आज़ादी के बाद के समय को हम गांधी का समय कहें तो गलत नहीं होगा। आज़ादी के पहले जितने भी आंदोलन या बड़ी क्रांतियां हुई। उसमें कहीं न कहीं, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से गांधी जी शामिल होते ही थे। लेकिन उस लंदन वाले गांधी को बनाने का काम किया एक आंदोलन ने, एक व्यक्ति की जिद ने। अगर वो व्यक्ति जिद न करता तो शायद गांधीजी को देर से या कहीं और देखते। लेकिन उस व्यक्ति ने गांधीजी को अपनी लड़ाई का नेता चुना।

हम बात कर रहे हैं रहा हूं चंपारण आंदोलन की। चंपारण आंदोलन से हम गांधीजी की पहली सफल सीढ़ी को तो याद कर लेते हैं लेकिन उसको भूल जाते हैं जिसकी जिद और लगन के कारण गांधीजी चंपारण आने को तैयार हुये थे। अपने चंपारण को बचाने के लिए जिद्दी रूख रखने वाले इस शख्स का नाम है राजकुमार शुक्ल। राजकुमार शक्ल का जन्म 23 अगस्त 1875 को पश्चिमी चंपारण में हुआ था और 20 मई 1929 को निधन हुआ।

राजकुमार शुक्ल, फोटो सोर्स- गूगल

आज़ादी के पहले भारत में अधिवेशनों का दौर चला करता था। ऐसा ही एक अधिवेशन 27 दिसंबर 1916 को नवाबों के शहर में हुआ था। कांग्रेस के हर अधिवेशन की तरह इसका भी दृश्य एक-समान था। लेकिन उस व्यक्ति की दास्तान और दुःख अलग थे, जिसे अधिवेशन में एक प्रस्ताव की तरह रखा जा रहा था।

उस अधिवेशन में हजारों लोग थे। सबको देखकर लग रहा था कि कोई भी उस प्रस्ताव को सुनने के मूड में नहीं है। लेकिन उस गंवई, बिहार के किसान को इस बात की कतई चिंता नहीं थी। उसे तो अपने हुक्मरानों तक अपने दुःख-दर्द की दास्तान सुनानी थी। वो दास्तान थी अंग्रेजों के शोषण की जो उन पर दिन-ब-दिन बढ़ता ही जा रहा था। यह कहानी थी, नील की। जिसने उनकी जिंदगी में कालापान ला दिया। उनको जमींदार और अंग्रेज दोनों मिलकर लूट रहे थे। जो उनके खिलाफ जाता, उनको मार दिया जाता या जेल में डाल दिया जाता। तब राजकुमार शुक्ल नाम को लगा कि ऐसे तो ये हमको कंगाल कर देंगे और आ गया अपने हुक्मरानों के पास।

चंपारण आंदोलन में महात्मा गांधी, फोटो सोर्स- गूगल

वह गंवई लड़का यहां अपनी दास्तान तो सुनाने आ गया था। वो चाहता था कि उसकी परेशानी सुनकर इस प्रस्ताव को पास किया जाए और कांग्रेस के बड़े नेता उनके साथ चलें। लेकिन दिक्कत ये थी कि उसे अंग्रेजी तो दूर हिंदी भी सही से नहीं आती थी। लेकिन उसे बोलना था क्योंकि उसकी परेशानी नहीं थी, पूरे चंपारण की परेशानी थी। इसलिए वह बोला।

उस गंवई किसान की दास्तान

“इस अधिवेशन में देश के कोने-कोने से पहुंचे सभी लोगों को चंपारण की धरती से आए इस किसान राजकुमार शुक्ल का राम-राम। आज हम आप लोगों को अपने इलाके के किसानों की व्यथा सुनाने जा रहे हैं। हमारे इलाके में विलायती अंग्रेज नील की खेती करवाते हैं। इन निलहे अंग्रेजों के साथ लंबे समय से हमारे यहां के किसानों-मजदूरों का तालमेल बैठ नहीं रहा है। इन अंग्रेजों ने नील की खेती कराने के लिए रामनगर और बेतिया के राजा से जमीन लीज पर ली है। उनकी शर्त के मुताबिक हम लोगों को हर एक बीघा जमीन में से तीन कट्ठा को नील उगाने के नाम पर अलग रख देना पड़ता है। हालांकि ये अंग्रेज लोग इतने से भी खुश नहीं होते। वे गरीब रैयतों से मुफ्त में मजदूरी तो कराते ही हैं, उनके साथ बहुत बुरा बर्ताव भी करते हैं। वे लोग इतने ताकतवर हैं कि अपने इलाके के दीवानी और फौजदारी मुकदमों का फैसला भी खुद कर लेते हैं और जिसको जैसा जी में आए, वैसा फैसला सुना देते हैं। हम लोगों ने सरकार से कई बार अनुरोध किया है कि वह इस मामले ही जांच कराए। मगर बार-बार कहने पर भी सरकार इस अनुरोध पर ध्यान नहीं देती है।

1908 ईस्वी में इस बात को लेकर चंपारण में बड़ा बवाल मचा था। उस वक्त बंगाल की सरकार ने एक अफसर को इस मामले की जांच कराने के लिए भेजा भी। लेकिन उस जांच की रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया गया और उल्टे सैकड़ों किसानों को जेल भेज दिया गया। हम भी चंपारण के रैयत हैं और हमको मालूम नहीं कि यहां से जब हम लौटेंगे तो यहां अपनी दुःख भरी कहानी सुनाने की सजा हमें क्या दी जाएगी?”

यही राजकुमार शुक्ल का व्याख्यान है। जिसके बाद लोगों को चंपारण में हो रहे किसानों के खिलाफ अत्याचार के बारे में पता चला। यही वो जगह है जहां गांधीजी ने उस गंवई को सुना था और उसने एक गुजराती को देखा था, जिसने चंपारण आकर उन किसानों की मदद की।

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