1895 में लुमियर बंधु ने पहली चलती-फिरती फिल्म बनाई जो 45 सेकेंड की थी। 1910 में भारत में ‘द लाइफ ऑफ क्राइस्ट’ दिखाई गई। उस थियेटर में एक नौजवान बैठा था। जो इस फिल्म को देखकर जोर-जोर से ताली बजा रहा था। उसने सोच लिया था कि मुझे भी कुछ यही काम करना है। वो आगे चलकर भारत को सिनेमा को जगाने चला था। वो शख्स दादा साहेब फाल्के थे। आज उन्हीं दादा साहेब की पुण्यतिथि है।

Dada Sahab Falke Bollywood Googlyदेश का सिनेमा उद्योग आज अरबों रूपये का है। हर शुक्रवार को सिनेमा में एक मूवी लगती है और एक उतरती है। उसी सिनेमा को शुरू करने वाले शख्स को हमने बस एक अवाॅर्ड में बिठा दिया है। घुंडीराज दादा फाल्के, जिनको दादा साहेब फाल्के के नाम से याद करते हैं।

फिल्मों का नशा

1910 की वो फिल्म दादा साहेब के लिए टर्निंग प्वाइंट रही। उसके बाद दादा साहेब का एक ही काम था, थियेटर में मूवी देखना। वे मूवी को देखते और उसके हर बारीकी, पहलुओं को समझते। वे लगातार दो महीने तक यही काम करते रहे। रोज 5 घंटे मूवी देखने के कारण वे समय से पहले ही कमजोर और बूढ़े दिखने लगे। उनको आंखों से दिखाई देना कम हो गया। मूवी देखने के लिए उन्होंने सोना कम कर दिया। वे हर रोज बस 3 घंटे ही सोते, वे बस फिल्म बनाने की अधेड़बुन में लगे रहते।

Image result for dada saheb phalkeफिल्म बनाने का जुनून उनके अंदर इतना था कि उन्होंने अपनी सरकारी नौकरी तक छोड़ दी। वे पुरात्व विभाग के फोटोग्राफर पद पर थे। गोधरा शहर जो 2002 के दंगे के लिये याद किया जाता है। वो शहर दादा साहेब फाल्के से भी जुड़ा है। इस शहर में वे पेशेवर फोटोग्राफर बनने के लिये गये। इस शहर में दादा साहेब फाल्के दो साल तक रहे। जब इस शहर में पहले उनकी बीबी मरी और फिर बेटी। तब उन्होंने शहर छोड़ दिया।

दादा साहेब फाल्के की पहली फिल्म ‘राजा हरिश्चन्द्र’ है। जो पहली मूक फिल्म है, जिसमें कोई डायलाॅग नहीं था। फिल्म को वीडियो और लिखे हुये शब्दों से समझाने की कोशिश की थी। इस फिल्म को बनाने के लिये दादा साहेब ने 15 हजार रूपये खर्च किये थे। ये फिल्म बड़ी ही कम कीमत पर बनाई गई थी। तब भी दादा साहेब को फिल्म के लिए चंदा जुटाना पड़ा था, कर्ज लिया और अपनी संपत्ति को गिरवी रख दिया।

Image result for dada saheb phalkeदादा साहेब के लिए सबसे बड़ी समस्या थी लोगों से एक्टिंग कराना। लोग इतने कम पैसे में एक्टिंग नहीं करना चाहते थे। ये वो दौर था जब महिलाएं पर्दे के पीछे रहती थी। राजा हरिश्चन्द्र में किसी भी महिला ने एक्टिंग नहीं की। महिला के कैरेक्टर को भी पुरूषों ने किया। हालांकि बाद में दादा साहेब फाल्के ने ही अपनी फिल्म से महिलाओं को अभिनय में लांच किया। सबसे पहले जिन दो लड़कियों ने फिल्म में काम किया। उनका नाम है- दुर्गा गोखले और कमला गोखले। दोनों ने मोहिनी भष्मासुर में पहली बार काम किया।

परिवार ने दिया साथ

दादा साहेब फाल्के शायद अकेले फिल्म नहीं बना पाते। अगर उनका परिवार साथ न देता। फिल्म बनाने के लिए उनका परिवार हमेशा साथ खड़ा रहा। उनका घर फिल्म स्टूडियों में तब्दील हो गया था। जहां लोगों की कमी होती, परिवार के सदस्य ही उनकी कमी पूरी करते। जब वे श्रियाल चरित्र फिल्म बना रहे थे तो पैसे की कमी आ गई। तब उनकी पत्नी ने अपने गहने बेचकर पैसे की कमी को पूरा किया था।

Image result for dada saheb phalkeदादा साहेब ने अपने 19 साल के फिल्मी करियर में 95 फिल्में बनाईं और 26 शाॅर्ट फिल्में। 1937 में उन्होंने अपनी आखिरी मूवी गंगातरण बनी। गंगातरण उनकी पहली बोलती हुई फिल्म थी। उनके आखिरी दिन बेहद गरीबी में गुजरे और 16 फरवरी 1944 को उनका निधन हो गया। वो शख्स आज बस अवाॅर्ड में जिंदा है। जिसको जो एक्टर पा लेता है अपने को धन्य समझता है।

Facebook Comments

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here