महादेवी वर्मा, एक ऐसा नाम जिसे हम बचपन से पढ़ते और सुनते आए हैं। महादेवी जी का जन्म 26 मार्च 1907 को फ़र्रुखाबाद (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। बीसवीं शताब्दी की ये कवियित्रि हिन्दी साहित्य में छायावादी युग के चार स्तंभों में से एक मानी जाती थीं। हिन्दी की सबसे सशक्त कवयित्रियों में से एक होने की वजह से इन्हें आधुनिक मीरा के नाम से जाना जाता है।

महादेवी वर्मा, फोटो सोर्स- गूगल
महादेवी वर्मा, फोटो सोर्स- गूगल

महान कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी ने इन्हें ‘हिन्दी के विशाल मंदिर की सरस्वती’ भी कहा है। आज़ादी से पहले जन्मी महादेवी वर्मा ने आज़ादी से पहले और बाद का भारत बख़ूबी देखा है, जिसके चलते उसी समाज में रहते हुये महादेवी जी ने हमेशा भारत के अंदर विद्यमान हाहाकार, रूदन को देखा और बहुत अच्छे से परखा और करुण होकर अंधकार को दूर करने वाली दृष्टि देने की कोशिश की।

महादेवी वर्मा के मानस बंधुओं में सुमित्रानंदन पंत एवं सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी का नाम लिया जा सकता है, जो उनसे जीवन पर्यन्त राखी बंधवाते रहे। निराला जी से उनकी अत्यधिक निकटता थी, उनकी पुष्ट कलाइयों में महादेवी जी लगभग चालीस वर्षों तक राखी बांधती रहीं।

महादेवी वर्मा जी के लिए जितना कहा जाए, लिखा जाए उतना कम ही पड़ेगा। चलिये आज हम इस महान कवियित्रि को याद करते हुये आज की कविता में आपको पढ़ाते हैं उनकी मशहूर कविता,

तुम मुझमें प्रिय, फिर परिचय क्या!

तुम मुझमें प्रिय, फिर परिचय क्या!

तारक में छवि, प्राणों में स्मृति

पलकों में नीरव पद की गति

लघु उर में पुलकों की संस्कृति

भर लाई हूँ तेरी चंचल

और करूँ जग में संचय क्या?

तेरा मुख सहास अरूणोदय

परछाई रजनी विषादमय

वह जागृति वह नींद स्वप्नमय,

खेल-खेल, थक-थक सोने दे

मैं समझूँगी सृष्टि प्रलय क्या?

तेरा अधर विचुंबित प्याला

तेरी ही विस्मत मिश्रित हाला

तेरा ही मानस मधुशाला

फिर पूछूँ क्या मेरे साकी

देते हो मधुमय विषमय क्या?

चित्रित तू मैं हूँ रेखा क्रम,

मधुर राग तू मैं स्वर संगम

तू असीम मैं सीमा का भ्रम

काया-छाया में रहस्यमय

प्रेयसी प्रियतम का अभिनय क्या?

ये भी पढ़ें- आज की कविता- “वीरता बस सरहदों पर मर कर परवान चढ़ेगी”-पाश