बॉलीवुड और बॉलीवुड गाने भारतीय समाज में एक बहुत बड़ी जगह रखते हैं, चाहे वो कोई भी धर्म हो, भारत का कोई भी हिस्सा हो सभी कहीं न कहीं सिनेमा से जुड़े हुए हैं। सबके अपने-अपने प्रिय अभिनेता हैं और उन अभिनेताओं के नाम पर सिनेमा हिट हो जाता है। हालांकि, राजनीति में भी ऐसे ही कुछ अभिनेता हैं जिनके नाम पर पार्टियां सरकार बना लेती हैं, लेकिन उनकी बात फिर कभी।

तो हम आज बात कर रहे हैं बॉलीवुड और बॉलीवुड के गानों की। हमारे यहाँ सिनेमा में गाने उतने ही ज़रूरी माने जाते हैं जितना समोसे में आलू होता है, मतलब बिना गाने के सिनेमा नहीं हो सकता, कहानी चाहे जितनी अच्छी हो।

लेकिन कभी-कभी हमारे ऊपर दीवानगी इस कदर हावी हो जाती है कि हम इतना ध्यान भी नहीं देते की झन्नाटेदार म्यूजिक के साथ हमारे सामने जो परोसा जा रहा है, वो कितना घटिया है। वही बॉलीवुड जो नारी सशक्तिकरण जैसे विषयों पर बात करता है, वो पैसा कमाने के वक़्त अपनी सारी संवेदनशीलता चखना बना के खा जाता है और नाचने लगता है, साथ ही हम भी नाचने लगते हैं उन्हीं की धुन में।

बचपन से एक गीत सुनते आ रहे हैं, ‘कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है’। इस गीत को स्कूल के वक़्त हम सबने कहीं न कहीं गुनगुनाया ज़रूर होगा। हो सकता है अपने प्रेमी/प्रेमिका को डेडिकेट करके भी आपने इसे गाया हो। इसी गीत में आगे कुछ पंक्तियाँ कहती हैं-

“कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है

के ये बदन ये निगाहें मेरी अमानत हैं”

फोटो सोर्स-गूगल

हम जब ये सुनते हैं तो दिमाग तुरंत प्रेम की इंतेहां पर पहुँचकर अठखेलियाँ खाने लगते हैं कि भाई ये है असली रोमैन्स। आदमी कह रहा है कि,

जानेमन मैं तुम्हारे प्रेम में इस क़दर बावला हो गया हूँ कि तुम मुझे मेरी अमानत-सी लगने लगी हो और तो और वो डीपली जाकर बता भी रहा है कि तुम्हारा बदन और निगाहें मेरी अमानत हैं।

जिस भी शख़्स ने ये गीत लिखा उसने तो लिख दिया लेकिन, आप तो ऑडियन्स हैं। आप तो कहते हैं कि किसी महिला को ऑब्जेक्टीफ़ाई करना बहुत गलत है, यहाँ क्या हो रहा है? लेकिन नहीं, आप गिटार लेकर हर वैलेंटाइन यही गाना गाएँगे।

खैर छोड़िए, ये तो पुराने वक़्त की बात हो गयी। इस गाने पर मुझे इतना आश्चर्य इसलिए नहीं है क्योंकि मर्द उस वक़्त तक तो औरतों को अपनी जागीर ही मानते थे। ये घटिया मानसिकता इस तरह अपने चरम पर थी कि लोगों को स्पेस ही नहीं मिलता था सोचने का।

अब थोड़ा रिसेंट घटियापने की ओर आते हैं। पिछले ही कुछ सालों में एक बहुत हिट गाना आया था जिसमें शाहिद कपूर गली में नाच रहे होते हैं और अभिनेत्री को एड्रैस करते हुए एक गीत गा रहे होते हैं, जिसके बोल होते हैं-

बीड़ी पीके नुक्कड़ पे वेट तेरा किया रे

खाली-पीली अट्ठारह कप चाय भी तो पिया रे

राज बेटा बनके मैंने जब शराफत दिखाई

तूने बोला हट मवाली भाव नहीं दिया रे

ABCD पढ़ ली बहुत, ठंडी आहें भर ली बहुत

अच्छी बात कर ली बहुत, अब करूंगा तेरे साथ

गंदी बात, गंदी गंदी गंदी बात”

फोटो सोर्स – गूगल

ये गाना लुच्चई के सारी हदों को लांघ गया। यहाँ आशिक़ महबूबा से कह रहा है कि देखो लड़की, ‘मैंने तुम्हारा पीछा किया, तुम्हारी गली के सामने घंटों बैठा तुम्हारा इंतज़ार करता रहा। मैंने तुम्हें बहुत शराफ़त दिखाई लेकिन, अब बस! अब मैं तुम्हारे साथ गंदी बात करूँगा। यहाँ आप ‘गंदी बात’ को छेड़-छाड़, बलात्कार, एसिड अटैक, अपहरण, क़त्ल और ऐसे बहुत से गुनाह पढ़ सकते हैं।

आप सोचिए, सिनेमा में एक इस कदर का घटिया गीत है और इस पर सेंसर बोर्ड को कोई आपत्ति नहीं हुई। ये वही सेंसर बोर्ड है जो करनी सेना जैसे कट्टर संगठन द्वारा फैलाई हुए भसड़ से प्रभावित होकर ‘पद्मावती’ फिल्म का नाम बदलकर ‘पद्मावत’ रखवा देता है। क्या सेंसर बोर्ड सिर्फ इसी बात का ध्यान देने के लिए है कि धार्मिक लोगों और फलाना जाति या संगठन की फूल जैसी नाज़ुक भावनाएं न आहत हो जाये? क्या सामाजिक मुद्दे कोई मायने नहीं रखते?

पुराने गानों को रीमेक करने यानी फिर से थोड़ा धुन बदलकर, थोड़ी लिरिक्स बदलकर निकालने का नया ट्रेंड पिछले कुछ सालों से चलता आ रहा है। एक गाना है तू चीज़ बड़ी है मस्त मस्त”। ये भी उन गानों में से है जो हम बचपन से सुनते आ रहे हैं, यहाँ तो ज़रा भी लिहाज नहीं बख़्शा गया। यहाँ सीधे औरत को कहा गया है कि वो एक मस्त चीज़ है।

फोटो सोर्स – गूगल

ये तो कुछ ही गाने हैं जिनका ज़िक्र मैंने यहाँ किया है, बॉलीवुड में गानों की एक श्रेणी है ‘आइटम नंबर’। जो एक दशक से ज़्यादा समय से बहुत पसंद की जा रही है। आइटम नंबर गाने सिर्फ औरत को एक सामान (वस्तु) मान कर ही चलते हैं, यानी औरत को उसकी देह से आगे कभी देखा ही नहीं गया।

भारत एक ऐसा देश है जहां समाज का एक बड़ा हिस्सा पूरी श्रद्धा के साथ बॉलीवुड के नक़्शे-कदम पर चलने की कोशिश करता है। हर वो चीज़ जो किसी फिल्म का हीरो करता है, वो लोग करना चाहते हैं।

आप कहेंगे कि ये तो अभिव्यक्ति की आज़ादी की बात है, जिसका मन जो करे वो कर सकता है। जी हाँ, आप बिलकुल सही कह रहे हैं लेकिन अभिव्यक्ति की आज़ादी के साथ-साथ सामाजिक ज़िम्मेदारी भी कोई चीज़ होती है। आप अगर बस इसलिए ‘गंदी बात’ जैसे गीत लिख, सुन, गा और उन पर नाच रहे हैं क्योंकि कानूनी रूप से आप ऐसा कर सकते हैं तो ये सोचने वाली वाल है कि आपकी संवेदनशीलता कहाँ चली गयी है?

मैंने लोगों को मंटो का नाम लेकर ऐसे गीतों का डिफ़ेस करते हुए देखा है। ये वही लोग होते हैं जिन्होनें मंटो के नाम पर केवल रफ्तार का गाना ‘मंटोनियत’ सुना है। मंटो ने अपने ज़्यादातर अफसानों में इन्सानों को नंगा पेश किया है, बलात्कार के बारे में लिखा, तवायफ़ों के बारे में लिखा, कत्ल, चोरी और हर उस चीज़ के बारे में लिखा जो हम रोज़ अपने आस-पास देख सुन रहे होते हैं। लेकिन, मंटो की दलील देने वाले लोगों को ये समझना पड़ेगा कि मंटो ने कभी इस गंदगी को ग्लोरीफ़ाई नहीं किया। मंटो ने अपने पढ़ने वालों के सामने समाज की एक नंगी तस्वीर रख दी और ये समाज पर छोड़ दिया कि वो इसे कहाँ देखना चाहता है।

आइटम नंबर या गंदी बात जैसे गीत पितृसत्ता द्वारा फैलाई गई गंदगी को ग्लोरीफ़ाई करने में कभी पीछे नहीं रहे हैं और जो आवाम ऐसे गीतों पर नाचती है, उसके मन के कोने में भी वही घटिया मानसिकता अभी तक बसी हुई है जो उसके जन्म से उसे सिखाई गयी है। जो मानसिकता कहती है कि मर्द हमेशा से औरत से ऊपर रहा है।

आखिर क्यों बॉलीवुड में कोई ऐसा गीत ढूंढें नहीं मिलता जिसमें मर्दों को ऑब्जेक्टीफाई किया जाता हो? किसी आदमी से कोई अभिनेत्री ये नहीं कह रही होती की “तू चीज़ बड़ी है मस्त मस्त”?

क्योंकि वो बिकेगा नहीं। क्योंकि आप वो सुनना नहीं चाहते। सोचिए कि अच्छी धुन के साथ जो गीत आपको परोसे जा रहे हैं, वो आपके साथ क्या कर रहे हैं?

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