सज्जाद ज़हीर उर्दू भाषा के प्रसिद्ध लेखक थे। इसके अलावा ज़हीर साहब मार्क्सवादी चिंतक और क्रांतिकारी थे। आज ही के दिन यानि 5 नवंबर 1899 को इस महान शख़्स का जन्म उत्तर प्रदेश के लखनऊ में हुआ था। आज़ादी से पहले सज्जाद ज़हीर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य थे, भारत के विभाजन के बाद ज़हीर साहब पाकिस्तान चले गए और वहां कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ पाकिस्तान के फ़ाउंडिंग मेम्बर बने।

सज्जाद ज़हीर, फोटो सोर्स – गूगल

सज्जाद ज़हीर ने कई नज़्में, गज़लें, व नाटक लिखे हैं। आज ज़हीर साहब का जन्मदिन है तो चलिये आपको पढ़ाते हैं इन्हीं की लिखी हुई एक प्रसिद्ध नज़्म ‘कभी कभी’

कभी कभी बेहद डर लगता है

कि दोस्ती के सब रुपहले रिश्ते

प्यार के सारे सुनहरे बंधन

सूखी टहनियों की तरह

चटख़ कर टूट न जाएं

आँखें खुलें, बंद हों देखें

लेकिन बातें करना छोड़ दें

हाथ काम करें

उँगलियाँ दुनिया भर के क़ज़िए लिक्खें

मगर फूल जैसे बच्चों के

डगमगाते छोटे छोटे पैरों को

सहारा देना भूल जाए

और सुहानी शबनमी रातों में

जब रौशनियाँ गुल हो जाएं

तारे मोतिया चमेली की तरह महकें

प्रीत की रीत

निभाई न जाए

दिलों में कठोरता घर कर ले

मन के चंचल सोते सूख जाएं

यही मौत है!

उस दूसरी से

बहुत ज़ियादा बुरी

जिस पर सब आँसू बहाते हैं

अर्थी उठती है

चिता सुलगती है

क़ब्रों पर फूल चढ़ाए जाते हैं

चराग़ जुलते हैं

लेकिन ये, ये तो

तन्हाई के भयानक मक़बरे हैं

दाइमी क़ैद है

जिस के गोल गुम्बद से

अपनी चीख़ों की भी

बाज़-गश्त नहीं आती

कभी कभी बेहद डर लगता है.

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