हाल ही में मैंने एक फिल्म देखी। फिल्म का नाम था जंजीर। अमिताभ बच्चन वाली जंजीर। जिसने उनको यंग एंग्रीमैन के नाम से नवाजा। उसमें एक सीन है, जिसमें इंस्पेक्टर यानि कि अमिताभ बच्चन शेरखान यानि कि प्राण को बुलाता है। प्राण का एक उसमें डायलाॅग है। ‘‘इलाके में नए आए हो साहेब, वरना यहां शेरखान को कौन नहीं जानता।’’ ऐसी ही अनगिनत डायलाॅग हैं जो हिंदी सिनेमा में अमर हो गये हैं। इन डायलाॅगों और अपने तेवरों के लिए जाने वाले अभिनेता प्राण का आज जन्मदिन है।

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फिल्मों में उनका अंदाज़ हमेशा से कड़क ही रहता था या फिर वे अपनी एक्टिंग और आवाज़ के दम से उसे खास बना देते थे। उनकी अहमियत इसी बात से समझी जा सकती है कि उनका नाम बाकी सितारों से अलग ‘एंड प्राण’ करके आता था। वो तो खास था ही। प्राण उस गली में पैदा हुए थे जहां पर मिर्जा गालिब रहते थे।

खलनायक को दी नई जान

उनकी शुरूआती दौर के बात करें तो फिल्मों में आने से पहले वह फोटोग्राफर थे। वह लाहौर में फोटोग्राफी करते थे। उन्हें कैमरों से तस्वीरें कैद करना अच्छा लगता था। उससे उनकी 200-300 रूपये तक की आमदनी हो जाती थी। जो उनके लिए काफी थी। लेकिन शायद कैमरे को उस व्यक्ति की शक्ल और सूरत पसंद आ गई थी। जो हमेशा कैमरे के पीछे रहता था। अब उनको कैमरे के आगे रहना था।

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उनकी पहली फिल्म ‘यमला जट’ थी। जिसमें वे एक विलेन का किरदार कर रहे थे। उन्हें इस फिल्म के लिए 50 रूपये की अदायगी भी मिली थी। उनकी बुलंद आवाज, तेवर को इस फिल्म में खासा सराहा गया। जिस कारण उन्होंने लाहौर इंडस्ट्री में 22 फिल्मों में काम किया। लाहौर इंडस्ट्री में उनको निगेटिव रोल यानि कि विलेन ही बनाया जाता था। लेकिन दलसुख पंचोली ने हिंदी फिल्म ‘खानदान’ में बतौर नायक के रूप में पहली बार मौका दिया। इस फिल्म में उस दौर की नूरजहां उनकी नायिका के रूप में थी।

मंटो ने दिलाया काम

1947 में देश का बंटवारा हुआ। प्राण हिंदुस्तान चले आए। उनको लगता था कि उनको काम आसानी से मिल जायेगा। वे पहले से एक खलनायक के रोल में आ चुके थे। लेकिन बंबई में काम इतना भी आसान नहीं था। उनको भी कुछ दिन खाली रहना पड़ा। इसी बीच उनके साथ एक अच्छी बात हुई। उनकी दोस्ती सआदत हसन मंटो से हो गई। मंटो की सिफारिश उनको हिंदी सिनेमा में काम मिल गया। उनको फिल्म ‘जिद्दी’ में विलेन के रूप मेें कास्ट कर लिया गया। यह फिल्म देवानंद की पहली हिट फिल्म हुई। इस फिल्म ने हिंदी सिनेमा को प्राण जैसा एक्टर जो हर रोल के लिए ढला हुआ था और किशोर कुमार जैसा गायक दिया।

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प्राण ने अपने फिल्मी कैरियर में 400 से ज्यादा फिल्मों में काम किया। उनके बारे में कहा जाता है कि वह काम में तल्लीनता और वक्त के पाबंद थे। उन्हें विलेन के रूप में देखा जाता है लेकिन उन्होंने अपने कैरियर में कई वैरायटी के किरदार किये। उन्हें रोल मिलते गये और उन्होेंने उनको करने से कोई परेशानी नहीं जताई। वह तो बस किरदार की जिंदगी को संजीदगी में जीने में विश्वास करते थे।

प्राण के साथ काम करने वालों में रजा मुराद भी हैं। वो उनके बारे में बताते हैं- ‘‘मैं समझता हूं उनके जितना मेहनती, लगनशील और वक्त का पाबंद कोई इंसान नहीं है। वे मेकअप करके सुबह नौ बजे ही सेट पर आकर बैठ जाते थे। चूंकि उस समय एसी नहीं होती थी। बहुत ज्यादा गर्मी और उमस होती थी। फिर भी प्राण साहब सेट पर दाढ़ी-मूंछ लगाकर अपने मोटे काॅस्टयूम के साथ सेट पर पहुंच जाते थे। एक शिकन नहीं होती थी उनके चेहरे पर।’’

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उनके रोल इतने संजीदगी भरे रहते थे कि लोग उनको वैसे ही देखते थे। फिल्म ‘राम और श्याम’ में उन्होंने एक क्रूर खलनायक के रूप में रहे थे। उसके बाद लोग उनसे नफरत करने लगे थे। वे कहते थे कि उनको कभी किसी लड़की की चिट्ठी नहीं आई। वे बताते हैं कि उनके लिए यह किसी खुशखबरी से कम नहीं है जो उनकी कामयाबी को बताता है।

सम्मान

400 से ज्यादा फिल्मों में काम करने वाले बेबाक और बिंदास अभिनेता ने 90 के बाद काम करना बंद कर दिया था। उनके काम को भारत सरकार ने थोड़ी देर से सराहा। सन 2001 में उन्हें पद्म भूषण से नवाजा गया। 1997 में उनको लाइफटाइम अचीवमेंट अवाॅर्ड भी दिया गया था। फिल्म ‘बेईमान’ के लिए उन्होंने बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का अवाॅर्ड लौटा दिया था। जिस अवार्ड को पाना हर एक्टिंग करने वाले की हसरत होती है। वह उन्हें तब मिला, जब वह शरीर से पूरी तरह अक्षम थे। साल 2012 में उन्हें दादा साहेब फाल्के अवाॅर्ड से नवाजा गया और 12 जुलाई 2013 को इस महान अभिनेता का इंतकाल हो गया।

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