नरेश सक्सेना की एक कविता है जिसका शीर्षक है – भूख। कुछ भी पढ़ने से पहले ये पढ़ लीजिये:

भूख सबसे पहले दिमाग खाती है
उसके बाद आँखें
फिर ज़िस्म में बाक़ी बची चीज़ों को

छोड़ती कुछ भी नहीं है भूख
वह रिश्तों को खाती है
माँ का हो बहन या बच्चों का

बच्चे तो उसे बेहद पसन्द हैं
जिन्हें वह सबसे पहले
और बड़ी तेज़ी से खाती है

बच्चों के बाद फिर बचता ही क्या है?

कविता पढ़ ली आपने? बढ़िया किया। आखिरी लाइन दुबारा पढ़ें। बच्चों के बाद फिर बचता ही क्या है? बच्चे किसी भी देश का भविष्य होते हैं। जितने बेहतर बच्चे, उतना उज्ज्वल देश का भविष्य। अब मुद्दे की बात –  केंद्र सरकार ने बीते मंगलवार को एक सवाल के लिखित जवाब में कहा है कि खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के पास देश में भूख से होने वाली मौतों का कोई भी आंकड़ा मौजूद नहीं है।

ठीक है, मान लिया। अब आगे सुनिए। उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय में राज्यमंत्री सीआर चौधरी ने कहा,

“किसी भी राज्य/केंद्र शासित सरकार भूख से मौत की जानकारी नहीं दी है। मीडिया में ये रिपोर्ट्स आईं हैं कि कुछ राज्यों में भूख से मौत हुई है। हालांकि जांच में झारखंड समेत जगहों पर दावा सही साबित नहीं हुआ है।”

अब एक दूसरा पहलू भी जान लीजिये। दूसरा पहलू ये है कि ‘भोजन का अधिकार अभियान’ के लोगों ने भारत में भुखमरी की वजह से हुई मौतों की एक सूची तैयार की है जिसे स्वतंत्र फैक्ट फाइंडिंग टीम और मीडिया रिपोर्ट्स द्वारा सही पाया गया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक साल 2017 से लेकर अब तक देश में 42 लोगों की भूख से मौत हुई है. पर, सरकार के पास इसका कोई आधिकारिक आंकड़ा मौजूद नहीं है।

प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो सोर्स : गूगल

प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो सोर्स : गूगल

भारत भूखा है। भूख से लोग मर रहे हैं। ऐसे में ये सवाल करना जायज़ है कि क्या हमारे पास इतना अनाज नहीं है कि लोग भूखे मर रहे हैं और दूसरा सवाल ये कि इन मौतों की ज़िम्मेदारी किस पर तय की जाये? इस दूसरे सवाल को जानने के लिए सबसे जरूरी है कि आप पहले सवाल का जवाब जान लें।

तो क्या देश में अनाज का इतना उत्पादन नहीं है कि सभी 135 करोड़ लोगों के पेट भरे जा सकें?

15 अक्टूबर, 2019 को इंडियन एक्सप्रेस में छपी हरीकृष्ण शर्मा की एक रिपोर्ट के अनुसार भारतीय खाद्य निगम के अनाजों के भंडार गृह ओवरलोडेड हैं यानि कि इन भंडार गृहों में जितना अनाज होना चाहिए उससे कहीं अधिक अनाज जमा हो चुका है।

आलम ये है कि भारतीय खाद्य निगम ने मिनिस्टरी ऑफ एक्सटर्नल अफेयर्स यानि कि विदेश मामलों के मंत्रालय से अनुरोध किया है कि उनके पास और अनाज रखने की जगह नहीं बची है इसलिए जो अभी अनाज है या तो उसे कहीं बेच दिया जाये या फिर किसी जरूरतमंद देश को दान कर दिया जाये। लेकिन उनके बार-बार मंत्रालय को किए गए अनुरोध पर मंत्रालय ने कोई कार्यवाही नहीं की है।

हालांकि, खुद के देश में भूखे मर रहे लोगों के बावजूद भारत ने अनाज का दान-पुण्य काफी किया है। आंकड़ों के मुताबिक साल 2011-12, 2013-14 और साल 2017-18 में भारत ने कुल साढ़े तीन लाख मीट्रिक टन गेंहू अफ़गानिस्तान को ‘दान’ में दिया है। इसके अलावा साल 2012-13 में यमन को 2447 मीट्रिक टन चावल ‘मानवीय सहायता’ के नाम पर ‘दान’ में दे दिया गया। साल 2014-15 और साल 2017-18 में भी ‘मानवीय सहायता’ के नाम पर पाँच देशों यानि कि म्यांमार, श्रीलंका, ज़िम्बावे, लेसोथो और नामीबिया को अनाज दान में दिया गया है। हालांकि इन पाँच देशों को दान में दिये जाने वाली इस अनाज की मात्रा पहले किए गए दान के मुक़ाबले कम थी। हालांकि पिछले 2 सालों में इस तरह का कोई भी दान-पुण्य का काम नहीं किया गया है।

प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो सोर्स : गूगल

प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो सोर्स : गूगल

पर, ओवरलोडेड होते भंडार गृह के हालात को देखते हुए भारतीय खाद्य निगम का कहना है कि संस्था चाहती है कि मंत्रालय इस बार ज्यादा मात्रा में अनाज दान करे।

हालात देखिये कि एक देश जहां भुखमरी का ऐसा हाल हो वहाँ सरकार आदेश देती है कि भंडार गृह में रखे जाने वाले अनाजों की कैपेसिटी को कम कर दिया जाये। रिपोर्ट के मुताबिक 1 जुलाई को ये आदेश पारित होता है कि सरकारी भंडार गृहों में अधिकतम 411.20 लाख टन से ज्यादा अनाज नहीं रखा जा सकता। फिर 1 अक्टूबर को नया आदेश आता है जिसमें सरकारी भंडार गृहों की अधिकतम कैपेसिटी 307.70 लाख टन तय कर दी जाती है। ये आदेश तब आता है जब 1 सितंबर तक इन अनाज गृहों में 669.15 लाख टन अनाज जमा हो चुका था।

इस पूरे मामले को पढ़ने-जानने के बाद एक बात तो साफ है कि देश में अनाज की कमी नहीं है। कमी है सिस्टम की। सही ढंग से इन चीजों को मेनेज करने की। एक तरफ अनाज इतना है कि हम मानवीय सहायता के नाम पर दूसरे देशों को अनाज दान में दे दे रहे हैं और दूसरी तरफ हमारे देश के मानव भूख से मरते जा रहे हैं। ‘चिराग तले अंधेरा’ का इससे बेहतर उदहारण शायद ही आपको कहीं मिलेगा?

जिम्मेदार कौन?

हाल ही में ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत की रैंकिंग 102 नंबर तक खिसक गयी। इसका मतलब ये है कि भारत में खाद्य संकट और गहरा हो गया। जब ये आंकड़ा जारी किया गया तब काफी हो-हल्ला किया गया कि साल 2012 में भारत की इस लिस्ट में रैंकिंग 55 थी। लेकिन भारत की हालत में कभी भी सुधार नहीं हो पाया है। न कांग्रेस के राज में और न ही मौजूदा सरकार के दौर में।

ऑल्ट न्यूज़ द्वारा किए गए फ़ैक्ट चेक में इस दावे को गलत पाया गया। दरअसल, भारत का स्थान जो वैश्विक भूख सूचनांक (Global Hunger Index) में 2014 के 55 से गिरकर 2019 में 102 तक पहुंच गया है, ये अंतर साल 2015 तक सूचनांक द्वारा काम करने के नियम में बदलाव करने की वजह से हुआ  है। साल 2014 तक, जिन देशों का GHI स्कोर 5 से कम था (स्कोर कम, बेहतर प्रदर्शन) उन्हें मुख्य टेबल में नहीं बल्कि एक अतिरिक्त टेबल में रखा गया था, जिसमें 44 देशों को रखा गया था।

बाद में साल 2015 में अतिरिक्त देश वाली लिस्ट में महज 13 देशों को रखा गया और बाकी बचे देशों को मुख्य टेबल में जोड़ दिया गया। फिर, साल 2016 से, 5 से नीचे के GHI स्कोर वाले देशों को मुख्य टेबल में रखा गया था, इस वजह से सभी देशों की रैंकिंग में भारी बदलाव आया। यही वजह है कि 2014 में भारत की रैंकिंग 55 से गिरकर 2016 में 97 हो गई थी।

सीधे शब्दों में कहें तो 5 से कम GHI स्कोर वाले देशों को 2016 से पहले मुख्य टेबल में रखा गया था, जिसके कारण भारत का रैंक 2014 में 55 + 44 = 99 रहा होगा, और 2015 में रैंक 80 + 13 = 93 होगा।

यहाँ तक कि GHI रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है –

“इस टेबल से रैंकिंग और सूचकांक स्कोर पिछली रिपोर्टों से रैंकिंग और सूचकांक स्कोर की तुलना में सही नहीं हो सकते हैं।”

यहाँ तक कि NFHS यानि कि नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे ने ये माना है कि पिछले दस सालों (2008-09 से 2015-16) में भुखमरी से निपटने के लिए सकारात्मक प्रयास किए गए हैं। इससे साफ है कि इस भुखमरी के लिए कोई एक पार्टी जिम्मेदार नहीं है। ये उस अनदेखी का नतीजा है जो आज़ादी के बाद से ही शिक्षा और भोजन को लेकर देश की केंद्र सरकारों की अपनी जनता के प्रति रही है।

पर, इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि भाजपा के शासनकाल में भारत की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है। 2015 में, GHI स्कोर 29.0 था जो 2016 में 28.5 तक बढ़ा था। अगले साल स्कोर 31.4 पर पंहुचा था। इसके बाद 2018 में 31.1 और 2019 में पिछले साल से कम 30.3 यानि कि सुधार हुआ। अब इस बात में ध्यान देने की जरूरत है कि स्कोर जितना अधिक होगा, प्रदर्शन उतना ही खराब होगा।

GHI में गिरावट ज्यादा नहीं हुई है लेकिन, गिरावट जारी है जिसका मतलब है कि भारत में भाजपा के शासनकाल में भी भुखमरी का संकट और गहरा ही हुआ है। 102 पायदान के बाद भारत अपने सभी पड़ोसी देशों से इस लिस्ट में कहीं ज्यादा पीछे है। हमसे बेहतर स्थिति में पाकिस्तान है, बांग्लादेश है यहाँ तक कि नेपाल जैसा छोटा सा देश भी हमसे काफी बेहतर स्थिति में है।

GHI लिस्ट में भारत का प्रदर्शन

2015 से 2019 तक GHI लिस्ट में भारत का प्रदर्शन

पर, जब इस मामले में सरकार से ये पूछा गया कि क्यों भारत ग्लोबल हंगर इंडेक्स (GHI) में नीचे चला गया है। इस पर उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय में राज्यमंत्री सीआर चौधरी ने कहा कि भारत का रैंक 119 देशों में से 103वें नंबर पर है, न कि 115वें नंबर पर। सरकार ने कहा कि भारत का कुल GHI स्कोर साल 2000 में 38.8 था और अब यह सुधर कर साल 2018 में 31.1 हो गया है।

सत्ता में बैठे लोगों की यही दिक्कत रही है। ये आपको हमेशा अच्छा ही बताते हैं। ये कभी भी ज़िम्मेदारी तय नहीं करते। आप इनसे प्याज की बढ़ती कीमत के बारे में पूछो तो ये कहेंगे कि ये प्याज ही नहीं खाते। आप इनसे गिरती जीडीपी के बारे में पूछेंगे तो ये कहेंगे कि जीडीपी का कोई काम ही नहीं भविष्य में। आप इनसे कहेंगे कि गरीब के पास पैसे नहीं तो ये बताएँगे कि पैसे पेड़ पर नहीं उगते।

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