आज का इतिहास तब का वर्तमान था। बाबरी थी, आयोध्या भी था, राम और रामायण भी थे। यह एक देश था। एक स्वतंत्र, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, भारत गणराज्य। जिससे अब चिढ़न होने लगी है। धर्मनिरपेक्ष होना अब किसी को नहीं भाता। सईद नक़वी अपनी किताब ‘बीइंग द अदर’ में जिन बातों को संजीदगी से कहते हैं उन्हें हमें सुनना और पढ़ना चाहिए।

9 नवंबर 1989

मैं अपनी माँ आतिया नक़वी, पत्नी अरुणा और बेटी ज़ेबा के साथ शिलान्यास आयोजन देखने अयोध्या गया। मैं उत्साहित था। लेकिन, वहाँ पहुँचकर जो मैंने देखा उसने मेरे उत्साह को हताशा में बदल दिया। उग्र कार सेवकों द्वारा हर तरह के रिवाज और रस्म निभाए जा रहे थे। उन्होंने बाबरी मस्जिद के स्थान पर ईंटें रख दिये थे। जबकि अभी वहाँ बाबरी मस्जिद मौजूद थी। बाबरी के गिरने के साथ इस देश से धर्मनिरपेक्षता की वो जड़ें उखड़ गईं या फिर उखाड़ दी गईं। एक भारतीय मुस्लिम के तौर पर जिसने इस देश को अपना सब कुछ दे दिया, मैं ठगा हुआ सा महसूस कर रहा था।

मैं अवध में ही पैदा हुआ था। मेरा बचपन यहीं की संस्कृति में बीता। मैंने हमेशा हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच एक समन्वयता देखा है। इस समन्वयता को तोड़ने की कई बार कोशिश की गयी। हिंदुओं और मुसलमानों के बीच मतभेद कोई नई बात नहीं है लेकिन, यह पहली बार हो रहा था जब मुस्लिमों को ‘अलग-थलग’ किया जा रहा था।

कभी-कभी यह जान बूझकर किया जा रहा था तो कभी दोनों तरफ के नेताओं के बड़बोलेपन के कारण हो रहा था। कारण कोई भी हो, इससे जो कुछ हो रहा था, वो मुसलमानों के पक्ष में जाता कहीं से भी नहीं दिख रहा था। मुस्लिमों की होती हुई इस दुर्गति के लिए कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही जिम्मेदार हैं, कोई थोड़ा तो कोई ज्यादा। जो इन मुसलमानों के अलग-थलग होने से सबसे ज्यादा फायदे में रहे, वो थे हिन्दू कट्टरवादी लोग। उन्हें यह लग रहा था कि हिन्दू राष्ट्र के मुद्दे को भुनाने में यह सबसे कारगर कदम होगा। उनका वो सपना जो आजादी के वक़्त पूरा नहीं हो पाया था।

आज के संदर्भ में यह सब कुछ कितना सटीक जाता हुआ दिख रहा है?

यह सवाल नहीं है। इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए। यह जनमानस का मुद्दा है। फिर से हम उसी नैरेटिव में जी रहे हैं जहां भारतीय मुसलमानों को अलग-थलग किया जा रहा है। यह सब कुछ इतना सेलेक्टिव है कि एक बार में ही समझ आने लगता है। इस सरकार की सेलेक्टिवनेस बहुत छिछली है। चाहे वो कश्मीर हो, NRC हो या CAB हो।

              बीइंग द अदर, अदर का हिन्दी अर्थ होता है अन्य

अन्य होने का अर्थ है किसी चीज का पहले स्थान से हटकर दूर हो जाना। दूर समय के साथ सुदूर होता जाता है और एक दिन गायब हो जाता है। बीसवीं शताब्दी में पलिस्तीनी स्कॉलर एडवर्ड ने इस पूरी घटना पर अध्ययन किया। उसने अपने अध्ययन को नाम दिया ओरिएंटलिज्म ऑन एफिलिएशन ऑफ नॉलेज एंड पावर एक दृष्टिकोण। यह बिलकुल उसी तरह था जैसे पश्चिमी देशों ने हमें ‘अन्य’ की तरह रखा। इससे यह साफ-साफ पता चलता है कि किस तरह से देश की 14 प्रतिशत जनसंख्या को विदेशी, पिछड़े, असभ्य और खतरनाक जैसे शब्दों तक से संबोधित करके किनारे कर दिया गया।

यह ‘ओरिएंटलिज़्म’ आजादी के बाद से ही चली आ रही एक धीमी प्रक्रिया है। इसमें कई घटनाएँ सिर्फ इसलिए होती हैं ताकि, लंबे समय बाद अपने कथित गंतव्य पर पहुंचा जा सके। वो घटनाएँ सिर्फ एक तबके को थोड़ा-थोड़ा करके प्रभावित करने के लिए होती हैं।

राजाओं और शासकों द्वारा इतिहास में भी अलग-अलग धर्मों की इबादतगाहों को सिर्फ इसलिए तोड़ दिया जाता था ताकि, उन्हें अपनी जीत का और सामने वाले की हार का एहसास होता रहे। इसी जीत की निशानी के तौर पर मीर बाकी ने सन 1528 में बाबरी मस्जिद का निर्माण कराया था। उसके बाद से ही यह एक बड़ा मुद्दा बना रहा। अंग्रेज़ी सरकार द्वारा 1859 में बाहरी बरामदे और मस्जिद भवन को एक दीवार से अलग करवा दिया गया। यह तब तक बना रहा जब तक चुपके से मस्जिद परिसर में भगवान राम की मूर्तियाँ न रख दी गईं। यह भी एक लंबी प्रक्रिया थी जो 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंश के साथ ही खत्म हुई या पूरी हुई। दस हजार से भी ज्यादा कार सेवकों द्वारा कुदाल, फरसे, हथौड़े और डंडे से कुछ घंटों में ही मस्जिद को ज़मींदोज़ कर दिया गया।

यही वो वाकया था जहां से भारतीय मुसलमानों का भारतीय राजनीतिक प्रणाली और राजनीति से विश्वास उठने लगा था। खासकर उस पार्टी से जिसने आजादी के बाद से सबसे ज्यादा समय तक राज किया था, ‘कांग्रेस’। बाबरी के बाद से मुसलमान हर उस बात को याद करने लगे या उस बात को दोहराने लगे जो उन्हें इस देश में आजादी के बाद से ही दोयम दर्जे का बनाती आ रही थी। पहले उन बातों का उतना महत्व नहीं था लेकिन, बाबरी विध्वंश के बाद से सब कुछ बदल चुका था। इस पूरी कहानी में एक नाम प्रमुखता से लिया जाता रहा है, लाल कृष्ण आडवाणी। हिंदुओं को मजबूत करने की बात करते हुए लाल कृष्ण आडवाणी ने सितंबर 1990 में गुजरात के सोमनाथ मंदिर से अयोध्या तक की रथ यात्रा शुरू की। भारतीय जनता पार्टी का यह कहना था कि जिस जगह पर बाबरी मस्जिद मौजूद है, वहाँ भगवान राम की जन्मस्थली है। यह मुद्दा बहस का था। लेकिन, लगभग बहस माइथोलॉजी पर ही आधारित थी। यही वह समय था जब देश में केसरिया ने पैर पसारना शुरू किया। बात हनुमान गढ़ी की भी हुई। लेकिन, बाबरी के विध्वंश ने देश की सांप्रदायिक तस्वीर को बदल कर रख दिया। साल दर साल मुसलमान देश में असुरक्षित महसूस करने लगे थे। यह इसलिए हुआ क्योंकि बाबरी तो 6 दिसंबर 1992 को गिराई गयी पर उसकी तैयारी पिछले तीन सालों से चली आ रही थी। एक सोची समझी मार्केटिंग स्ट्रेटेजी के तहत पूरे देश के अलग-अलग मंदिरों से ईंटें, सोने और चाँदी से बनाए ढांचे, पूजा अर्चना के बाद राम मंदिर निर्माण के लिए अयोध्या भेजे जाने लगे। इससे आम लोगों के बीच अयोध्या को लेकर चर्चा तेज हो गयी।

आजादी के बाद से ही लगातार जान बूझकर या कई बार राजनीतिक पार्टियों के नेताओं के गलत और भड़काऊ बयानों की वजह से दंगे भड़कते रहे। उनमें गुजरात दंगे (1969), मुरादाबाद दंगे (1982), भागलपुर दंगे (1989), मुंबई दंगे (1992-93), गुजरात दंगे (2002), गोपालगढ़ दंगे (2011), गाजियाबाद दंगे (2012), फैजाबाद दंगे (2012), धुले दंगे (2013) और मुजफ्फरनगर दंगे (2013) प्रमुख रहे। यह गहराई से समझा जाने लायक विषय है कि सांप्रदायिक दंगों ने देश और देश के मुसलमानों को कितना नुकसान पहुंचाया है। 2012 में आउटलुक मैगजीन की एक रिपोर्ट के अनुसार 1967 से अब तक भारत में 58 बड़े दंगे हो चुके हैं। जिनमें से 10 दक्षिण में, 12 पूर्व में, 16 पश्चिम में और 20 उत्तर में हुए हैं। इन दंगों में कुल 13,000 लोग मारे जा चुके हैं। इस देश में होते इन नरसंहारों के लिए सिस्टम की जितनी निंदा की जाए कम है। लेकिन, ये दंगे होते क्यों हैं? इनसे हासिल क्या होता है और इनका प्रभाव कितना गहरा होता है? ये सारे सवाल बेहद पेचीदा हैं। इनका जवाब इन्हीं दंगों में छिपा हुआ है।

गुजरात दंगे 1969 और 2002

सितंबर-अक्टूबर 1969, गुजरात के अहमदाबाद में भयानक स्तर पर हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए, जिसने बड़े पैमाने पर लूट-मार देखा। जस्टिस जगनमोहन रेड्डी कमीशन की रिपोर्ट के मुताबिक इस दंगे में लगभग 512 लोगों की जान गयी और उनमें से अधिकतर मुसलमान ही थे। उस वक्त राज्य में कांग्रेस की सरकार थी और हितेन्द्र देसाई मुख्यमंत्री थे। दंगों के बाद, सरकार और मुख्यमंत्री दोनों की खूब आलोचना हुई। दंगे के लगभग दो साल बाद सरकार ने रेड्डी कमीशन का गठन किया, जिसने अपनी रिपोर्ट साल 1971 में दी। रिपोर्ट ने हिन्दू राष्ट्रवादी ग्रुप्स को इस नरसंहार के लिए जिम्मेदार ठहराया। इस रिपोर्ट ने पुलिस व्यवस्था पर भी सवाल उठाए। सरकारी आंकड़ों के अनुसार दंगों के बाद 87 मस्जिद और दरगाह तबाह किए गए और 3 मंदिरों को भी निशाना बनाया गया।

इसके ठीक 33 साल बाद, साल 2002, गोधरा।

गोधरा रेलवे स्टेशन पर खड़ी ट्रेन की एक बोगी में अचानक लगी आग कब सांप्रदायिक दंगे को चिंगारी दे जाती है पता भी नहीं चलता। अहमदाबाद से 120 किलोमीटर दूर गोधरा, पंचमहल का जिला मुख्यालय। 20 लाख की जनसंख्या में करीब 20 प्रतिशत मुसलमान। सिर्फ गोधरा के ही कुल 2 लाख जनसंख्या में से आधे मुसलमान थे। शहर एक अदृश्य रेखा से दो भागों में बांटा जा चुका था और एक हिस्से के लोग दूसरे हिस्से वालों को पाकिस्तानी कह कर बुलाया करते थे।

27 फरवरी 2002 की सुबह अहमदाबाद-साबरमती एक्सप्रेस से कार सेवक अयोध्या से गोधरा आ रहे थे। कार सेवक गुस्से में थे। गुस्से का कारण था, उत्तर प्रदेश में बीजेपी-आरएसएस की साझा हार। यह गुस्सा और भी अधिक था क्योंकि पार्टी अयोध्या-राम मंदिर मुद्दे के बाद भी राजनाथ सिंह के नेतृत्व में हार गयी थी। इससे संघ परिवार सदमे में था। कार सेवक और अन्य यात्री तब बुरी तरह फंस गए, जब स्लीपर कोच एस-6 में सुबह 7:45 और 8:00 बजे के बीच आग लग गई। 58 लोग मारे गए। खबर यह फैलाई गई कि ट्रेन पर स्थानीय मुसलमानों ने हमला किया है, जिससे हिन्दू समुदाय गुस्से में आ गया। एक तबाही जिसमें अल्पसंख्यकों को टारगेट करते हुए दंगे फैलाए गए, जहां करीब 2,000 लोगों की मौत हुई और कई घायल और बेघर हुए। इस घटना से मुस्लिम समुदाय का सरकार और पार्टियों पर बचा हुआ भरोसा भी खत्म हो गया था। खत्म इसलिए हो गया था क्योंकि इस घटना के ठीक पहले दो बड़ी घटनाएँ घटी थीं, बाबरी मस्जिद विध्वंश (1992) और मुंबई दंगे (1993)।

इस घटना की जांच चल रही थी, केस को एन्टी टेरिरिज़्म स्क्वाड को दे दिया गया। पूछने पर गोधरा की तब की कलेक्टर और इस मामले में सबसे ज्यादा मददगार अधिकारी ने सिर्फ मुस्कुराना ही उचित समझा। केस की जांच एन्टी टेरिरिज़्म स्क्वाड के डीआईजी विजय विपुल को सौंप दी गई थी। एक बार इस पूरी घटना को ध्यान से देखने पर यह समझ आता है कि इसे एन्टी टेरिरिज़्म स्क्वाड को क्यों सौंप दिया गया। उस वक्त पूरा विश्व आतंकवाद से लड़ रहा था। हर तरफ आतंकी घटनाओं के लिए गुस्सा था। आतंकवाद को मुसलमानों से जोड़कर देखा जाने लगा था और उस वक्त राज्य की नरेंद्र मोदी सरकार ने इसे भी आतंकी घटना घोषित कर दिया।

ये सभी घटनाएँ किसी न किसी राजनीतिक नफे-नुकसान से जुड़ी होती हैं, इनका राजनीतिकरण करने से सभी मना तो करते हैं पर ये घटनाएँ राजनीति से ही प्रेरित होती हैं। किसी एक समुदाय को टारगेट करते हुए फॉल्स नैरेटिव जान बूझकर सेट किया जाता है। सरकार का प्रमुख ‘प्रधानमंत्री’ उस खास सरकार की विचारधारा का चेहरा होता है। यह लगभग सभी प्रधानमंत्रियों के साथ एक जैसा ही है, प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई को छोड़कर। दो बार प्रधानमंत्री हो चुके (मई 1996-जून 1996 और मार्च 1998–मई 2004) अटल बिहारी वाजपेई ने कहा था कि जुबान गालों से चिपक कर रहे तो अच्छा होता है। बंटवारा हिंदुओं के लिए अच्छा था क्योंकि हमें कुछ ही मुसलमानों को मैनेज करना पड़ता है। बेशक, वाजपेई का झुकाव आरएसएस की ओर रहा लेकिन, वाजपेई नरसिम्हा राव से कम बांटने वाले प्रधानमंत्री थे, यह भी सच है।

हिंदुत्ववाद, हिन्दू और एक धर्मनिरपेक्ष देश के प्रधानमंत्री।

पंडित नेहरू से लेकर नरेंद्र मोदी तक सभी की अपनी-अपनी राजनीतिक विचारधारा रही है। लेकिन, भारत एक ऐसा  देश है जहां कई विचारधारा के लोग रहते हैं वहाँ एक प्रधानमंत्री को अपनी विचारधारा से कई बार समझौता करना पड़ता है। इसमें कुछ गलत नहीं है। लेकिन, यह समझौता किस हद तक संभव है? समझौते का मतलब यह कतई नहीं कि आप खुद को भूल जाएँ पर अपनी विचारधारा को थोपने के चक्कर में किसी और को भुला देना भी उचित नहीं होगा। मोदी सरकार के कार्यकाल में कुछ ऐसा ही हो रहा है। पंडित नेहरू जब देश के प्रधानमंत्री थे तब उन्हें मुसलमानों का मसीहा भी कहा गया। एक हिन्दू ब्राह्मण कई मुस्लिम देशों का चहेता था। कई मुस्लिम राष्ट्र नेहरू को अपना बताया करते थे। इसी क्रम में अवध मूल के पाकिस्तानी कवि रईस अमरोहा नेहरू की प्रशंसा करते हुए लिखते हैं कि-

जप रहा है आज माला एक हिन्दू की अरब,

ब्राह्मणज़ादे में शान-ए-दिलबरी ऐसी तो हो!

हिकमत-ए-पंडित जवाहरलाल नेहरू की कसम,

मर मिटे इस्लाम जिस पर, काफ़िरी ऐसी तो हो।

पंडित नेहरू एफ़्रो-एशियन ब्लॉक में अपनी मौत तक सबसे अधिक निर्विवाद नेता या किसी देश के प्रधानमंत्री रहे। सभी मुस्लिम राष्ट्रों के साथ उनके सुगम रिश्तों की वजह से उस वक्त देश के मुसलमान भी डर और चिंता मुक्त रहे।  यह सब कुछ अब नहीं है। देश के मुसलमान अब खुले तौर पर यह कहते हैं कि उन्हें देश में डर लगता है। यह सोचने और समझने लायक है कि नेहरू क्यों पूरे जीवन मुसलमानों के बीच निर्विवाद रहे। कुछ लोग इसे अलग चश्में से भी देखते हैं और उस छवि को बिगाड़ने की कोशिश करते हैं।

प्रधानमंत्री की छवि के किसी समुदाय के बीच बनने और बिगड़ने से पूरा समुदाय प्रभावित होता है। भारत सभी का है। सभी इस देश में बराबर हैं। इस बराबरी का अहसास यदि देश के प्रधान की ओर से आना बंद हो जाए तो जनता खूब प्रभावित होती है। प्रधानमंत्री का किसी समुदाय के लिए उपयोग की गई हेट स्पीच, किसी खास मुद्दे को लेकर उस समुदाय को टारगेट करने को गलत ठहरना और उस पर बोलना या कुछ न बोलकर सही ठहरना भी कई बार देश के विभिन्न समुदायों के बीच मतभेद और गलतफहमियाँ पैदा करता है। जिससे जरूर बचना चाहिए। साल 2014 के बाद से ही देश में बढ़ते गाय के नाम पर लोगों की भीड़ द्वारा हत्या पर जब प्रधानमंत्री चुप रहते हैं तो अल्पसंख्यकों के मन में डर पैदा होना लाजमी है। यह डर प्लांटेड होता है। इसे बनाया जाता है। प्रधानमंत्री का चुप रहना या बोलना उनके मजबूत या कमजोर होने से नहीं जोड़ना चाहिए। यह सब कुछ एक धीमी प्रक्रिया है।

भारतीय मुसलमान कश्मीर नैरेटिव से भी अछूते नहीं रहे हैं। यह मुद्दा आखिरी तो नहीं, पर सबसे जरूरी है। 28 अक्टूबर 1947 से लेकर आज तक कश्मीर जल ही रहा है। पहले बंटवारा, फिर आतंकवाद और अब धारा 370 के हटने के बाद। आजादी के बाद का जो सबसे अहम सवाल था वो यही था कि हिन्दू जनसंख्या के साथ मुस्लिम शासित प्रदेश (हैदराबाद और जूनागढ़) और मुस्लिम जनसंख्या के साथ हिन्दू शासित प्रदेश कश्मीर का क्या होगा? वो भारत में रहेंगे या पाकिस्तान के साथ जाएंगे। हैदराबाद ने खुद को आज़ाद रखने का प्रस्ताव दिया। भारत ने सेना भेजकर उसे अपने हिस्से में शामिल करा लिया। जूनागढ़ ने पाकिस्तान के साथ जाने की बात की। लेकिन, भारत को यह मंजूर नहीं था क्योंकि जूनागढ़ में हिंदुओं की जनसंख्या ज्यादा थी। लेकिन कश्मीर, कश्मीर के महाराजा हरी सिंह ने पाकिस्तान के साथ जाने से मना कर दिया। वो जम्मू के भारत में शामिल हो जाने के पक्ष में थे लेकिन, कश्मीर में जनमत संग्रह चाहते थे। यहाँ से शुरू हुआ कश्मीरनामा

भारतीय मुसलमानों के लिए फॉल्स नैरेटिव सिर्फ कश्मीर तक ही नहीं सीमित है। बढ़ते आतंकवाद के साथ ही इसे मुसलमानों से जोड़ा जाने लगा और सोच समझकर पूरे समुदाय से ही जोड़ दिया गया। अब यहाँ से एक मुसलमान को आतंकवादी कहे जाने में ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं थी। साल 2001, पाकिस्तान ने विश्व के दूसरे देशों के साथ मिलकर आतंकवाद से लड़ने वालों की लिस्ट में खुद को शामिल करा लिया था। ये वही देश था जिसके कारण भारत 1989 से ही आतंकवाद से पीड़ित था। लेकिन, वो देश रातों-रात अमरीका के साथ आतंकवाद से लड़ने वालों की लिस्ट में शामिल था। आतंकवाद के पश्चिमी नैरेटिव को समझते हुए मीडिया वो सब कुछ दिखाने लगा जो मुसलमानों को आतंकवाद से जोड़ सके। देखते-देखते पूरा विश्व दो धड़ों में बंट चुका था। मुस्लिम और नॉन-मुस्लिम, जिससे सांप्रदायिक तापमान में अचानक वृद्धि हुई। 9/11 के न्यूयॉर्क के ट्विन टावर से दो यात्री विमानों के टकराने के पहले से ही पूरा माहौल इस्लामोफोबिया से भर चुका था। अफगानिस्तान का आतंक पर लगातार हमले ने इसे एक कभी न खत्म होने वाले युद्ध सा बना दिया था। इस आतंक के विरुद्ध छिड़े युद्ध में जुड़ने के साथ ही भारत ने अपने देश के मुसलमानों को ही अलग-थलग करना शुरू कर दिया। वैश्विक स्तर पर भारत खुद को आतंक से लड़ने वाले देशों की अग्रिम पंक्ति में देखना चाहता था। इसी जल्दीबाजी में उसने अपने ही लोगों को अलग कर दिया। ये वही भारतीय मुसलमान थे जो सदियों से साथ रह रहे थे। लेकिन, तब से शुरू उस नैरेटिव को कभी भी न बदला जा सका और न ही किसी ने बदलने की कोशिश की। यह सब कुछ समय के साथ और ज्यादा बिगड़ने लगा। अब हालात और भी बदतर हैं। लिंचिंग से लेकर दंगों तक, मुसलमानों को एकदम अलग-थलग कर देना अब सामने से शुरू हो गया है। यह सब कुछ पहले पर्दे के पीछे था। अब सब कुछ साफ है। एक देश है, एक सरकार है, कई समुदाय हैं, एक समुदाय अब ‘अन्य’ है।  

-करुणेश किशन  

सईद नक़वी की किताब ‘बीइंग द अदर: द मुस्लिम इन इंडिया’ पर आधारित।