सुप्रीम कोर्ट के नए फैसले के बाद अब बिल्डर्स से मकान खरीदने वाले खरीदारों को भी कर्जदाता का दर्जा मिलेगा। सुपरटेक, एम्मार, एटीएस, अंसल, वेव समेत करीब 180 बिल्डर कंपनियों ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दर्ज की थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। सभी बिल्डर कंपनियों का कहना था कि कानून में ये बदलाव रियल एस्टेट सेक्टर को नुकसान पहुंचाएगा।

किसी कंपनी से जुड़े इंसॉल्वेंसी (दिवालिया) एंड बैंकरप्सी कोड 2016 (आईबीसी) कानून में अब बदलाव की मंजूरी दे दी गयी है। अब तक होता ये था कि सिर्फ बैंक बड़े फाइनेंशियल कर्जदाता ही किसी बिल्डर कंपनी से अपना कर्ज़ वसूल करने के लिए नेशनल कंपनी लॉं ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) जा सकते थे। एनसीएलटी में उस कंपनी के खिलाफ कार्यवाई करके उससे वसूली की जा सकती थी। इस प्रक्रिया में वसूल होने वाले पैसों पर भी सिर्फ बैंकों का हक़ होता था लेकिन, अब ये अधिकार छोटे फ्लैट खरीदारों को भी दे दिया गया है।

इस कानून में बदलाव के खिलाफ सुपरटेक, एम्मार, एटीएस, अंसल, वेव समेत करीब 180 बिल्डर कंपनियों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दाखिल की थी। उन्होंने इस याचिका में कहा था कि ये बदलाव रियल एस्टेट सेक्टर को नुकसान पहुंचाएगा।

बिल्डिंग कास्टरकषन का बढ़ता कारोबार, फोटो सोर्स: गूगल

इससे कंस्ट्रक्शन के क्षेत्र में काम करने वाली कंपनियों का काम कर पाना मुश्किल हो जाएगा लेकिन, जस्टिस रोहिंटन नरीमन की अध्यक्षता वाली बेंच ने उनकी दलीलों को ठुकरा दिया। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा है कि छोटे फ्लैट ख़रीदारों के हितों की रक्षा के लिए कानून में किया गया बदलाव बिल्कुल सही है।

ऐसा नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस फैसले में बदलाव सिर्फ छोटे फ्लैट खरीदारों को ध्यान में रखते हुए किया है। सूप्रीम कोर्ट ने इस बात का ख्याल भी रखा है कि इस बदलाव से किसी बिल्डर कंपनी के साथ ज़ात्ती न हो।
अब इस बात का ख्याल रखने की ज़िम्मेदारी कोर्ट ने एनसीएलटी को दी है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि एनसीएलटी को इस बात का ख्याल रखना होगा कि वो सिर्फ वास्तविक और सही फ्लैट ख़रीदारों की याचिका पर ही ध्यान दें। किसी भी अर्ज़ी पर कार्यवाई से पहले इस बात का ध्यान दिया जाये कि अर्ज़ी डालने वाला वाकई में पीड़ित है और अर्ज़ी के पीछे सिर्फ किसी कंपनी को परेशान करने का मकसद तो नहीं है। इसके अलावा मकान ख़रीदारों द्वारा दाखिल किसी भी याचिका को स्वीकार करने से पहले बिल्डर कंपनी को भी अपनी सफाई पेश करने का मौक दिया जायेगा।

इस बदलाव के पहले मकान खरीदने वालों को अगर बिल्डर कंपनी के खिलाफ शिकायत करनी हो तो वो द रियल एस्टेट (रेग्युलेशन एंड डेवलपमेंट) एक्ट 2016 (आरईआरए) के तहत अपनी शिकायत दर्ज करा सकते थे। बिल्डर कंपनियों ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी बात रखते हुए आरईआरए का ज़िक्र किया और कहा था कि शुरू में आईबीसी (इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड 2016) के तहत एनसीएलटी में कंपनियों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने का अधिकार सिर्फ बैंक के पास था। कंपनियों ने कहा कि ये बात बिल्कुल सही थी क्योंकि, बैंक बिल्डरों को करोड़ों का कर्ज़ देता है।

इस दलील को ठुकराते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जवाब में कहा कि आरईआरए और आईबीसी की प्रक्रिया अलग-अलग है और छोटे मकान ख़रीदारों को दोनों ही इस्तेमाल करने का अधिकार है। यह कह कर सुप्रीम कोर्ट ने कानून में बदलाव करके फैसला मकान ख़रीदारों के हित में सुनाया।

जिस तरह से बढ़ती आबादी और तेज़ रफ्तार से बसने वाले शहरों में बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन हो रहा है उसमें आम लोगों के लिए बढ़ती सहूलियतों के साथ ठगे जाने का खतरा भी बढ़ता है। अब ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से आम मकान ख़रीदारों के लिए अपने पैसों की सुरक्षा आसान हो जाएगी। अब कम से कम फ्लैट बुक कराने वाले ख़रीदारों को इस बात का आश्वासन तो रहेगा कि अगर बिल्डर कंपनी ने कोई फ़्रॉड भी किया तो उनके पैसे तो नहीं डूबेंगे।