आज नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की शह की सत्ता में चल रही है। लेकिन वे जिस पार्टी से आते हैं उसका इतिहास पुराना नहीं है लेकिन उसमें मेहनत बहुत महीन है। बीजेपी को बीजेपी बनाया वाजपेयी और आडवाणी की मेहनत ने। लेकिन बीजेपी जिस पार्टी से निकलकर बनी, अटल बिहारी वाजपेयी और आडवाणी जिस पार्टी के बलबूते पर सियासत में आये। बीजेपी से पहले पार्टी हुआ करती थी जनसंघ, जनसंघ की स्थापना की थी श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने।

श्यामाप्रसाद मुखर्जी, फोटो सोर्स: गूगल

श्यामाप्रसाद मुखर्जी, फोटो सोर्स: गूगल

श्यामाप्रसाद मुखर्जी जो अपनी सच्चाई और बेबाकी की जु़र्रत के लिये जाने जाते थे। उनकी यही जु़र्रत और सच्चाई उनकी मौत की वजह भी बनी। श्यमाप्रसाद मुखर्जी का जन्म 6 जुलाई 1901 को कलकत्ता में हुआ था। शुरूआती शिक्षा कलकत्ता में ही पूरी की। फिर उसके बाद बीए किया और फिर लाॅ की पढ़ाई के लिए लंदन चले गए। लाॅ की पढ़ाई पूरी की 1926 में वापस भारत आ गए। श्यामाप्रसाद मुखर्जी पढ़ाई में होशियार थे और उसीका नतीजा था 33 साल की उम्र में ही कलकत्ता यूनिवर्सिटी के कुलपति बन गये। वो सबसे कम उम्र के कुलपति बने।

राजनीति और जनसंघ

जब श्यामाप्रसाद मुखर्जी को लोग सिद्धांतवादी और विचारक मानने लगे। तब अपनी इच्छा से श्यामाप्रसाद मुखर्जी सियासत में आ गये। आजादी के पहले का दौर सियासत का मतलब कांग्रेस था, जो आजादी के कुछ साल तक वैसा ही रहा। 1929 में बंगाल विधानसभा से सांसद बने, 1941 में बंगाल प्रांत के ही वित्त मंत्री बना दिये गये। 1946 के बाद विभाजन की घुट्टी पिला दी गई थी, पूरे देश में सांप्रदायिकता और दंगा का जहर घोल दिया गया था। श्यामाप्रसाद मुखर्जी इस बंटवारे के सख्त खिलाफ थे। वे नहीं चाहते थे कि धर्म की वजह से इस देश के दो टुकड़े हो जाएं।

जब भारत विभाजन हो रहा था तो पंजाब और बंगाल भी पाकिस्तान में जा रहा था। तब श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने इसकी मांग रखी और आधा बंगाल और पंजाब को बचा लिया। बंटवारे की वजह से श्यामाप्रसाद मुखर्जी कांग्रेस से निराश थे। वे मंत्रिमंडल में शामिल नहीं होना चाहते थे। महात्मा गांधी और सरदार वल्लभ भाई पटेल के कहने पर आजाद भारत की पहली कैबिनेट में शामिल हुए। श्यामाप्रसाद मुखर्जी को वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय दिया। मंत्री होने के नाते वे अपना काम ईमानदारी से करते रहे लेकिन कई बड़े नेताओं से उनके मतभेद दिनों-दिन बढ़ते जा रहे थे। तब अपने विचारों की लड़ाई के लिए मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।

श्यामाप्रसाद मुखर्जी, फोटो सोर्स: गूगल

श्यामाप्रसाद मुखर्जी, फोटो सोर्स: गूगल

तब उन्होंने एक पार्टी की स्थापना की जो कांग्रेस को कड़ी टक्कर देने वाली थी, जनसंघ। श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने कुछ साथियों के साथ मिलकर 1951 में जनसंघ की स्थापना की। श्यामाप्रसाद मुखर्जी के सबसे खास साथी थे, दीनदयाल उपाध्याय। श्यामाप्रसाद मुखर्जी कहा करते थे ‘अगर मेरे पास दीनदयाल जैसे तीन साथी होते तो मैं सियासत की दिशा बदल देता’ श्यामाप्रसाद मुखर्जी के खास थे दीनदयाल उपाध्याय और उनके खास थे अटल बिहारी वाजपेयी। जो जल्दी ही श्यामाप्रसाद मुखर्जी के करीबी हो गए और उनके स्टेनोग्राफर बन गये। फिर आता है साल 1953, जब एक यात्रा श्यामाप्रसाद मुखर्जी की आखिरी यात्रा बन जाती है।

आखिरी सफर कश्मीर का

ये वो दौर था जब भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा दे दिया गया था। उस समय सरकार का आदेश था कि बिना सरकार की अनुमति के कोई भी जम्मू-कश्मीर नहीं जा सकता। इस पर श्यामाप्रसाद मुखर्जी को आपत्ति थी। उनका कहना था कि अन्य राज्यों की तरह जम्मू-कश्मीर भी भारत का अभिन्न अंग है। उन्होंने इसका विरोध करने की योजना बनाई। जिसके तहत वे बिना परमिट के जम्मू-कश्मीर जाने वाले थे। इसका मकसद था कि वहां के हालात को जाना जाये।
श्यामाप्रसाद मुखर्जी बिना परमिट के ही 8 मई 1953 को नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से अपने साथियों के साथ पंजाब होते हुये जम्मू-कश्मीर की ओर निकल गये। उनके साथ बलराज मधोक, अटल बिहारी वाजपेयी, टेकचंद, गुरूदत्त वैध और कुछ पत्रकार भी थे। हर स्टेशन पर लोग उनसे मिलने आते सभी उनकी एक झलक पाने के इंतजार में खड़े हुये थे। वे हर जगह रूककर लोेगों से मिलते और धन्यवाद देते।

प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स: गूगल

प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स: गूगल

जालंधर होते हुये वे अमृतसर जा रहे थे तभी एक व्यक्ति उनके पास आया और बताया कि वो डिप्टी कमिश्नर है। वो इस आदेश का इंतजार कर रहा है कि आपको कहां गिरफ्तार किया जाये? लेकिन फिलहाल ऐसा कोई आदेश नहीं आया। पठानकोट में श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने अटल बिहारी वाजपेयी को वापस लौटा दिया और कहा जाओ, सबको बताना मेरे साथ क्या हुआ है। पठानकोट पहुंचने के बाद उसी कमिश्नर ने बताया कि सरकार ने आदेश दिया है कि उनको जम्मू-कश्मीर जाने दिया जाये। सब हैरान थे कि सरकार ने ऐसे कैसे बात मान ली? लेकिन किसी को ये भान नहीं था कि ये सिर्फ एक साजिश है। जिसके तहत श्यामाप्रसाद मुखर्जी को सुप्रीम कोर्ट से बाहर निकालकर जम्मू-कश्मीर में गिरफ्तार किया जाना था। जहां सुप्रीम कोर्ट का कानून लागू नहीं होता।

माधोपर चेक पोस्ट से ब्रिज से श्यामाप्रसाद मुखर्जी बढ़ रहे थे। तब वे सामने देखते हैं कि पुलिस जवानों का पूरा दस्ता उनके सामने खड़ा है। पुलिस अधीक्षक उनके पास आता है और वो आदेश देता है जिसमें लिखा है कि जम्मू-कश्मीर में उनके प्रवेश पर पाबंदी है। इस पर डा. मुखर्जी कहते हैं-

‘‘लेकिन मैं जम्मू जाना चाहता हूं!’’

प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स: गूगल

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इसके बाद उनको सेफ्टी एक्ट में अरेस्ट कर लिया जाता है और शहर से दूर एक घर में नजरबंद कर दिया जाता है। कुछ दिनों बाद जम्मू जवाहर लाल नेहरू आते हैं लेकिन मुखर्जी से मिलने नहीं जाते हैं। 22 जून को उनकी तबियत बिगड़ जाती है और उनको अस्पताल में भर्ती कर दिया जाता है। उनकी उस अस्पताल में हुई मौत का भी एक किस्सा है। उनकी देखभाल के लिये नर्स थी। श्यामाप्रसाद मुखर्जी के निधन के बाद उसने बताया था कि डाॅक्टर ने उसे कहा था कि ये जैसे ही जागें, इनको इंजेक्शन दे दें। वे 23 जून को जैसे ही होश में आये। उनको इंजेक्शन दे दिया गया और इसके बाद वे कभी नहीं उठे। नर्स ने बताया कि आखिरी बार उन्होंने बोला था।

‘‘जल जाता है, हमको जला रहा है।’’