रविन्द्रनाथ टैगोर, भारत की आजादी की इबारत से लेकर उसके आजादी के राष्ट्र गान तक लिखने वाले महानायक आज के समय में कितने प्रासंगिक हैं यह जानना बेहद जरुरी है.

जब तक मैं जिन्दा हूँ मानवता के ऊपर देशभक्ति कि जीत नहीं होने दूंगा.

रवीन्द्रनाथ टैगोर का जन्म 7 मई, 1861 को कोलकाता (पहले कलकत्ता) के एक प्रतिष्ठित और कला प्रिय परिवार में हुआ. रवीन्द्रनाथ टैगोर यूं तो बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे, पर बंगाली साहित्य में उनका अप्रतिम योगदान रहा. उन्होंने महाकाव्य को छोड़कर तकरीबन सभी विधाओं में साहित्य रचना की. रवीन्द्रनाथ ने करीब ढाई हजार गीत लिखे और संगीतबद्ध किए. जीवन के अंतिम वर्षों में उनका झुकाव पेंटिंग की ओर हुआ और उन्होंने करीब 3 हजार पेंटिंग्स बनाई. उनके बड़े भाई श्री सत्येन्द्रनाथ आईसीएस परीक्षा पास करने वाले प्रथम भारतीय थे. टैगोर का विवाह 9 दिसंबर 1893 को मृणालिनी देवी के साथ हुआ था.

रवीन्द्रनाथ का व्यक्तित्व बड़ा प्रभावशाली था. वे अपने लम्बे केश, लहराती हुई दाढ़ी और ऊंची-पतली काया के कारण प्राचीन भारत के ऋषियों के समान जान पड़ते थे. उनका स्वभाव धार्मिक, हृदय विशाल और विचार उदार थे. उन्होंने उस प्राचीन भारतीय संस्कृति को पुनः जीवित कर दिखाया, जो लगभग मर चुकी थी.

अंग्रेजी शासन ने हिन्दू-मुसलमानों में फूट डालने के लिए बंगाल के विभाजन की योजना बनायी. टैगोर ने अंग्रेजों की इस साजिश का जमकर विरोध किया. उन्होंने रक्षाबंधन के त्योहार को स्वतंत्रता के धागे में पिरोया. उनका कहना था कि राखी केवल भाई-बहन का त्योहार नही है अपितु ये इंसानियत का पर्व है, भाई-चारे का पर्व है. जहाँ जाति और धार्मिक भेद-भाव भूलकर हर कोई एक दूसरे की रक्षा कामना हेतु वचन देता है और रक्षा सूत्र में बंध जाता है.

रवींद्रनाथ टैगोर कवि के साथ ही महान संगीतकार भी थे

गुरुदेव के नाम से प्रसिद्ध रवींद्रनाथ टैगोर एक विश्वविख्यात कवि, साहित्यकार और दार्शनिक थे. वे अकेले ऐसे भारतीय साहित्यकार हैं जिन्हें नोबेल पुरस्कार मिला है.

वह नोबेल पुरस्कार पाने वाले प्रथम एशियाई और साहित्य में नोबेल पाने वाले पहले गैर यूरोपीय भी थे. वह दुनिया के अकेले ऐसे कवि हैं जिनकी रचनाएं दो देशों का राष्ट्रगान हैं भारत का राष्ट्र-गान जन गण मन और बाँग्लादेश का राष्ट्रीय गान आमार सोनार बाँग्ला.

-रवींद्रनाथ टैगोर ने अनेक कवितायें, लघु कहानियाँ, उपन्यास, नाटक और निबंध लिखे. उनकी रचनाएं सर्वप्रिय हो गयीं.

-टैगोर एक दार्शनिक, कलाकार और समाज-सुधारक भी थे. कलकत्ता के निकट इन्होने एक स्कूल स्थापित किया जो अब ‘विश्व भारती’ के नाम से प्रसिद्द है.

-रवींद्रनाथ टैगोर ने साहित्य, शिक्षा, संगीत, कला, रंगमंच और शिक्षा के क्षेत्र में अपनी अनूठी प्रतिभा का परिचय दिया. अपने मानवतावादी दृष्टिकोण के कारण वह सही मायनों में विश्वकवि थे.

गांधी जी से खूब चर्चा किया करते थे.

सामाजिक कार्यकर्ता दीनबन्धु सी. एफ. एंड्रूयज, महात्मा गांधी और टैगोर के करीबी मित्रों में से एक थे. गांधी जी ने उन्हें दीनबन्धु की उपाधि दी थी. गांधी और टैगोर के बीच की चर्चा का वर्णन करते हुए एंड्रूयज बताते है कि ‘दोनों के विचार कई मुद्दों पर बंटे हुए रहते थे. चर्चा का पहला विषय होता था मूर्ति पूजा. गांधी इसके पक्षधर थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि जनता इतनी जल्दी किसी भी निराकार, अमूर्त रूप को स्वीकार करने के लायक नहीं हैं. वहीं टैगोर जनता को हमेशा बच्चा समझे जाने के पक्ष में नहीं रहते थे.

गांधी यूरोप का उदाहरण देते थे जहां झंडे को आराध्य समझकर काफी कुछ हासिल किया गया। टैगोर इससे सहमत नहीं दिखते थे। दूसरा मुद्दा राष्ट्रीयता का होता था, गांधी इसका बचाव करते थे। वह कहते थे कि अंतर्राष्ट्रीयता को हासिल करने के लिए राष्ट्रीयता से गुजरना जरूरी है।

आजादी से जुड़े आंदोलनों को टैगोर का पूरा समर्थन था, लेकिन देशभक्ति को लेकर उनके मन में कुछ संदेह भी थे. टैगोर मानते थे कि देशभक्ति ‘चार दिवारी’ से बाहर विचारों से जुड़ने की आजादी से हमें रोकती है, साथ ही दूसरे देशों की जनता के दुख-दर्द को समझने की स्वतंत्रता को भी सीमित कर देती है. टैगोर के विचारों में अर्थहीन तथा अवैज्ञानिक परंपरावाद का विरोध भी शामिल था, जो उनके मुताबिक, किसी को भी अपने अतीत का बंदी बना लेता है.

टैगोर आजाद भारत की कल्पना करते थे, लेकिन वह यह भी मानते थे कि घोर राष्ट्रवादी रवैये और स्वदेशी भारतीय परंपरा की चाह में पश्चिम को पूरी तरह नकार देने से कहीं न कहीं हम खुद को सीमित कर देंगे. यही नहीं स्वदेशी की इस अतिरिक्त चाह में हम अलग-अलग शताब्दी में भारत पर अपनी छाप छोड़ चुके ईसाई, यहूदी, पारसी और इस्लाम धर्म के प्रति भी असहिष्णु रवैया पैदा कर लेंगे.