिकोणिय है, बल्कि इसलिए की चुनावी आंकलन दिलचस्प होता दिख रहा है कि आखिर वाराणसी से प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ़ चुनावी मैदान पर कौन चुनौती स्वीकार करेगा? इस पर अभी भी प्रश्नचिन्ह बना हुआ है।

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लोकसभा चुनाव का प्रचार अपने शबाब पर है। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि इस बार प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ कौन चुनावी टक्कर देने वाला है। पिछले बार आप पार्टी के प्रमुख अरविन्द केजरिवाल मोदी के खिलाफ मैदान में थे लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। ऐसे में इस बार कोई भी पार्टी काशी से अपने प्रत्य़ाशी घोषित करने से पहले कई बार सोच रही है। लेकिन अगर कांग्रेस के इशारों को समझने की कोशिश करें तो ऐसा लगता है कि काशी लोकसभा से प्रियंका गांधी प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ चुनावी मैदान में हो सकती है। इस बात पर प्रियंका गांधी भी कई बार इशारा कर चुकी है। अपने भाषण में भी प्रियंका इस बात को कह चुकी है कि अगर पार्टी ने मौका दिया तो मै काशी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ना पसन्द करुंगी।

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पार्टी के महासचिव बनने के बाद प्रियंका काफी सक्रिय है। उत्तर प्रदेश के लगभग सभी लोकसभा सीटों पर इनका प्रभाव देखने को मिल रहा है। बनारस में जिस तरह से बाबा विश्वनाथ के दर्शन में रोड शो के दौरान लोगों की भीड़ देखने को मिली उससे एक बात तो साबित हो गई कि इस बार अगर प्रियंका बनारस से चुनावी बिगुल फुंकती है तो प्रधानमंत्री मोदी के लिए यह खतरे की घंटी है। क्योंकि जब-जब कांग्रेस संकट में पड़ी है, प्रियंका ने उन्हें उस संकट से उबारा है।

एक नज़र इतिहास पर   

प्रियंका गांधी, गांधी परिवार की एक ऐसी सदस्य रही है जिनके बारे में कहा जाता है कि इनका राजनीति से कोई ख़ास लगाव नहीं है। यह बस अपने भाई राहुल गांधी का चुनावों में सहयोग करने के लिए आती है। लेकिन अगर कांग्रेस के इतिहास पर नज़र डाले तो प्रियंका हमेशा से ही कांग्रेस के लिए संकटमोचन साबित हुई है। इतिहास के पन्नों को पलटे तो 1999 का वह चुनावी दौर आज भी ताजा हो जाता है जब गांधी-नेहरु परिवार से जुड़ी रायबरेली लोकसभा सीट पर कांग्रेस ने कैप्टन सतीश शर्मा को चुनावी मैदान में उतारा था और उनके सामने गांधी परिवार के ही सबसे ख़ास जो उस लोकसभा चुनाव में विरोधी खेमे में खड़ा था, नाम अरुण नेहरू। कहने के लिए तो राजीव गांधी के भाई लेकिन 1999 की लोकसभा चुनाव में अगर रायबरेली सीट पर कांग्रेस को किसी से सबसे ज्यादा डर था तो वह अरुण नेहरू ही थे। कभी राजीव गांधी के सबसे खास कहे जाने वाले अरुण नेहरू राजीव गांधी की हत्या के बाद उनके खिलाफ ही साजिश रचने लगे और इसमें उनका साथ दिया वी पी सिंह ने।

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जब राजीव गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस के सामने जब समस्या आई कि आखिर रायबरेली और अमेठी में कांग्रेस का प्रतिनिधित्व कौन करेगा तो उस समय प्रियंका ने ही हामी भरी थी। फिर जो हुआ वह इतिहास बन गया। 27 साल की प्रियंका कांग्रेस के लिए रायबरेली और अमेठी में जब भाषण देने के लिए मंच पर गई तो सभी लोगों को उनमें इंदिरा का रुप दिखाई देने लगा था। राहुल गांधी उस वक्त अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए हावर्ड गए हुए थे। इसलिए प्रियंका ने अपने पिता और दादी के तर्ज पर रायबरेली और अमेठी में 15-20 जनसभाएं की और लोगों को लग गया कि एक बार फिर से उनके बीच इंदिरा के रुप में प्रियंका ने कदम रखा है। इसलिए लोगों ने सतीश शर्मा को वोट दिया और सतीश लोकसभा चुनाव जीतने में कामयाब हो गए।

जब 1999 में गठबंधन का दौर हुआ था शुरु, फोटो सोर्स: गूगल

प्रियंका की इस उपलब्धी के बाद एक बार फिर यह कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या प्रियंका 1999 के इतिहास को दोहराएगी? क्योंकि प्रियंका कांग्रेस के बाकी नेताओं की तरह राजनीति में ज्यादा सक्रिय नहीं रही है लेकिन जब भी रही विपक्षियों को हार का ही सामना करना पड़ा है। इसलिए अगर वाराणसी से प्रियंका कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करती है तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए यह लोकसभा चुनाव आसान नहीं होगा।

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