12 जनवरी 2018 को एक चिट्ठी न्यायपालिका विभाग का चक्कर काट रही थी। भारतीय राजनीति में भी उस दिन काफी हलचल थी। भारत के इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट के चार जज, प्रेस से मुख़ातिब होने वाले थे। यह एक ऐसा दौर चल रहा था जब सुप्रीम कोर्ट अनचाही वजहों से सुर्खियों में था। सुर्खियों के पीछे की वजह था रोस्टर सिस्टम। यानि वह लिस्ट जिसमें दर्ज किया जाता है कि, किस बेंच के पास कौन सा केस जाएगा और उसकी सुनवाई कब होगी। इन सभी बातों का फैसला चीफ जस्टिस करता है। जो चार जज प्रेस कॉफ्रेंस करने वाले थे उनमें रंजन गोगोई भी थे।

इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था कि किसी ने भी सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के काम करने के तरीके पर सवाल उठाया हो। उस दिन जस्टिस चेलमेश्वर के साथ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन भीमराव लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ़ भी मीडिया के सामने थे। बस इसी घटना के बाद जस्टिस रंजन गोगोई सभी के नज़रों में आ गए।

रंजन गोगोई पूर्वोतर से आने वाले पहले मुख्य न्यायधीश हैं। 18 दिसंबर 1954 को असम में पैदा हुए रंजन गोगोई के पिता केशव चंन्द्र गोगोई असम के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। दो भाईयों में छोटे रंजन गोगोई के बारे में यह भी कहा जाता है कि उनकी किस्मत का फैसला एक सिक्के से हुआ। दरअसल, पिता का कहना था कि वह दो भाईयों में किसी एक को ही सैनिक स्कूल में भेज सकते हैं। इस पर दोनों भाईयों ने सिक्का उछालकर इसका फैसला किया और फैसला बड़े भाई अंजन गोगोई के पक्ष में आया। बड़े भाई सैनिक स्कूल चल गए और फिर आगे चलकर एयर मार्शल बनें।

आर्मी स्कूल में दाखिला न मिलने की वजह से रंजन गोगोई ने डिब्रूगढ़ के डॉन बॉस्को से स्कूलिंग की और फिर दिल्ली आ गए। दिल्ली यूनिवर्सिटी से उन्होंने इतिहास विषय में ग्रेजुएशन की और यही से कानून की डिग्री भी ली। साल 1978 में असम से बतौर एडवोकेट अपने करियर की शुरुआत करने वाले रंजन गोगोई पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश रहे। चीफ जस्टिस बनने से पहले वह सुप्रीम कोर्ट में सीनियर जज थे।

सुप्रीम कोर्ट में जज बनने के बाद ही 12 जनवरी 2018 को रोस्टर मामला हो गया। उसमें जिस तरह से रंजन गोगोई की भूमिका रही, उसे देखते हुए बातें होनी शुरु हो गई कि केंद्र सरकार चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के उत्तराधिकारी के तौर पर गोगोई की जगह किसी और नाम पर विचार कर रही है। लेकिन 13 सितंबर 2018 को ये सभी बातें महज एक अफवाह बन कर रह गई। राष्ट्रपति भवन ने एक चिट्ठी जारी की जिसमें यह लिखा गया था कि जस्टिस रंजन गोगोई सुप्रीम कोर्ट के अगले चीफ जस्टिस होंगे। उनका यह पद भार 3 अक्टूबर 2018 से लागू हो जाएगा।

चीफ जस्टिस बनने के बाद पहला सवाल यही था कि जिस वजह से रंजन गोगोई चर्चा में आए थे क्या उसमें कोई बदलाव देखने को मिलेगा? यानि रोस्टर मामला में बदलाव होने की उम्मीद सभी को थी। लेकिन, रोस्टर को जैसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया हो, उसकी चर्चा तक नहीं हुई। चीफ जस्टिस बनने के 7 महीने बाद रंजन गोगोई की लाइफ में एक ऐसा भी इंसिडेंट हुआ, जिसे वो शायद ही याद रखेंगे। उनकी जूनियर असिस्टेंट ने उनके ऊपर यौन उत्पीड़न का आरोप लगा दिया। आरोप लगाने वाली महिला ने एक चिट्ठी सुप्रीम कोर्ट के सभी 22 जजों को भेजी। जिसमें जस्टिस गोगोई पर यौन उत्पीड़न करने, इसके लिए राज़ी न होने पर नौकरी से हटाने और बाद में उन्हें और उनके परिवार को तरह-तरह से प्रताड़ित करने के आरोप लगाए गए। इन सभी आरोपों के बारे में चीफ जस्टिस रंजन गोगोई का कहना था कि

महिला द्वारा मेरे ऊपर लगाया आरोप बेबुनियाद है। जिस महिला ने कथित तौर पर उन पर आरोप लगाए हैं वो आपराधिक रिकॉर्ड की वजह से चार दिनों के लिए जेल में थीं और कई बार उन्हें अच्छा बर्ताव करने को लेकर पुलिस से हिदायत भी दी गई थी। यह जुडिशरी को अस्थिर करने की एक ‘बड़ी साज़िश’ है

बात इतनी सीधी-सादी भी नहीं थी। इस मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच कमेटी बिठाई गई। जिसका नेतृत्व जस्टिस बोबडे कर रहे थे। जस्टिस बोबडे, चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई के बाद सबसे सीनियर जज थे और उनके उत्तराधिकारी भी। इस मामले में अपना नाम साफ करने के लिए जस्टिस गोगोई सरकारी वकीलों पर निर्भर हो गए।

फोटो सोर्स: ट्विटर
फोटो सोर्स: ट्विटर

ये मामला इसलिए भी ऐतिहासिक था क्योंकि भारत में पहली बार जज खुद पर लगे आरोप के बारे में सुनवाई कर रहे थे। वकीलों का कहना था कि इस तरह की सुनवाई, यौन उत्पीड़न की शिकायत के लिए तय प्रक्रिया का उल्लंघन है। लोगों का मानना था कि गोगोई स्वतंत्र होकर इस केस का फैसला सुनाएंगे। लेकिन यौन उत्पीड़न वाले विवाद में फंसने के बाद वे भारत के मुख्य न्यायाधीश से की गई उम्मीदों पर खरे नहीं उतर पाए।

17 नवंबर 2019 को रिटायर होने वाले जस्टिस रंजन गोगोई कोे लेकर लोगों की सोच यही है कि क्या रंजन गोगोई को सिर्फ अयोध्या मामले के लिए याद किया जाएगा? तो इसका जवाब है, नहीं।

चीफ जस्टिस पद पर रहते हुए रंजन गोगोई ने 13 महीनों में 47 अहम फैसले सुनाए हैं। 15 और 17 फरवरी 2016 को जब कन्हैया कुमार को सुप्रीम कोर्ट लाया जा रहा था, उसी वक्त उन पर हमला हो गया। इसी घटना पर एक याचिका वरिष्ठ वक़ील कामिनी जयसवाल ने दायर की थी। जिसमें यह कहा गया कि छात्रसंघ नेता कन्हैया कुमार पर हुए हमले में विशेष जांच टीम बनाई जाए। इस याचिका को रंजन गोगोई ने खारिज कर दिया।

फेयरवेल के दौरान चीफ जस्टिस रंजन गोगोई और अन्य, फोटो सोर्स: गूगल
फेयरवेल के दौरान चीफ जस्टिस रंजन गोगोई और अन्य, फोटो सोर्स: गूगल

रंजन गोगोई छोटे-छोटे मसलों पर दायर होने वाली जनहित याचिकाओं को स्वीकार न करने के लिए भी जाने जाते हैं। कई मौकों पर उन्होंने याचिकाकर्ताओं पर ऐसी याचिकाएं दायर करने और अदालत का समय बर्बाद करने के लिए भारी जुर्माना भी लगाया है। साल 2016 में जस्टिस गोगोई ने सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज मार्कंडेय काटजू को अवमानना का नोटिस भेज दिया था। अवमानना नोटिस के बाद जस्टिस काटजू सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए और उन्होंने फेसबुक पोस्ट के लिए माफी मांगी। यही नहीं रंजन गोगोई उस पीठ का भी हिस्सा रहे, जिसने लोकपाल अधिनियम को कमजोर करने के सरकार के प्रयासों को विफल कर दिया था।

बहुत बार ऐसा हुआ है जब सुुप्रीम कोर्ट के ही फैसले पर सवाल खड़े कर दिए गए हैं। जैसे गुजरात में सरदार सरोवर बांध पर सुप्रीम कोर्ट का दिया गया फैसला। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट को भी सूचना के अधिकार के अंतर्गत लाया जाएगा। यह फैसला रंजन गोगोई के पांच बेंचों की जज ने सुनाया। मतलब अब अगर कोई भी आम आदमी चाहे तो, जजों की चल-अचल संपति की जानकारी ले सकता है। कुछ जानकारियां जो नीजी है, उसे देने से सुप्रीम कोर्ट ने मना जरुर किया है।

इसके अलावा रंजन गोगोई के जीवन में एक और इतिहास का पन्ना उस वक्त जुड़ गया जब, उन्होंने सबरीमाला केस पर फैसला सुनाया था। केरल हाई कोर्ट ने जब सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को सही ठहराया था तो, उस वक्त सुप्रीम कोर्ट में इसको लेकर याचिका दायर की गई थी। जिसपर फैसला सुनाते हुए रंजन गोगई की नेतृत्व वाले 5 बेंचों के जज ने महिलाओं के प्रवेश पर लगा बैन हटा दिया था। हालांकि अभी भी यह मामला सात जजों के बेंच के पास पुर्नविचार के लिए भेजा गया है। लेकिन, 1990 से चला आ रहा यह मामला अब अपने अंतिम चरण में है, ऐसा कहा जा सकता है।

जस्टिस बोबड़े और रंजन गोगोई, फोटो सोर्स: गूगल
जस्टिस बोबड़े और रंजन गोगोई, फोटो सोर्स: गूगल

सरकारी विज्ञापन पर नेताओं की तस्वीर को हटाना, राजनीतिक नज़रिए से काफी अहम माना जा रहा है। यह फैसला भी रंजन गोगोई और पी. सी. घोष की पीठ ने सुनाया था। फैसले के बाद से सरकारी विज्ञापन में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, चीफ जस्टिस, संबंधित विभाग के केंद्रीय मंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, संबंधित विभाग के मंत्री के अलावा किसी भी नेता की सरकारी विज्ञापन पर तस्वीर प्रकाशित करने पर पाबंदी है। इसके पीछे की वजह का पता इसी बात से चल सकता है कि सिर्फ विज्ञापन पर साल 2014-19 के बीच मोदी सरकार ने 1603 करोड़ रुपये खर्च कर दिए थे। इस बात का खुलासा एक RTI के बाद हुआ है।

कई बार ऐसा होता है कि पक्षकार कोर्ट का फैसला नहीं समझ पाता क्योंकि, सुप्रीम कोर्ट का फैसला अंग्रेजी में आता था। इसी बात को देखते हुए रंजन गोगोई ने फैसला किया कि अब कोर्ट के फैसले हिंदी, अंग्रेजी के अलावा 7 भाषाओं में आएंगे। इसके अलवा NRC पर जिस तरह का विवाद पिछले लंबे समय से चल रहा था उसपर भी उन्होंने फैसला सुनाया। गोगोई का कहना था कि NRC केवल 19 लाख से 40 लाख लोगों की बात नहीं है बल्कि, आने वाले समय में प्रमुख दस्तावेज बनने वाला है।

वे 5 जज, जिन्होंने अयोध्या विवाद का फैसला सुनाया, फोटो सोर्स: गूगल
वे 5 जज, जिन्होंने अयोध्या विवाद का फैसला सुनाया, फोटो सोर्स: गूगल

लोकसभा चुनाव 2019 का चुनावी प्रचार का एक ही अधार था चौकीदार चोर है और मैं भी चौकीदार हूं। राहुल गांधी ने लोकसभा चुनाव के दौरान पूरी तरह से इस मुद्दे को उछाले रखा और मोदी सरकार, अपने उपर लगे आरोप को साफ करती रही। मामला सुप्रीम कोर्ट में था। सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाली गई थी कि डील को लेकर किसी प्रकार की कोई पारदर्शिता नहीं है। जिसके बाद कोर्ट ने सीलबंद लिफाफे में डील की कीमत बताने को कहा था। 15 जनवरी 2019 को सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा था कि,

ऐसा कोई सबूत नहीं मिला, जिससे प्रक्रिया पर संदेह किया जाए। हम इस बात से संतुष्ट हैं कि प्रक्रिया को लेकर संदेह करने का कोई मौका नहीं मिला। इसके बाद भी कोर्ट में पुर्नविचार के लिए याचिका डाली गई लेकिन, रंजन गोगोई की बेंच ने यह कहकर मना कर दिया कि इस याचिका में दम नहीं है। अदालत को इस मामले में और समीक्षा की ज़रुरत नहीं है। डील में किसी प्रकार की कोई चोरी नहीं हुई है।

इस केस के अलवा जिसके लिए शायद रंजन गोगोई को हमेशा याद रखा जाएगा वह है, 40 सालों से चला आ रहा अयोध्या विवाद को खत्म करने का। यह गोगोई के सबसे अहम और एतिहासिक फैसलों में से एक है। अयोध्या में मंदिर-मस्जिद विवाद पर 9 नवंबर, 2019 को अंतिम फ़ैसला दे दिया। जो मामला पिछले कई दशकों से लटका हुआ था उसका रंजन गोगोई ने आखिर अंत कर दिया। रंजन गोगोई आज 65 साल के हो गए हैं। आज सही मायने में उनके पिता की कही हुई बात सफल हो गई होगी। क्योंकि एक बार असम के पूर्व कानून मंत्री अब्दुल मूहीम मजुमदार ने रंजन गोगोई के पिता से पूछा था कि क्या आपका लड़का भी आने वाले समय में असम का मुख्यमंत्री बनेगा? इस सवाल पर केशव चन्द्र गोगोई ने कहा था

“मेरा बेटा एक दिन असम का मुख्यमंत्री नहीं बल्कि देश का चीफ जस्टिस बनेगा।”