सालों से हम देखते चले आ रहे हैं कि जैसे ही देश में चुनाव आते हैं पूरे देश में एक जलसे जैसा माहौल हो जाता है। कुछ लोग इस बहस में लगे रहते हैं कि कौन सी पार्टी जीतेगी, कौन सी पार्टी हारेगी और अपनी-अपनी पसंद की पार्टियों की खूबियों को ले कर तरह-तरह की दलीलें पेश करते रहते हैं। चुनाव में दिलचस्पी और देश के विकास के बारे में सोचना बहुत ही अच्छी बात है। लेकिन फिर हर चुनाव में समाज का एक वो हिस्सा भी देखने को मिलता है जो चुनाव के नतीजे आने तक बस इसी उम्मीद में बैठा रहता है कि शायद इस बार सरकार उनका भी कुछ भला करेगी।

यहाँ उस हिस्से की बात हो रही है, जिनका ज़िक्र आप अक्सर सरकारी जुमलों में, पार्टियों के पोस्टरों में और लगभग हर नेता के भाषण में सुन सकते हैं। ये बात है उस किसान की, उस फौजी की, उस सरकारी मुलाज़िम और हर उस व्यक्ति एवं समूह की जो इसी समाज में रह कर सरकारी निज़ामों के दिखाये सुनहरे सपने तो देखते आ रहा है लेकिन जब वो ज़मीन की तरफ देखते हैं तो खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं।

फोटो सोर्स- गूगल

ऐसा क्यों? ऐसा इसलिए क्योंकि देश की व्यवस्थाओं के बारे में जो कहानियाँ हम सुनते हैं वो हमें दिखाती हैं कि सब कुछ अच्छा है, अमीर से लेकर गरीब तक सब खुश हैं, राजनीतिक पार्टियां सिर्फ देश की भलाई के ही बारे में सोचती हैं, लेकिन अपने आस-पास नज़र घुमा कर देखा जाए तो एहसास होता है कि ये सभी बातें तो बस एक पानी का बुलबुला है जो पलक झपकते ही फूट गया।

साल 2019 के चुनाव में साफ तौर पर देखा जा सकता है कि ज़रूरी मुद्दों पर बात होने के बजाय सभी तरह की बातें हो रही हैं। देश की दो बड़ी राजनीतिक पार्टियां बीजेपी और कांग्रेस के कुछ ऐसे ही चुनावी जुमलों और बयानों की लिस्ट हमने तैयार की है जो आप यहां देख सकते हैं और तय कर सकते हैं कि यह बस जुमले हैं या इनका वास्तविक्ता से भी कुछ लेना-देना है।

शुरुआत बीजेपी से ही करते हैं। इस चुनाव प्रचार के दौर में देखा गया है कि भाजपा के तमाम नेता हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की बातों को लेकर अक्सर वोट मांगते नज़र आए हैं। पहला ज़िक्र प्रधानमंत्री मोदी का ही होना चाहिए। हाल ही में यूएन द्वारा मसूद अजहर को अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी घोषित किए जाने के बाद एक रैली को संबोधित करते वक़्त प्रधानमंत्री ने भाषण दिया और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लिए गए फैसले का सारा श्रेय अपने आप को दे दिया। भाषण में प्रधानमंत्री बताते हैं कि ‘आज किस तरह से भारत का डंका विश्व भर में बजाया जा रहा है’ ऐसा कहकर इशारा किया जा रहा है जैसे यूएन ने ये फैसला पीएम मोदी के ही कहने पर किया हो। कभी सेना के जवान का वापस लौटना, कभी आतंक को ख़त्म करने वाला मसीहा बनते हुए मोदी जी को पहले भी देखा जा चुका है लेकिन दुःख की बात ये है कि प्रधानमंत्री बन कर अपनी जिम्मेदारियाँ निभाते हुए आपको ये कम ही दिखेंगे।

साल भर पहले तमिलानाडु के किसानों ने जंतर-मंतर पर अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन किया था. फोटो सोर्स- गूगल

इसी तरह भोपाल से सांसद का चुनाव लड़ने वाली साध्वी प्रज्ञा इंडिया टुडे के साथ हुए एक इंटरव्यू में होने वाले चुनाव को धर्म का अधर्म से चुनाव बताती हैं। वो बताती हैं कि जेल में उनके साथ बहुत टॉर्चर किया गया इसलिए वो यह चुनाव लड़ रही हैं। इस पूरे इंटरव्यू में साध्वी प्रज्ञा ने सिर्फ एक ही विषय पर अपनी बात रखी। बार-बार उनका यही कहना था कि वो ये चुनाव हिन्दुत्व और हिंदुओं के लिए लड़ रही हैं। चलो यहाँ तक तो सब ठीक था लेकिन आगे साध्वी प्रज्ञा ने बातों-बातों में हिन्दुत्व को प्रमोट करते हुए कैंसर का इलाज भी बता दिया। उन्होंने बताया है कि गाय के पीठ पर हाथ फेरने से बीपी ठीक होता है और गौमूत्र से उन्होंने अपना कैंसर ठीक कर लिया।

वाह! सभी डॉक्टरों से अनुरोध है कि वो सब भी साध्वी जी से ये हुनर सीख कर लोगों का उद्धार करें।

कांग्रेस के लीडर राहुल गांधी ने इस चुनाव में लोगों को 6000 रुपये प्रति माह देने का ऐलान कर दिया। न जाने पिछले कितने सालों में हम ऐसे कितने चुनावी जुमले सुन चुके हैं जहाँ इलेक्शन आते ही नोट बांटने का लालच दे कर जनता का वोट हासिल करने की कोशिश करी जाती है। पर, किसान आज भी दिल्ली में अपना हक मांगने के लिए आए दिन खड़ा ही रहता है। देश के बहुत से गांवों में आज भी पानी नहीं आता। शौचालय नहीं हैं। फिर कौन-सा किसान है जिसे बहुत खुश कर दिया है इन नेताओं ने पैसा दे कर?

गाँव में शौचालय की सुविधा, फोटो सोर्स: गूगल

इतना ही नहीं ये सभी नेता जनता की भलाई के लिए कितना सोचते हैं और कितना अपनी भलाई के लिए? ये बात हम इन नेताओं के दोगलेपन से समझ सकते हैं। हम सभी साफ तौर पर यह देख सकते हैं कि किस तरह से फायदे के लिए नेताओं ने पार्टियाँ बदली हैं। उदाहरण के तौर पर हाल ही में वेस्ट बंगाल से कांग्रेस नेता अर्जुन सिंह पार्टी बदल कर बीजेपी में चले गये। अब वो बताते हैं कि उनके बीजेपी में जाने का कारण है कि पुलवामा अटैक के बाद मोदी जी को बधाई देने के बजाय विपक्ष द्वारा उनसे सवाल किए गये। इतने सालों बाद अब इनकी आंखेँ खुली हैं।

ऐसे कई भाषण, बयान आप यूट्यूब पर देख सकते हैं जहाँ धर्म, समुदाय और पाकिस्तान ही बस देश में विकास के लिए चुनावी मुद्दे बन कर रह गए हैं। इसकी झलक हम फ़ेसबुक और ट्विटर पर भर-भर कर गालियां देने वाले लोगों के विचारों में देख सकते हैं कि किस तरह लोगों के मन में शिक्षा और गरीबी जैसे अहम मुद्दे छोड़ कर धर्म की चिंता है और असल मुद्दों पर बात करने वाला हर एक व्यक्ति एंटी-नेशनल है। ये वाकई में चिंता करने वाली बात है।

कभी राफेल, कभी मोदी पर बनी फिल्म तो कभी वेब सीरीज़। विपक्ष से पिछले सत्तर सालों का हिसाब मांगना तो बहुत ज़रूरी है, लेकिन अफसोस कोई भी देश में आज की बात ही नहीं कर रहा। कहीं किसान आज भी अपनी ज़मीन के लिए लड़ रहा है। भारत के तमाम गाँव में अभी भी लोगो के पास पानी, शौचालय जैसी बेसिक सुविधाएं ठीक से नहीं पहुंची हैं लेकिन हम पाकिस्तान के बारे में सोच रहे हैं।

सारे देश में ऐसा माहौल देखा जा सकता है कि जनता सिर्फ दो पार्टियों में बंट कर रह गयी है। चुनाव में बस दो ही बातें  नज़र आती है, या तो एक व्यक्ति देशद्रोही हो सकता है या फिर राष्ट्रवादी। हर कोई खुद को सही साबित करने में लगा है। लेकिन सवाल है कि इस बात को साफ तौर पर क्यों नहीं मान लिया जाता कि देश में सबकुछ उतना सही नहीं है जितना ये नेता हमे बताते हैं?

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