19वीं सदी के दौर में एक आम भारतीय शख्स एक बड़े और महंगे होटल में जाता है लेकिन उसे अंदर नहीं आने दिया जाता है। क्योंकि उस शख्स का रंग काला और वो भारतीय है। जबकि इस होटल में सिर्फ गोरे लोग ही आ सकते हैं। उसी वक्त उस अपमानित शख्स ने मन में ठान लिया था कि वो इससे भी शानदार होटल बनायेंगे। उस वाकये के महज 7 साल बाद ही समुद्र किनारे एक होटल बनकर खड़ा हो जाता है जो आज ताज होटल के नाम से जाना जाता है। इस होटल को बनवाया था जमशेदजी टाटा ने।

Image result for jamshes ji tataमुंबई में समुद्र किनारे बना होटल इस शहर की पहचान है। यहां आकर हर बड़ा आदमी रूकता है और जो नहीं रूक पाता वो इसकी खूबसूरती को बटोरता है। ये ताज होटल है जिसे बनाने में उस वक़्त 4 करोड़ लगे थे। ये इमारत तब बनी थी जब मुंबई ‘बांबे’ हुआ करता था। ये बांबे की पहली इमारत थी जहां बिजली थी और अमेरिकी पंखे लगे हुये थे। ऐसा होटल जिसकी उस समय किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। आज उसी होटल को बनाने वाले का जन्मदिन है।

जमशेदजी टाटा

जमशेद टाटा का जन्म 3 मार्च 1839 को एक पारसी परिवार में हुआ था। उनके पिता नुसरवानजी व्यापार करते थे। जमेशद टाटा जब 14 साल के थे तब वे अपने पिता के साथ बंबई आ गये। वे अपने पिता के साथ बिजनेस में हाथ बंटा रहे थे और साथ में पढ़ाई भी कर रहे थे। 1857 की क्रांति हुई और उसे कुचल भी दिया गया। इस दौरान जमेशद टाटा ने अपनी ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की और पूरी तरह से बिजनेसमैन बनने के लियेे तैयार हो गये।

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व्यापार को अच्छी तरह से समझने के लिये उन्होंने अमेरिका से लेकर इंग्लैंड तक की कई विदेश यात्राएं कीं। 1868 में उन्होंने 21,000 रूपये में अपनी कंपनी खोली। ये किसी भारतीय द्वारा खोला गया पहला स्टार्ट-अप था। तब जमशेद टाटा सिर्फ 29 साल के थे। आज तो हर कोई बस स्टार्ट-अप खोलने की बातें करता है। लेकिन उस समय देश अंग्रेजों से लड़ रहा था, गरीबी और अकाल से जूझ रहा था। तब ऐसे किसी स्टार्ट-अप का खोलना साहस और जोखिम की बात थी।

पहली स्टील कंपनी

साल 1869 में उन्होंने एक दिवालिया तेल मिल को खरीदा। उसके बाद उन्होंने कपड़ा, चाय, तांबा और अफीम के कारोबार को भी संभाल लिया। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। आज उनकी ही खोली हुई कंपनी ‘टाटा’ सुई से लेकर हवाई जहाज बनाती है। हम भारतीय न जाने कितने ही टाटा के प्रोडक्ट को इस्तेमाल करते हैं। वे हमेशा से कारोबारी थे। उन्होंने पढ़ाई में भी नाम कमाया और बाजार को इस्तेमाल कैसे करना है, इसके सारे गुर वे जानते थे।

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उनका कारोबार बढ़िया चलता रहा। वे ‘भारतीयता’ को वापिस लाने के हिमायती थे। उन्होंने हमारी बंद पड़ी मिलों को वापिस लाने की कोशिश की। 1877 में उन्होंने पहली कपड़ा मिल खोली। बांबे के चिंचपोकली में बंद पड़ी एक तेल मिल का अधिग्रहण किया और शुरू किया। इन मिलों में वे भारतीय मजूदरों को काम देते थे और उनका ध्यान रखा जाता था। जमशेदजी का सपना था कि वे देश को एक स्टील कंपनी दें। हालांकि वे काम नहीं कर सके। उनके मरने के बाद उनके बेटे ने टिस्को कंपनी खोली। जो देश की पहली इस्पात कंपनी थी।

जमशेदजी टाटा के विज्ञान की दुनिया देखनी हो तो आपको झारखंड के टाटानगर जाना चाहिये। जहां जमशेदजी की झलक दिखती है। वे विज्ञान के बड़े समर्थक थे। उन्होंने बंगलुरू में इंडियन इंस्टीट्यूस ऑफ साइंस के लिये अपनी आधी संपत्ति दान कर दी थी।

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