तेलांगाना में वंगारा नाम का एक गांव है। जहां आज पक्की सड़क है, धान के हरे-भरे खेत हैं। कभी उस गांव में जाने के लिए एक पतली-सी पगडंडी हुआ करती थी। उसी गांव में एक लड़के का जन्म हुआ। पामुलपर्ति उस लड़के का परिवारिक नाम था, जो उसकी तेलुगू परंपरा के अनुसार जन्म के बाद लगाया था। उसके नाम के बीच में तिरूपति के ईष्ट देवता वेंकट का नाम था। उसके जन्म के ठीक बाद एक पीर ने उनके पिता का दरवाजा खटखटाया और कहा, ‘तुम्हारा बेटा बादशाह बनेगा’। ये लड़का जो आगे चलकर देश का प्रधानमंत्री बनने वाला था। जो आगे चलकर विद्वान होने का रिकाॅर्ड तोड़ने वाला था और उन सबसे पहले अपने राज्य का मुख्यमंत्री बनकर इंदिरा गांधी की उम्मीदों को तोड़ने वाला था। आज कहानी नरसिम्हा राव की सियासत में एंट्री की।

Related imageपामुलपर्ति वेंकट नरसिम्हा राव का जन्म 28 जून 1921 को आंध्र प्रदेश के करीमनगर जिले के वंगारा गांव में हुआ था। नरसिम्हा राव का जन्म ब्राम्हण परिवार में हुआ। उनके परिवार के पास 1400 एकड़ जमीन थी जो वे आगे चलकर भूमि सुधार में पूरे गांव में बांटने वाले थे। लेकिन जन्म के वक्त तो उनका परिवार गांव का सबसे बड़ा जमींदार परिवार था। उनका गांव हैदराबाद रियासत में आता था। उस समय हैदराबाद रजवाड़े पर निजाम आसफ शाह सप्तम का शासन था। हैदराबाद देश की वो रियासत थी जहां की 85 फीसदी आबादी हिंदू थी और शासक मुसलमान थे।

अंग्रेजों के समय हैदराबाद के निजाम ने अंग्रेजों से एक समझौता किया था। जिसमें अंग्रेजों ने अपने समय भी हैदराबाद में मध्य युग के मुस्लिम शासनकाल की राजनीतिक और सामाजिक संरचना को ज्यों का त्यों बना रहने दिया। इससे किसान और निजाम के बीच कुछ बड़े किसान बिचैलिये बन गये। यही लोग निजाम से मिलते और किसान से लगान लेते थे। ये बड़े किसान ब्राम्हण जाति के थे। नरसिम्हा राव का परिवार भी इसी व्यवस्था में आता था लेकिन जल्दी ही इस व्यवस्था को तोड़ा जाने वाला था।

साल 1921 में महात्मा गांधी ने अंग्रेजों के खिलाफ असहयोग आंदोलन शुरु कर दिया। तब पूरा देश इस आंदोलन में भाग लेना लगा। इससे घबराकर निजाम ने अपने राज्य में राजनीतिक सभाओं और बाहरी लोगों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया।

नरसिम्हा राव अपने चार भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। जब राव चार साल के थे तब उनके ही ब्राम्हण पड़ोसी परिवार ने उनको गोद ले लिया। क्योंकि उनकी कोई संतान नहीं थी और उनको डर था कि निजाम उनकी जायदाद को जब्त कर लेगा। इस तरह से नरसिम्हा राव गांव के सबसे अमीर जमींदार परिवार के वारिस बन गये। हालांकि नरसिम्हा राव ने अपने परिवार को नहीं छोड़ा, उन्होंने दोनों ही परिवार को अपना माना। राव बचपन से ही तेज बुद्धि वाले थे। हैदराबाद में सिर्फ मुसलमानों को ही नौकरियां दी जाती थीं, तब राव ने अपने पिता के सीने पर बैठकर भागवत गीता के श्लोक कर लिये। कुछ ही महीनों में ये छोटा लड़का अपने गांव के शिक्षक से भी आगे निकल गया। तब वो दूसरे गांव के स्कूल में पढ़ने जाने लगे।

शिक्षा ने राव को गांव से दूसरे गांव, उसके बाद शहर और फिर उससे भी बड़े शहर पहुंचा दिया। यही शिक्षा उनको पहले सत्ता और फिर मुख्यमंत्री बनाने वाली थी। लेकिन इस पढ़ाई ने उनको उनके परिवार और अपने गांव से बहुत दूर कर दिया। अपने बाद के समय में अस्पताल के बिस्तर पर पड़े हुये नरसिम्हा अपने गांव को याद करते हुये कहते हैं,

‘मैं गांव में पुश्ते पर चल रहा हूं। पिताजी ने सफेद कपड़े पहने हुए हैं और वह दूसरी तरफ हैं। वे मुझे बुला रहे हैं, मुझे उनके पास जाने दो’।

ये 2004 की बात है लेकिन अभी वापस 1931 में लौटते हैं जब नरसिम्हा राव की शादी सत्यम्मा से होती है, तब राव सिर्फ दस साल के थे। राव के साथ अब तक जो हुआ था वो थोपा गया था, उनका गोद लेना, उनका विवाह। आगे चलकर उनके साथ ऐेसे ही बहुत चीजें होने वाली थीं।

Related image1937 में नरसिम्हा राव ने हाई स्कूल की पढ़ाई पूरी की। उन्होंने पूरे हैदराबाद में पहला स्थान पाया था। राव के लिये ये बहुत बड़ी उपलब्धि थी उन्होंने सबको बता दिया था कि वे खेती की बजाय पढ़ाई को ही आगे चुनेंगे। यही वो साल है जब हैदराबाद की सत्ता मे उथल-पुथल मचा हुआ था। हाल ही में हुये चुनाव में मद्रास और बाॅम्बे प्रेसिडेंसीज में कांग्रेस सत्ता में आ गई थी। दोनों की सीमाएं हैदराबाद से लगी हुई थीं। इसने निजाम के खिलाफ चल रहे आंदोलन को हवा दी। 1937 में ही हैदराबाद में कांग्रेस का गठन हुआ। इन्होंने वंदे मातरम को विरोध का प्रतीक बनाया और निजाम ने इस गीत को गाने पर प्रतिबंध लगा दिया। इसी वंदे मातरम की वजह से नरसिम्हा राव की सियासत में एंट्री हुई।

साल 1938 में नरसिम्हा राव ने वारंगल में अपने काॅलेज के साथियों के साथ मिलकर वंदे मातरम गाया। निजाम के अधिकारियों ने उनको ऐसा करने से मना कर दिया। लेकिन राव और उनके साथियों ने उनकी बात नहीं मानी। जिसका नतीजा ये हुूआ कि राव और उनके 300 साथियों को काॅलेज से संस्पेंड कर दिया गया। अब राव को अपनी डिग्री पूरी करने के लिए किसी दूसरे काॅलेज में एडमिशन लेना जरुरी था। तब नागपुर यूनिवर्सिटी प्रतिभावान छात्रों को लेने के लिए तैयार हो गयी, जिसमे राव का नाम भी शामिल था। अब थोड़ा फास्ट-फारवर्ड करते हैं और सीधे उनकी सियासत पर आते हैं।

साल 1948, नरसिम्हा राव ने पूरी पढ़ाई करके राजनीति को चुना और इसके लिये उनको साथ मिला रामानंद तीर्थ और बुरगुला रामाकृष्ण राव का। हैदराबाद अब आंध्र प्रदेश की राजधानी बन चुकी थी। लेकिन तभी रामाकृष्ण राव और रामानंद तीर्थ में टकराव हो गया। अब राव को अपने मालिक और गुरू में से किसी एक को चुनना था। राव ने यहां अपनी चतुराई दिखाई। उन्होंने न किसी को चुना और न ही किसी को दूर किया। इस चतुराई का इनाम राव को मिला और राव को करीम नगर जिला का कांग्रेस अध्यक्ष बना दिया गया। यहीं से आजाद भारत में होने वाले पहले चुनाव में पार्टी ने टिकट भी दिया। पहले चुनाव में कांग्रेस ने पूरे देश में 489 में 364 सीटें जीतीं। लेकिन नरसिम्हा राव कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार से हार गये। उनकी हार ने उनका पार्टी में कद कम कर दिया। साल 1957 में पार्टी ने राव को लोेकसभा ने विधानसभा का टिकट दिया।

मंथानी विधानसभा सीट से अगर नरसिम्हा राव हार जाते तो उनका कैरियर वहीं खत्म था लेकिन मंथानी तो उनकी जीत की शुरुआत थी। इसके बाद वे अगले 20 साल तक कभी नहीं हारे। ये राव की सियासत की शुरुआत थी, तब वे ईमानदारी की मिसाल हुआ करते थे।

आज के किस्से में जाते-जाते उनकी ईमानदारी का एक किस्सा सुनते जाईये। उस जमाने में उम्मीदवार मद्रास चुनाव प्रचार के लिये महिंद्रा जीप मंगवाते थे। लेकिन उनमें से बहुत कम गाड़िया वापिस की जाती थीं। नरसिम्हा राव ने अपने चुनाव अभियान के लिये 200 जीपें मंगवाईं थीं। चुनाव के बाद राव ने पूरी 200 जीपों को वापिस करा दिया था। महिंद्रा जीप का मालिक हैरान था क्योंकि पहले कभी किसी नेता ने ऐसा नहीं किया था। हम भी हैरान हैं कि नरसिम्हा राव के बारे में इतना कुछ है लेकिन उनको सिर्फ बाबरी विध्वंस, उदारीकरण और सूटकेस से भरे बैग के कलंक के लिये ही याद किया जाता है। इसलिये हम आपको वो नरसिम्हा राव के जीवन के वो किस्से सुनायेंगे जिनके बारे में कोई नहीं बताता।

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