हमारी पिछली सीरीज़ में आपने पढ़ा कि ग्रामीण महिलाएं शादी से पहले अपनी शारीरिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए क्या कुछ करती हैं और शादी के बाद शारीरिक ज़रूरते पूरा न होने पर क्या कदम उठाती हैं.

इस सीरीज़ के तीसरे पार्ट में हम बात करेगें कि ग्रामीण महिलाओं की सेक्स को लेकर समझ कैसी है और अपने जीवन में वो सेक्स को कैसे देखती हैं?

जेंडर और एजुकेशन संस्था ‘निरंतर’ से जुड़ी अर्चना द्विवेदी कहती हैं कि – ग्रामीण इलाकों में लोग ये बात अच्छी तरह से समझते हैं कि सेक्स एक बेसिक ज़रूरत है. फिर वो चाहे उन्हें जहां से भी मिल रहा हो. कोई भी इसे उतनी बड़ी बात नहीं बनाता. कई ग्रामीण इलाकों में महिलाओं का जीजा, देवर या ससुर के साथ संबंध होना आम है. ऐसे रिश्ते ज़बरदस्ती भी बनाए जाते हैं और आपसी सहमति से भी.

इस संस्था ने 2005-2006 में भारत के उत्तरी इलाको में तीन साल तक एक वर्कशॉप कराया था जिसमें महिलाओं से उनकी सेक्शुअलिटी के बारे में सवाल-जवाब किए गए थे.

इस वर्कशॉप में जब महिलाओं से उनके सेक्स एक्ट्स के बारे में पूछा गया तो लगभग 64 एक्ट्स की लिस्ट सामने आई जिसमें कई तरह के सेक्स एक्ट शामिल थे. जिसमें बालों के साथ खेलने से लेकर, फिस्टिंग जैसी चीजों तक ज़िक्र था.

प्रतीकात्मक तस्वीर. फोटो सोर्स- गूगल

इस वर्कशॉप में एक और बात सामने आई कि ग्रामीण महिलाएं शहरी महिलाओं की अपेक्षा सेक्स पर ज़्यादा खुलकर बात कर पाती हैं. फिर चाहे वो विभिन्न धर्म, जाति या वर्ग में बंटी हुई हों. लेकिन हर वर्ग की ग्रामीण महिलाएं इस पर अपना मत रखती हैं.
इसकी दूसरी वर्कशॉप में एक महिला का कहना था कि –

“अगर मुझे 4 रोटियों की भूख है और मेरे घर में 3 ही रोटियां हैं तो चौथी रोटी के लिए मुझे पड़ोसी के ही घर जाना पड़ेगा न”

इसके अलावा एक और महिला कहती है –

“पर्दे में ही तो जर्दा है”

हम इन महिलाओं के निजी विचारों पर किसी भी तरह की सहमति या असहमति नहीं व्यक्त कर रहे हैं. हम बस बता रहे हैं कि गांव की महिलाएं सेक्स के प्रति अपने विचारों को लेकर किस तरह और क्या बातें करती हैं.

कोकरूड गांव में 36 साल की बबीता को गांव की महिलाएं बहुत डेयरिंग कहती हैं. बबीता पूरे परिवार के साथ रहती है. उसका उससे ग्यारह साल बड़ा पति शादी के एक महीने बाद ही काम के सिलसिले में मुंबई चला गया. वो साल में दो बार 4-5 दिनों के लिए घर आया करता था. जिस दौरान बबीता का पति मुंबई में था उसी दौरान बबीता के भतीजे ने उसके साथ ज़बरदस्ती करने की कोशिश की जो कि उसी बबीता की उम्र का ही था. पहली बात बबीता ने उसका विरोध किया लेकिन जब उसके भतीजे ने फिर से ऐसा किया तो उसने विरोध नहीं किया. खुद को फ्री छोड़ दिया और उसे करने दिया जो वो करना चाहता था. फिर वो बबीता भी उसके साथ सेक्स एंजॉय करने लगी.

बबीता का भतीजा सेक्स करते समय नई चीज़े ट्राई करता था, नई चीज़े जो बबीता को उसके पति के साथ अंसभव लगती थी.

प्रतीकात्मक तस्वीर. फोटो सोर्स-गूगस

बबीता बताती है कि-

“मेरा पति मुझे ज़बरदस्ती गंदी-गंदी फिल्में दिखाता था और मुंह से गंदी-गंदी चीज़े करने पर मजबूर करता था. मुझे वो एकदम जानवर लगता था.”

बबीता का पति अब नहीं रहा, वो अभी भी अपने ससुराल वालों के साथ रहती है. उसके ससुराल वाले बबीता और उसके भतीजे के रिश्ते के बारे में जानते हैं. बबीता का भतीजा भी अब शादी-शुदा है.

सांगली के एक एनजीओ में काम करने वाली संगीता आनंदा भींगरदेव ने इस बारे में कहा-

“ऐसी स्थितियों में घरवाले भी यही सोचते हैं कि घर की महिलाएं घर के ही किसी पुरूष के साथ संबंध बना ले तो बेहतर है, घर की बाक घर में रहेगी और अगर कोई बच्चा भी होता है तो उसमें भी घर का ही खून होगा.”

गांवों में रोज़गार के लिए पुरूष पलायन कर शहरों में आ जाते हैं. ऐसे में महिलाओं के कंधों पर घर के काम-काज और परिवार दोनों को संभालने का बोझ आ जाता है. जब महिलाओं के पति शहरों में होते हैं तो वो घर में विरह की पीड़ा में तड़पती हैं. ये हमारे सिनेमा भी दिखाया गया है और लोकगीतों में भी.

“पिया बिन आवे नाही नींदिया हो रामा, चैतरे महीनमा
पिया परदेस गेला. सुधि बुधि हरि लेला”

भोजपुरी गीत की ये लाईने उन महिलाओं के दर्द को बखूबी बयान करती हैं जिनके पति काम के चक्कर में शहरों की तरफ पलायन कर लेते हैं और उनका जीवन विरह से भर जाता है.

ऐसी स्थितियों में अपने अकेलेपन को दूर करने क लिए ज़्यादातर महिलाएं अपने देवर के साथ संबंध बना लेती हैं. महिलाएं देवर को इसलिए चुनती हैं क्योंकि देवरो के साथ उनका रिश्ता थोड़ा सहज होता है और कई ऐसे गीत भी हैं जिनमें इस तरह के रिश्तों को दिखाया भी जाता है.

रिसर्च में पाया गया है कि ग्रामीण जीवन में सेक्शुअलिटी को लेकर कुछ तरह की आज़ादी होती है.
वडोदरा की एक एक्टीविस्ट फेमिनिस्ट अर्चना शर्मा बताती है कि एक गांव में उन्होने दो महिलाओं को एक साथ रहते हुए पाया. गांव वाले उन महिलाओं को मियां-बीवी की जोड़ी कहा करते थे.
अर्चना कहती हैं-

“उनका इस तरह साथ रहना चुप्पी के साथ प्यार को एक्सप्रेस करने का तरीका है. मैं ये नहीं कहूंगी कि गांव वालों के इस बात की खबर नहीं है कि असल में इनके बीच हो क्या रहा है, लेकिन फिर भी समाज को नाराज़ किए बिना ये दोनें साथ रह रही हैं.”

अगर शहर में इस तरह की महिलाएं एक साथ रहती हैं तो उन्हें लेस्बियन कहा जाता है लेकिन इस तरह के गांवों में ये पक्की सहलियों के नाम से जानी जाती हैं.

ऐसा नहीं है कि हर गांव में महिलाओं के लिए ऐसे कदम उठाना आसान होता है. कई बार ऐसा होता है जब गांव वालों को महिलाओं की इन गतिविधियों का पता चलता है तो उन्हे काफी सख्त सज़ा दी जाती है.

सांगली जिले के कोकरुड गांव में कुछ महिलाएं हाल ही में हुई एक घटना के बारे में बात कर रही थी. ये सात महीने पहले की थी जो इस्लामापुर में हुई थी. एक विधवा औरत का गांव से हुक्का-पानी बंद कर दिया था और गांव से बाहर निकाल दिया था.

प्रतीकात्मक तस्वीर. फोटो सोर्स- गूगल

कोकरुड गांव मे रहने वाला टेलर युसुफ बताता है कि- उसने जो किया था वो उसके घर वालों को मंज़ूर नहीं था खासकर घर के मर्दो को.

इस महिला में पति का निधन सालों पहले हो गया था. जब इसका पेट थोड़ा बाहर निकलने लगा तो लोगों ने सवाल पूछने शुरू किए इसने लोगों को बताया कि इसके पेट में गांठ है जिसके वजह ये हो रहा है. लेकिन फिर सवालों से बचवने के लिए इसने गर से बाहर निकलना बंद कर दिया. बात को दबाए रखने के लिए उसने अपने बच्चे को जन्म दिया और किसी अनाथालय में छोड़ आई. लेकिन इसके बावजूद भी गांव वालों को इस बात का पता चल गया और जब ये बात महिला के देवर तक पहुंची तो वो मामले को पंचायत में ले गया.

पंचायत ने उस पर 20,000 रूपए भरने का जुर्माना लगाया, देवर ने पंचायत से कहा कि वो इस औरत को इस गांव से बाहर निकलवाना चाहता है तो पंचायत ने इस महिला को गांव निकाला दे दिया. अब ये महिला गांव के बाहर किन्ही रिश्तेदारों के साथ रहती है.

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