लोगों में हिम्मत कहां से आती है ऐसे देश विरोधी आर्टिकल लिखने के लिए?

कहां पाये जाते हैं ऐसे लोग?

अभी तक गायब क्यों नहीं हुए ऐसे लोग?

सबका जवाब देगा रे तेरा कच्चा चिट्ठा! पर इससे पहले आपको ज़रूरत है कल रिलीज़ हुई म्यूट फिल्म देखने की. नहीं मन है तो मत देखिये, नीचे जो फोटो हम दिखा रहे हैं वही देख लीजिये फिल्म आपको समझ में आ जाएगी.

मोदी जी और अमित शाह प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए, फोटो सोर्स- गूगल

2007 में एक फिल्म आई थी गुरु उसके आखिरी में अभिषेक बच्चन और ऐश्वर्या राय को एक कमिटी के सामने पेश होना था. कल मोदी जी की प्रेस कॉन्फ्रेंस का नज़ारा भी कुछ ऐसा ही था. उस फिल्म में अभिषेक बच्चन से पूछे जाने वाले सवालों के जवाब ऐश्वर्या राय दे रहीं थी. ठीक वैसे ही कल की प्रेस कॉन्फ्रेंस में अमित शाह भी मोदी जी के बदले में बात कर रहे थे.

फिल्म में अंत के दो मिनट में अभिषेक ने अपनी बात रखी थी. पर यहाँ थोड़ा चेंज है मोदी जी ने शुरुआत में ही अपनी बात रख दी.

भूमिका बांधने के चक्कर में हम ट्रैक से आगे निकाल गए हैं, खैर..अभी हम प्रेस वार्तालाप पर बात नहीं करेंगे.

टेलीग्राफ नाम का एक अखबार है जो आज-कल काफी क्रान्ति कर रहा है. पत्रकारिता जगत में कुछ ही ऐसे मीडिया हाउस बचे हैं जो क्रांति करने की कोशिश कर रहे हैं पर टेलीग्राफ वाले इन सब कोशिशों से ऊपर उठ चुके हैं और क्रांति करने के नजदीक पहुँच चुके हैं. पर इनमें भी कुछ कमियाँ हैं जो हम आखिरी में बताएँगे फिलहाल के लिए आज प्रकाशित हुआ इनका संस्करण देखिये.

टेलीग्राफ के पहले पेज का आधा भाग

मुझे तो लगता है मोदी जी ये अखबार नहीं पढ़ते होंगे, अमित शाह तो बिलकुल नहीं पढ़ते होंगे. गलती से अगर पढ़ते भी होंगे तो मन मसोस कर्राह जाते होंगे. अखबार के पहले पन्ने में इन्होंने हेडलाइन में ‘हॉर्न न बजाने वाला साइन’ दिया है. जिन्हें नहीं समझ आया उनको बता दे कि ये एक कटाक्ष है जो उन्होनें मोदी जी पर किया है क्योंकि मोदी जी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर भी पत्रकारों से बात नहीं की. इस साइन के नीचे मोदी जी दूसरे दूसरे पोज़ में बैठे नज़र आ रहे हैं और इसके जस्ट नीचे एक खाली डब्बा छोड़ा हुआ है. डब्बे के आखिरी में छोटा-छोटा लिखा गया है कि यह डब्बा तब भरा जाएगा जब मोदी जी से पूछे गए सवालों का वह खुद जवाब देंगे.

इसके बाद अखबार में आया राहुल गांधी का नंबर. जिनको पता नहीं है बता दें कि उन्होनें भी कल प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी जिसमें खुद राहुल गांधी ने पूछे जाने वाले सवालों के जवाब दिये थे.

टेलीग्राफ में छपा राहुल गांधी का इंटरव्यू

पेज का आखिरी हिस्सा पार्टी के दोहरे मापदंड को दर्शाता है. टेलीग्राफ ने ब्लू रंग से हाईलाइट करते हुए लिखा है कि ‘मैं साध्वी प्रज्ञा को कभी माफ नहीं कर सकता.’  वहीं बीजेपी के पार्टी प्रेसिडेंट अमित शाह ने कहा है कि उन्हें प्रज्ञा ठाकुर को प्रत्याशी चुनकर कोई अफसोस नहीं है.

टेलीग्राफ वाले मोदी जी को घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ते और इसके प्रमाण के लिए आपको इनके अखबारों की पिछले कुछ महीनों की हेडलाइंस पढ़ने की जरूरत है. कल का ही अखबार उठा कर देख लीजिये उदाहरण आपको मिल जाएगा. खैर..

ये तो अच्छी बात है कि पत्रकारिता की जा रही है. पत्रकारिता का काम ही है सरकार से सवाल पूछना, सरकार की नीतियों पर जमीनी हकीकत से चोट करना.

कल के टेलीग्राफ में छपा पहला पेज

टेलीग्राफ भाई यह सब तो ठीक है लेकिन हमारे कुछ सवाल हैं. मोदी और राहुल में तो सभी मीडिया वाले खेल रहें हैं आप उनसे अलग कैसे हैं? जब बंगाल में मोदी जी के समर्थकों को कुछ दिन पहले पीटा गया था तब ऐसी क्रिएटिविटी हमें क्यों नहीं देखने को मिली? ममता दीदी ने जब तानशाही दिखाई तब आपकी क्रिएटिविटी क्यों नहीं दिखी? जब सपा के दिग्गजों ने

एक महिला प्रत्याशी पर ओछी टिप्पणी की उनके अंडरगारमेंट्स का कलर जानने का दावा कर करने वाले नेताओं पर कटाश करने के लिए आपकी टीम कहां थी? वक़्त मिले तो जवाब दे दीजिएगा अच्छा लगेगा!

वैसे फिलहाल के लिए अच्छा काम कर रहे हैं. थोड़ी सी निष्पक्षता वाली बात पर भरोसा करने में टाइम लग रहा है बस. शुक्रिया!

 

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