(1)

पिछले दिनों जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी जाना हुआ. छात्रों को सड़कों पर उतरे हुए चौथा दिन था. कैंपस के लगभग सभी गेट्स पर लोग इकट्ठे थे. शाम के 05:00 बजे हम जिस मेट्रो स्टेशन से कैंपस की तरफ बढ़ रहे थे वहाँ रास्ते में जगह-जगह ‘मोदी तेरी तानाशाही, नहीं चलेगी-नहीं चलेगी’ के नारे लग रहे थे. फुटपाथ पर बैठे कई लड़के-लड़कियां प्लकार्ड्स बना रहे थे. हंसी-ठिठोली करते हुए, गूगल, इन्स्टाग्राम, ट्विटर खंगालते हुये विरोध के नारे और हैशटैग्स ढूढ़े जा रहे थे. एक लड़का दूर-दूर बैठे हुए दो गुटों के बीच बार-बार आ-जा रहा था. पता चला लाल रंग का मार्कर शायद एक ही था. वो दोनों के बीच उसकी पहुँच बनाए हुए था. थोड़ी दूर पर कुछ लड़के तिरंगा लिए हुए खड़े थे. उन लड़कों को एक काले कोट वाले बुज़ुर्ग हिदायत दे रहे थे कि-

“कुछ होता है तो कल की तरह तिरंगा छोड़ कर नहीं आना है, कैसे भी करके साथ ले आना है.”

जामिया कैंपस के 4 नंबर गेट से थोड़ा पहले तीन लड़के फुटपाथ किनारे बैठ कर रस्सियों के बंडल खोल-सुलझा रहे थे. दो लड़के दौड़-दौड़ कर खुली और सुलझी हुई रस्सियाँ ले जा रहे थे और सामने से आ रहे लोगों की भीड़ में किसी को दे आते थे. कुछ लंबे-चौड़े लड़के उन रस्सियों से उस भीड़ के चारों तरफ घेरा बना रहे थे. हम कैंपस के गेट नंबर- 4 पर खड़े होकर ये सब देख रहे थे. हमारे देखते-देखते 15-20 लड़कों ने सैकड़ों लोगों की उस भीड़ को रस्सी से घेर कर सड़क के आधे हिस्से तक सीमित कर दिया. भीड़ में से ही कुछ लड़के रस्सी के बाहर आए और भीड़ की वजह से थमे हुए ट्रैफिक को गुजारने में मदद करने लगे.

हमें कैंपस के गेट नंबर- 4 से गेट नंबर- 13 की तरफ जाना था. हम सड़क की दूसरी तरफ हो लिए. वहाँ भी सड़क के आधे हिस्से पर छात्रों और लोगों का हुजूम हाथों में तख्तियाँ और तिरंगे लिए नारे लगा रहा था, विरोध कर रहा था #IndiaAgainstCAA. हमें जल्दी से 13 नंबर गेट पर पहुँचना था. हम भीड़ के बीच से निकलने का रास्ता देख रहे थे. हमारे पास कैमरा और स्टैंड देख कर हमें आवाज़ दी जाती है-

“आप लोग रस्सी के भीतर आ जाइए, यहाँ से जाइए. हम जगह बनवा दे रहे हैं.”

हम रस्सी के भीतर भीड़ के साथ शामिल हुए तो पीछे से आवाज़ दी गई

“इन्हें जगह दे दो, जाने दो. ये प्रोटेस्ट में नहीं हैं, जर्नलिस्ट्स हैं. काम करने दो इन्हें अपना.”

इतना सुनते ही हमें आगे बढ़ने का रास्ता दिया जाने लगा. भीड़ के बीच से गुजरते हुए हर शख़्स अपने आगे वाले शख़्स को हमें रास्ता देने के लिए कह रहा था. रस्सी के बाहर वाले लड़के सड़क से गुजर रही गाड़ियों के आस-पास दिखने वाले हर शख़्स को रस्सी के घेरे के अंदर से जाने के लिए कह रहे थे.

दूसरी तरफ फुटपाथ किनारे जगह-जगह स्टुडेंट्स और सिखों का समूह मौजूद था. किसी के पास पानी की बोतलें थीं, किसी के पास केतली में चाय, कई जगहों पर समोसे बांटे जा रहे थे. ये सब उनके लिए था जो सुबह-दोपहर से प्रोटेस्ट में हिस्सा लेने आये थे और जिन्हें शायद अभी देर रात तक सर्दी में सड़कों पर ही रह कर विरोध करना था. हम गेट नंबर 13 तक पहुँच चुके थे. हमें एक्टर ज़ीशान अय्युब से मिलना था वो वहीं गेट के बाहर इंतज़ार करते हुए मिल गए.

पर इन सबके बीच दो बातें हुई.

हम जिस रास्ते से आ रहे थे वहाँ सड़कों पर नारे लिखे गए थे. ‘Modi Media Go Back.’ हम जर्नलिस्ट्स हैं ये जानते हुए हमें बड़ी सहजता और सुरक्षा के साथ हमारा काम करने दिया गया. रास्ते में हमें क़रीब 6 लोग मिले होंगे जो हमसे हाथ मिला कर शुक्रिया कह रहे थे.

“शुक्रिया, आप हमारी बात आगे लेकर जा रहे हैं. Please, just show the truth.”

ज़ीशान से बातचीत के दौरान मैंने उनसे जब इन बातों का ज़िक्र किया तो उन्होंने कहा कि-

“स्टुडेंट्स सबसे इम्पॉर्टेन्ट होते हैं, because they are ready to learn.”

इन छात्रों ने पहले दिन की गलती से सीख लेकर ये सब इंतज़ाम किया था. उन्हें समझ आया कि हम प्रोटेस्ट कर रहे हैं, ये अधिकार है हम सबका पर, अपने अधिकार का इस्तेमाल करने के दौरान हम बाकी लोगों के लिए परेशानी का कारण नहीं बन सकते है; और न ही अपने विरोध में दूसरों को जबरिया शामिल कर सकते हैं.

हमारे सामने कम से कम 500-1000 लोगों की भीड़ रही होगी. इस भीड़ में हिंदू, मुस्लिम, सिख, पारसी, जैन, ईसाई, बौद्ध नहीं थे. और अगर थे भी तो उनके बीच उनका नाम या धर्म उनकी पहचान नहीं थी. ये हिन्दुस्तान की भीड़ थी.  इस भीड़ में शामिल लोगों की आवाज़ अलग-अलग नहीं थी. ये सब एक साथ मिल कर एक ही आवाज़ में एक ही बात बोल रहे थे. जिसका एक सार ये भी था कि-

‘भारत एक सेक्युलर देश है’

फुटपाथ किनारे बैठ कर प्लकार्ड्स बनाते हुए लोगों के बीच पहनावे और भाषा को लेकर भेद नहीं था. नारों के बीच India लिखते हुए अक्षर करीने से संजाए जा रहे थे. पेन और मार्कर पकड़े हुए जब कलाईयाँ घूमती थी तो चेहरे पर संतोष और भिंचे हुए होंठों पर हल्की-सी मुस्कान तैर जाती थी. विरोध के नारों को लिखते हुए भी ज़ोर इस बात पर ज्यादा था कि ‘इंडिया’ सही और सुंदर दिखना चाहिए. ये भीड़ इंडिया को दुनिया के सामने सही और सुंदर दिखाने के लिए इकट्ठी हुई थी. इस भीड़ की मंशा सड़कों पर उतर कर पत्थरबाजी या आगजनी करने की नहीं थी और न ही पुलिस से वाटर कैनन की बौछार और लाठी-गोली से मार खाने की थी.

इसे भीड़ नहीं कहा जाना चाहिए. भीड़ एक बुरा शब्द है. भीड़ के पास कोई तंत्र नहीं होता इसलिए भीड़तंत्र का चेहरा भयानक होता है. भीड़ अक्सर अराजक होती है. ये अराजक नहीं थे. ये जागरूक, समझदार, व्यवस्थित और ज़िंदा लोगों का समूह था. जिसने विरोध के लिए सिर्फ नारों का ही इस्तेमाल किया. इन समूहों में लगाए जाने वाले नारे किसी कानून या सरकार का विरोध करने से ज्यादा ये बात साबित करने के लिए लगाए जा रहे थे कि-

‘भारत एक धर्म-निरपेक्ष देश है और इसे आगे भी धर्म-निरपेक्ष ही रहना चाहिए.’

(2)

17 दिसंबर को दिल्ली के सीलमपुर इलाके में CAA के विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसा हुई. क़रीब तीन घंटे तक हुए पथराव और फायरिंग में दोनों तरफ के लोग घायल हुए. हम अगले दिन हालात जानने और लोगों से बातचीत करने के लिए सीलमपुर पहुंचे. घटना वाली जगह पर पहुँचते ही सड़क किनारे पुलिस की टुकड़ियाँ और रैपिड एक्शन फ़ोर्स की वैन तैनात मिली. थोड़ी ही दूर पर दो डीटीसी बसों में CRPF और मिलिट्री के सिपाही बैठे मिले. कुछ सिपाही बस से थोड़ी दूर पर तैनात थे, आपस में बातचीत कर रहे थे. हमने सामने से उनकी एक फोटो खींच ली. तभी एक सिपाही ने परेशान होते हुए इशारे से फोटो खींचने पर आपत्ति जताई. हम उस सिपाही के नज़दीक गए और उससे परेशानी और आपत्ति की वजह पूछी.

सिपाही ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया-

“क्या सर, बैठे हुए फोटो खींच ली. अब आप लोग इसको कहीं छाप दोगे तो लोग कहेंगे कि हम लोग अपना काम नहीं कर रहे. आराम से बैठे हैं.”

हमें उस सिपाही के कहने के ढंग और बात पर हंसी आ गई. हमने उनसे कहा कि ठीक है आप परेशान मत होइए हम ये तस्वीर कहीं नहीं पोस्ट करेंगे.

सिपाही को भी हंसी आ गई तो उसने कहा-

“नहीं, ऐसा नहीं है. आप छाप सकते हैं, वरना कल को फिर लोग ये भी कहेंगे कि अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं है. वैसे आपको बता दे कि 200 जवानों के बीच सिर्फ दो ही कुर्सियां हैं. जिस पर ड्यूटी करते हुए हम लोग बारी-बारी से 10-10 मिनट के लिए बैठ जाते हैं. पैरों को थोड़ा-सा आराम देने के लिए. आपने जब फोटो क्लिक की उसके 5 मिनट पहले ही बैठा था मैं. अब उठा जा रहा हूँ. अब इनमें से किसी और को जिसको जरुरत होगी वो बैठ जाएगा पर, आप लोगों के जाने के बाद.”

मुझे उस सिपाही की आखिरी की बात सुन कर अच्छा नहीं लगा. मैं अपने कैमरापर्सन के साथ तुरंत वहां से आगे निकल गया. वहां से हम एक गली में दाखिल हुए. एक स्थानीय व्यापारी से बात करने के लिए आगे बढ़े तो उसने कैमरा देखते ही कहा-

“हम लोग तो कल जैसे ही तोड़फोड़ शुरू हुई तभी दुकान बंद करके भाग गए थे. हमें मालूम ही नहीं कि उसके बाद क्या हुआ.”

बिना सवाल किए ही जवाब तैयार किए बैठे ऐसे कई लोग मिले हमें. कैमरे पर दिखने से बचते हुए लोग, जिन्हें उनकी ग़ैर-मौजूदगी में उस जगह पर क्या हुआ इसकी कोई जानकारी नहीं थी. ऐसे ही कई गलियाँ, घर और दुकान से एक जैसी बात सुनते हुए हम एक चाय की छोटी-सी दुकान पर पहुंचे. चाय का ऑर्डर देकर हम बैठे किसी अगली गली में जाने के बारे में सोच रहे थे. हमारे अलावा दुकान में 5 लोग और बैठे थे. जिनमें से दो लोग वकील थे. एक आदमी किसी ट्रैवल एजेंसी के लिए बस के टिकट काट रहा था. दो बुज़ुर्ग लोग हमारे बगल में बैठे आपस में कुछ बातें कर रहे थे. ये सभी लोग एक-दूसरे को पहचानते थे. शायद ये उनकी रोज साथ बैठने की जगह थी. हमने कैमरे को बैग में बंद कर रखा था. हमने बगल में बैठे बुज़ुर्ग से बातचीत करनी शुरू की. उनसे जानने की कोशिश की कल (17 दिसंबर को) यहाँ पर क्या-क्या हुआ था?

जवाब में उन्होंने कहा-

“वही जो 92 में हुआ था. सरकार ने बाँट दिया, लोग बंट गए. बस अभी मंदिर-मस्जिद नहीं टूटे है. वो भी टूटने लगेंगे.”

हमने बुज़ुर्ग से ऑफ कैमरा बातें शुरू की.

मैं– आप कब से हैं यहाँ?

बुज़ुर्ग– हम तो बेटा 52 से हैं यहाँ. यहीं पैदा हुए, यहीं पले-बढ़े. यहीं मर जाएंगे.

मैं– कल जब यहाँ पर विरोध के दौरान पत्थरबाजी हुई तब आपने देखा वो माहौल?

बुज़ुर्ग– हाँ, कहाँ जाएंगे? यहीं थे, सब देख रहे थे. यहाँ से आराम से रैली निकल रही थी. मेन रोड तक पहुँचते-पहुँचते दो-चार लोग बवाल करने लगे. कुछ लोगों ने पुलिस वालों पर पत्थर फेंक दिये. वहाँ से पुलिस ने हवाई फायर कर दिया तो लोग डर कर भागने लगे. तभी कहीं से 20-25 लोग आए और पत्थर वगैरह मारते हुए पुलिस वालों को दौड़ाने लगे. बस तभी से माहौल ज्यादा खराब हो गया. वर्दी में भी तो इंसान होता है न बेटा. ऊपर से वर्दी में गर्मी भी होती है. बस दोनों तरफ की गर्मी में ये सब हो गया.

मैं– वो 20-25 लोग कहाँ के थे?

बुज़ुर्ग – कहाँ के रहे होंगे? यहीं के रहे होंगे, आस-पास के रहे होंगे. अब ऐसे-कैसे बता दे बेटा? भीड़ में कौन किसको पहचानता है? भीड़ छंटती है तो लोग एक-दूसरे को पहचानते हैं.

मैं – आप बहुत अच्छी बातें कर रहे हैं. आप क्या करते हैं?

बुज़ुर्ग– (हँसते हुए) मैं तो आवारा हूँ बेटा. बच्चे और पोते काम करते हैं. मैं उनकी कमाई पर टिका हूँ. बस यहीं इसी दुकान पर बैठा रहता हूँ. ये मेरा पोता है जो चाय की दुकान चला रहा है. मैं तो बस आवारागर्दी करता रहता हूँ.

मैं– आपको पता है ये पूरे देश में किस चीज का विरोध हो रहा है?

बुज़ुर्ग– हाँ, वो सरकार ने CAB और NRC लागू कर दिया है न. उसी में सबको ख़तरा लग रहा है बंटने का. उसी के लिए लड़ रहे हैं सब.

मैं– अच्छा, पर NRC तो अभी पूरे देश में लागू नहीं हुआ है और CAB अब CAA हो गया है. पहले बिल था इसलिए CAB बोलते थे अब एक्ट हो गया है.

बुज़ुर्ग– हाँ.. न्यूज देखता हूँ मैं बेटा. पर अभी यहाँ ज़्यादातर लोग CAB ही जानते हैं.

मैं– कौन-सा न्यूज चैनल देखते हैं?

बुज़ुर्ग– हिन्दी वाले सारे देख लेते हैं.

मैं– आप यहाँ 1952 से हैं, इसके पहले कब ऐसा माहौल देखा था?

बुज़ुर्ग– कई बार देखा है बेटा. 92 वाला तो यहीं से शुरू हुआ था. वो वहाँ से उस बाउंड्री के पीछे वाली मस्जिद के पास से शुरू हुआ था. (उन्होंने सड़क के उस पार एक जगह इशारा करते हुए बताया.)

मैं– आपको इस CAA और NRC को लेकर डर लग रहा है?

बुज़ुर्ग– सबको लग रहा है बेटा और NRC से तो सबको डर लगना चाहिए. बात सिर्फ हिन्दू-मुस्लिम की नहीं है, बात है बंट जाने की. मैं यहीं पैदा हुआ हूँ, 60 साल से यहीं रह रहा हूँ, इसी दिल्ली में. अब मुझसे मेरे हिन्दुस्तानी होने का सबूत मांगेगी सरकार. मैं क्यों दूंगा सबूत? मैं इसी जगह पर पैदा हुआ, यहीं पला-बढ़ा, सारी ज़िंदगी गुज़ार दी यहाँ. अब मैं साबित करूँ कि मैं इसी देश का हूँ. क्यों? कैसे करूँ? कागज दिखा कर ठप्पा लगवाऊँ कि मैं हिन्दुस्तानी हूँ और कागज न दिखा पाऊँ तो देश से बाहर निकल जाऊँ? कहाँ जाऊँ, क्यों जाऊँ कुछ पता नहीं. किसी सरकार के पास कोई जवाब नहीं है इस बात का. असम में हिन्दू भी तो फंसे हैं उनके लिए कोई देश, कोई घर तय कर पाई है सरकार आज तक?

मैं– पर सरकार तो कह रही हैं कि यहाँ जो मुस्लिम रह रहे हैं उनको कोई खतरा नहीं है, वो यहीं रहेंगे. फिर किस बात से परेशानी है?

बुज़ुर्ग– परेशानी इस बात से हैं बेटा कि इस कानून के हिसाब से सिर्फ मुसलमान ही है जिसको सरकार हिन्दुस्तानी नहीं सिर्फ मुसलमान मान रही है. इस कानून के हिसाब से सिर्फ मुसलमान ही हैं जिनसे देश को खतरा है, सरकार ये बताना चाहती है कि मुसलमान यहाँ बेवजह रह रहे हैं, ये देश सबका है बस मुसलमानों का नहीं है. उनको अगर रहना है तो पाकिस्तान, बांग्लादेश या अफ़ग़ानिस्तान जाकर रहें. भले उन्होंने अपनी सारी ज़िंदगी यही गुज़ार रखी हो. पर बाकी की ज़िंदगी या तो डिटेन्शन कैंप में गुज़ारे या किसी और देश में.

इतने में अजान की आवाज़ गूंजी और वो बुज़ुर्ग जेब से टोपी निकाल कर पहनने लगे. जैसे ही वो नमाज के लिए जाने लगे हमने उनसे वापस लौट कर कैमरे पर कुछ बात करने के लिए मनाने की कोशिश की. जवाब में उन्होंने कैमरे पर बात करने से मना कर दिया. वजह पूछने पर हँसते हुए कहा कि –

“बेटा, मेरी बात से मेरे ही लोग ताल्लुक नहीं रखते. ऐसे में कोई मुझको ये सब बोलते हुए देखेगा तो देश का तो बाद में पर इस इलाके में रहना मुश्किल हो जाएगा.”

बुज़ुर्ग नमाज पढ़ने के लिए चले गए. हम चाय के पैसे देकर आगे बढ़ गए. देर शाम तक कई लोगों से बात की. सबने अपनी-अपनी बात रखी पर कैमरे पर आने से मना कर दिया. कुछ 16-18 साल के लड़के रहे होंगे जो इस बात का इंतज़ार कर रहे थे कि कब हम कैमरा ऑन करेंगे और वो कैमरे के सामने आ जाएंगे. ताकि वो टीवी पर किसी न्यूज चैनल के फ्रेम के भीतर दिख सकें. उन्हे इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि हम किसी टीवी न्यूज चैनल से नहीं है. उन्हें जैसे ही इस बात का पता चला तो कुछ लड़के ‘अरे! यार ये यूट्यूब वाले हैं’ कहते हुए चले गए.

देश भर में कई सीलमपुर हैं जहां घटना के बाद इस समय मुआयना करने जाएंगे तो ऐसे कई पुलिस और आर्मी के सिपाही मिलेंगे जिन्हें बैठे हुए फोटो खिंच जाने का डर होगा. जो 200 लोगों के बीच मौजूद 2 कुर्सी में 10 मिनट के लिए सिर्फ इसलिए नहीं बैठेंगे क्योंकि उनके सामने प्रेस और मीडिया की फौज कैमरे ताने खड़ी है. ऐसे कई गलियाँ होंगी जहां लोग सवाल पूछने से पहले कह देंगे कि जब माहौल बिगड़ा था तब वो वहाँ थे ही नहीं. देश में उन बुज़ुर्ग और इन जवान लड़कों जैसी बहुत बड़ी आबादी है जिसे अपनी बात कैमरे पर कहनी नहीं आती. पर उन्हें पता है कि सरकार ने कुछ गलत कर दिया है जिसका विरोध किया जाना जरूरी है. देश में ऐसे लोगों की बहुत बड़ी आबादी है जिन्हें सरकार के इस कानून से ‘बंट जाने और खुद को साबित करना पड़ेगा’ का डर है. ऐसे करोड़ों लोग हैं जिन्हें इस कानून के बाद खुद की पहचान साबित होने या न कर पाने के बाद ‘कहाँ जाएंगे’ का डर है. पर ये डर वो सिर्फ ऑफ कैमरा ही ज़ाहिर कर सकते हैं. कैमरे के सामने आने पर उनके डर में इज़ाफ़ा हो जाता हैं.

दूसरी तरफ देश भर में इकट्ठी हुई भीड़ में ऐसे कई 16-18 साल के लड़के मिलेंगे जिन्हें किसी यूट्यूब चैनल के वीडियो में नहीं आना है. वो इकट्ठे हुए हैं टीवी पर दिखने के लिए, इंटरनेट पर वायरल होने के लिए. ऐसे वायरल होना बुरा नहीं है. कम से कम तब तो नहीं जब सरकार और पार्टियां अपने आप को सही साबित करने के लिए गलत चीजें भी वायरल कर रहीं हों.

पर कई चीजें कभी वायरल नहीं होनी चाहिए. फिर चाहे वो पथराव के बीच भीड़ के आगे-आगे भाग कर या दीवार से सट कर जान बचाते हुए पुलिस वालों का वीडियो हो. या फिर लाइब्रेरी में बंद होकर पिटते और आँसू गैस से दम घुटते हुए स्टूडेंट्स का वीडियो. जलती हुई बसें, सड़कों पर फैले पत्थर, माथे से बहते हुए खून से सने लोग और भीड़ में अकेले फंसे पुलिस वाले की तस्वीरों का वायरल होना लोकतंत्र से लेकर समाज तक के लिए बुरा है. एक सभ्य समाज को भीड़तंत्र की नहीं लोकतंत्र की जरूरत होती है.

देश के कोने-कोने में इकट्ठे हुए लोकतंत्र के लोगों का पहला और आखिरी काम ‘Republic of India’ के पहले किसी धर्म का नाम न लगने देने की होनी चाहिए. अब जबकि सरकारों से उम्मीद नहीं रह गई है तब इन्हीं इकट्ठे हुए लोगों की ज़िम्मेदारी है कि संविधान की पहली लाइन ‘हम भारत के लोग’ को बचाए रखना चाहिए ताकि इसे हमेशा अमल में लाकर लोकतंत्र को बचाए रखा जा सके.

-आदित्य नवोदित