चौधरी चरण सिंह, इस शख्स को किस वजह से याद रखा जाना चाहिए। देश के पांचवें प्रधानमंत्री के रूप में या उस प्रधानमंत्री के रूप में जो संसद नहीं जा पाया या फिर याद रखा जाए उत्तर प्रदेश की सियासत बदलने वाले नेता के रूप में। क्या इसलिए भी याद रखा जाए कि महात्मा गांधी के इस चेले की जवाहर लाल नेहरू से नहीं बनती थी। इसके बावजूद जब तक जवाहर लाल नेहरू जिंदा रहे, चौधरी चरण सिंह कांग्रेस में ही रहे या फिर किसान नेता के रूप में याद किया जाए। चौधरी चरण सिंह के बहुत सारे पहलू हैं। उन्होंने सब पहलुओं को समेटते हुए तब की बात में आज कहानी देश के पांचवे प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की।

चौधरी चरण सिंह, फोटो सोर्स- गूगल

चौधरी चरण सिंह का जन्म 23 दिसंबर 1902 को उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के हापुड़ में हुआ था। चौधरी चरण सिंह के पिता मीर सिंह ने अपने बेटे को नैतिक मूल्य बचपन में सिखा दिए थे। जब चरण सिंह 6 साल के थे तभी उनका पूरा परिवार नूरपुर के पास भूपगढ़ी में आकर बस गए। चरण सिंह का बचपन यहीं बीता। यहीं उन्होंने किसानों पर अन्याय होते देखा, किसानों पर हो रहे शोषण ने चरण सिंह में बड़ा बदलाव ला दिया। ये वो दौर था जहां किसान समस्याओं से पटा पड़ा था, उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं था। छोटे-से चरण सिंह ने उनकी सुध लेने की सोच ली थी, लेकिन उससे पहले कुछ बनना था।

चरण सिंह 26 साल तक राजनीति से दूर रहे और अपना पूरा ध्यान पढ़ाई पर लगाया। चरण सिंह को पता था कि कांग्रेस में अनपढ़ लोग समर्थक और नीचे ही रहते हैं। उच्च स्तर पर पहुंचने के लिए शिक्षा बहुत जरूरी है, इसके लिए उन्होंने कानून की पढ़ाई को चुना। 1923 में बीएससी की, 1925 में एमए किया और 1928 में गाजियाबाद में वकालत करने लगे। इसी वकालत से वे लोगों की समस्याओं, भारतीय राजनीति को समझने की कोशिश करने लगे। 1928 ये वो दौर था जब साइमन कमीशन का गठन हो चुका था और भारत में इसका हर जगह विरोध हो रहा था। वहीं कांग्रेस और आजादी के शीर्ष पर थे महात्मा गांधी। जो वो कह देते जनता वही करने लगती, वो जहां चलते जनता वहीं चलने लगती।

1929 में कांग्रेस ने अपने लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज्य की घोषणा कर दी। चरण सिंह इससे बड़े प्रभावित हुए और गाजियाबाद में कांग्रेस कमेटी का गठन किया। ये उनकी सियासत की शुरूआत नहीं थी, वो भारत को आजाद कराने में भूमिका निभा रहे थे। 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हुआ, पूरा देश नमक तोड़ने के लिए तैयारी था। महात्मा गांधी के आह्वान पर चरण सिंह ने भी नमक कानून तोड़ा। गाजियाबाद में तो समुद्र था नहीं, जहां नमक तोड़ा जाता इसलिए चरण सिंह हिंडन नदी के किनारे गए। वहां नमक बनाया। अंग्रेजों ने चरण सिंह को जेल में डाल दिया। 6 महीने के बाद चरण सिंह जेल से बाहर निकले। चरण सिंह अब स्वतंत्रता आंदोलनकारी बन गए थे।

फोटो सोर्स- गूगल

साल 1937 जब पहली बार प्रांतीय चुनाव हुए। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की अंतरिम सरकार बनती है, उसमें विधायक बनते हैं चरण सिंह। विधायक बनने के बाद वे किसानों के लिए कुछ बेहतरीन काम करते हैं। 1938 में उन्होंने किसानों को समझाया कि लड़ाई-झगड़ा अदालत की बजाए आपस में बातचीत से सुलझाए। 1939 में कर्ज माफी विधेयक पास करवाते हैं, जिससे किसानों के खेतों की नीलामी रूक जाती है। 1940 में उत्तर प्रदेश में दंगे होते हैं लेकिन चरण सिंह की कुशलता की वजह से सब कुछ काबू में हो जाता है।

1940 कांग्रेस के लिए दिमागी खेल जैसा साल था। कांग्रेस सोच में थी कि अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन छेड़ा जाए या नहीं। सत्याग्रह बड़े स्तर पर शुरू न करके छोटे स्तर पर शुरू किया जाता है। उस आंदोलन में चरण सिंह भी शामिल थे, चरण सिंह को जेल हो गई लेकिन जल्दी छोड़ भी दिया गया। 1942 में ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन शुरू हो गया। देश भर के बड़े नेताओं को जेल में ठूंस दिया गया लेकिन फिर भी ये आंदोलन बढ़ता ही जा रहा था। इस बार चौधरी चरण सिंह जेल नहीं गए, उनको दूसरा काम दिया गया था। चौधरी चरण सिंह को अंडरग्राउंड रहकर संगठन को बनाए रखना था। पुलिस का आदेश था कि देखते ही चरण सिंह को गोली मार दी जाए। चौधरी चरण सिंह अपना काम करके निकल जाते और पुलिस हाथ पर हाथ रखे रह जाती। लेकिन आखिरकार चकमा देने के चक्कर में गिरफ्तार हो गए। चौधरी चरण सिंह को डेढ़ साल सजा हुई और वहीं उन्होंने जेल में किताब लिखी, शिष्टाचार

जेल से बाहर निकले, अंग्रेजों ने भारत छोड़ने का ऐलान कर दिया। 1946 में अंतरिम सरकार बनती है। इस बार फिर से चौधरी चरण सिंह विधायक बनते हैं। देश आजाद हो जाता है जवाहर लाल नेहरू देश के प्रधानमंत्री बनते हैं और चौधरी चरण सिंह उत्तर प्रदेश की सियासत में रहते हैं। आजादी के बाद नेहरू देश को पटरी पर लाने की कोशिश कर रहे थे। वे कहते तो कि उनका झुकाव न रूस की तरफ और न ही अमेरिका की तरफ। लेकिन उनकी जो नीतियां थीं वो सोवियत की ओर झुकाव दर्शा रही थीं। इसी का एक धड़ा विरोध कर रहा था जिनका मानना था कि इससे कुछ नहीं होगा। ये देश तभी आगे बढ़ेगा जब देश का निचला तबका यानी किसान को उसको हक मिलेगा। इसी धड़े में आते थे चौधरी चरण सिंह।

फोटो सोर्स- गूगल

ये वो दौर था जब कांग्रेस का मतलब जवाहर लाल नेहरू थे, उनका विरोध करना बहुत बड़ी बात थी वो भी कांग्रेस में रहकर। 1952 में विधानसभा चुनाव जीते, 1957 में भी जीते और 1962 में भी। 1964 में जवाहर लाल नेहरू का निधन हो गया, इसके बाद लाल बाहदुर शास्त्री का भी ताशकंद में आकस्मिक निधन हो गया। अब कांग्रेस की बागडोर इंदिरा और कामराज के हाथ में थी। चौधरी चरण सिंह हाशिए पर ढकेल दिए गये लोगों के लिए राजनीति करते थे न कि खुद हाशिए पर जाकर। जब चौधरी चरण सिंह को लगा कि कांग्रेस में वे बढ़ नहीं पा रहे हैं तो 1967 में उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और अपनी नई पार्टी बनाई, भारतीय क्रांति दल।

कांग्रेस के 16 विधायक भी चौधरी चरण सिंह की नई-नवेली पार्टी में शामिल हो गए। 1967 में चरण सिंह ने एक गठजोड़ किया। गठजोड़ जनसंघ, कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय क्रांति दल और समाजवादियों के साथ। इनके गठजोड़ से उत्तर प्रदेश में 1967 में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। मुख्यमंत्री बने चौधरी चरण सिंह। मुख्यमंत्री बनते ही चौधरी चरण सिंह ने बड़ा फैसला लिया और खाद्य से सेल्स टैक्स हटा दिया। सरकार ज्यादा दिन नहीं टिक पाई, विवादों से घिरकर ये सरकार 25 फरवरी 1968 को गिर गई और राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। 1970 में दोबारा मुख्यमंत्री बने चौधरी चरण सिंह, इस बार सरकार चली 226 दिन।

1974 में चौधरी चरण सिंह ने भारतीय लोकदल पार्टी बनाई, आगे चलकर 1977 में इसी पार्टी के टिकट पर जनता पार्टी चुनाव लड़ने वाली थी और पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनाने वाली थी। आपातकाल लगा, देश की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार भी बनी। मोरारजी देसाई और चौधरी चरण सिंह के बीच खूब विवाद हुआ। दरअसल चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बनना चाहते थे लेकिन जब जयप्रकाश नारायण ने मोरारजी देसाई का नाम आगे किया तो चौधरी चरण सिंह अपनी लालसा को दबाए रखा। चौधरी चरण सिंह इस गैर-कांग्रेसी सरकार में उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री बनाए रखे।

मोरार जी देसाई, फोटो सोर्स- गूगल

चौधरी चरण सिंह की प्रधानमंत्री बनने की लालसा ने देश की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार गिरा दी। जनता पार्टी की सरकार गिरी तो चौधरी चरण सिंह ने कांग्रेस के सपोर्ट से सरकार बना ली और 28 जुलाई 1979 को देश के पांचवें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। चौधरी चरण सिंह को 20 अगस्त को संसद में बहुमत परीक्षण देना था।

15 अगस्त को प्रधानमंत्री के रूप में लाल किले से भाषण दिया लेकिन संसद में प्रधानमंत्री के रूप में कुछ भी नहीं बोल पाए। क्योंकि 19 अगस्त 1979 को इंदिरा गांधी ने अपना समर्थन वापस ले लिया और चौधरी चरण के नाम रिकाॅर्ड दर्ज हो गया। चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री के रूप में एक भी दिन संसद न जाने वाले प्रधानमंत्री हो गए। 29 मई 1987 को किसान नेता चौधरी चरण सिंह का निधन हो गया।

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