जब ज़िंदगी में तकलीफ़ें हों तब, हर इंसान तपती ज़मीन पर खुद को झोंकने निकल पड़ता है। इसके पीछे बस एक ही वजह है ‘पापी पेट’। भारत में देखें तो हर मजदूर की यही कहानी है। आज हम जिस दौर में रह रहें हैं वहाँ समानता की बात करना सामने वाले के काम के हिसाब से तय होता है।

गर्मी की मार हर किसी को पड़ती है। इस चपेट से मध्यम वर्ग और मजदूर वर्ग भी अछूते नहीं रहे। लेकिन जब यही गर्मी 110 डिग्री के पार हो जाए तो इंसान सोचने पर भी मजबूर हो जाता है कि क्या करें? आज हम इन्हीं मजदूरों के बारे में बात करेंगे जो 110 डिग्री से भी ज्यादा गर्मी में काम करते हैं।

Image result for ईंट की भट्टी में करते लोगप्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स: गूगल

110 डिग्री गर्मी को झेलने के लिए मजबूर हैं ये लोग

जब हम अपने आस-पास उन मजदूरों को देखते है जो दिन-भर चिलचिलाती धूप में कम कर रहे होते हैं उस वक्त मन में बहुत सारे सवाल उठने लगते हैं कि, आखिर क्यों ये लोग इतनी धूप में काम करने पर मजबूर हैं? अगर ये चाहें तो किसी भी छोटी-मोटी नौकरी करके अपना गुज़ारा कर ही सकते हैं। लेकिन यहाँ सवाल उठाने से ज़्यादा उनकी समस्याओं को समझना ज़रूरी है। इनमे से हर कोई इतना पढ़ा-लिखा नहीं होगा कि नौकरी कर सके इसलिए उन्हें खेती, ईंटों की भट्टी या फिर राज-मिस्त्री जैसे कामों को करना पड़ता है।

हम सड़कों के किनारे पसीने में लथपथ मजदूरों को देखते हैं। उस वक्त हमें केवल उनके शरीर से निकले पसीने दिखाई देते हैं  लेकिन उस पसीने के पीछे की वजह को शायद हम समझने में नादानी कर देते हैं। दरअसल वो अपने बच्चों को दो वक्त की रोटी खिलाने की जद्दोजहद में लगा हुआ होता है और हम सिर्फ अफ़सोस ज़ाहिर करते हुये निकल जाते हैं। इन मजदूरों को न तो कोई गर्मी सताती है न कोई तकलीफ। अपने परिवार को भूखे न सो जाने के डर से इन्हें हर गर्मी को बर्दाश्त करने आदत पड़ गयी है।

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ईंट की भट्ठों में काम करता मजदूर, फोटो सोर्स: गूगल

ईंट के भट्ठों के बारे में तो हम सब ने सुना ही होगा। आज हम उन्हीं ईंट के भट्ठों में काम करने वाले लोगों की बात करेंगे, जिन्हें हम अक्सर भूल जाया करते हैं या इन्हें हम अपने समाज में कभी गिनती करते ही नहीं है। ज़रा कुछ देर के लिए सोचिए, ये लोग न हों तो ईंटे कैसे बनेगी और अगर ईंटें नहीं बनी तो जिस आलीशान घरों की बात हम करते हैं वो सिर्फ बातों में सिमटकर ही रह जाएँ। अगर ये लोग 124 डिग्री सेल्सियस में रहकर ईंटें न बनाए तो घरों के बनने का सपना अधूरा ही रह जाएगा। यानी ये ईंट मजदूर न हों तो कई दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। लेकिन सबसे ज़्यादा दु:ख की बात ये है कि जिस मात्रा में बिल्डिंगे खड़ी कर रहे हैं वो सिर्फ इसलिए कर कर पा रहे हैं क्योंकि ये मजदूर सड़ी गर्मी में खुद को झोंकते हैं।

बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, भट्ठों में काम करने वाले सभी मजदूर लगभग 110 डिग्री तापमान में काम करते हैं, जहां रबड़ की चप्पलें यूं ही पिघल जाती है इसलिए उन्हें लकड़ी की चप्पल का इस्तेमाल करना पड़ता है। हालत इतनी खराब है कि हाथों पर फफोले पड़ जाते हैं और ना जाने ऐसे कितने ही गर्मी के थपेड़े उन्हें रोज़-रोज़ पड़ते हैं।

प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स: गूगल
प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स: गूगल

ये पूरा विश्लेषण भारत के उन लोगों पर हैं जो 40-50 डिग्री जैसी सड़ी गर्मी में काम करते हैं ताकि अपने परिवार का पेट भर सके। ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ की हाल में आई एक रिपोर्ट के हिसाब से, ‘साल 2030 तक भारत में ऐसी 3.4 करोड़ नौकरियां भी ख़त्म हो जाएंगी।‘

अगर हम आंकड़ें देखें तो देश के हर कोने में लाखों लोग दिख जाएंगे जो, सड़क के किनारे पंक्चर लगा रहे होंगे, पकौड़े बेच रहें होंगे या फिर मजदूरी कर रहे होंगे। वहीं, खेतों में, बिस्किट बनाने वाली फैक्ट्रियों में, लौहे गलाने वाली भट्ठियों में, दमकल विभाग में और ईंट के भट्ठों पर काम करने वाले ऐसे करोड़ों मज़दूर देखने को मिल जाएंगे जो इतने ज़्यादा तापमान में कम कर रहे होंगे।

‘कैथरीन सेगेट’ के नेतृत्व में तैयार की गई इस रिपोर्ट में बताया गया है कि, ‘बढ़ती गर्मी की वजह से दोपहर के घंटों में काम करना और भी मुश्किल हो जाता है, जिससे मज़दूरों के साथ-साथ उन्हें काम देने वालों को भी आर्थिक नुक़सान का सामना करना पड़ता है।

बीबीसी ने एक थर्मामीटर के प्रयोग से रिपोर्ट जारी की जिसमें उन्होने ये बताया कि, ‘इन जगहों में काम करने वाले करोड़ों मज़दूर कितने तापमान पर काम करते हैं और इसका उनकी सेहत पर क्या असर पड़ता है?‘

ऐसी ही एक जगह जाकर बीबीसी ने रामसूरत मजदूर से बातचीत की जहां उन्होने रोंगटे खड़े कर देने वाली बाते बताई, जिसे सुनकर एसी में रहने वाले लोग या फिर जिन्हें पल भर भी गर्मी बर्दाश्त नहीं उनके लिए काफी चौंका देने वाली हो। जब रामसूरत के शरीर पर थर्मामीटर लगाया गया तो उस समय उसके शरीर का तापमान 39 डिग्री सेल्सियस से शुरू हुआ जो 43 डिग्री सेल्सियस तक चला गया।

प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स: गूगल
प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स: गूगल

‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ की रिपोर्ट के अनुसार, ‘किसी इंसान के शरीर का तापमान 39 डिग्री सेल्सियस होना चाहिए। अगर इससे ज़्यादा तापमान होता है तो, किसी भी व्यक्ति की जान जा सकती है ।‘ इन मज़दूरों के बीच कुछ घंटे बिताने के बाद ही ‘बीबीसी संवाददाता’ के रिपोर्टर की आंखों में जलन, उल्टी और सिर दर्द जैसी दिक्कते होनी शुरू हो गयी। साथ ही उस भट्टी में खड़े होकर बात करते-करते उन रिपोर्टर्स की गर्म तापमान की वजह से जूतों के सोल जल गए। अब ऐसे में सवाल ये उठता है कि ऐसी जगह पर दिन भर काम करने वाले मजदूरों के शरीर पर इसका क्या असर पड़ता होगा?

इन सभी आंकड़ों से अगर कुछ सामने निकलकर आया है तो वो हैं इन मजदूरों की दयनीय स्थिति। जिस पर सरकार सिर्फ चुनावी वायदों के बाद इन मजदूरों से वसूले वोट के बाद इनकी तरफ झाँकती भी नहीं हैं। आज भी जब तक कोई सशक्त मीडिया ग्राउंड लेवल पर जाकर इन हालातों को नहीं बताता तब तक तो किसी भी नेता, विधायक के कानो में जूं तक नहीं रेंगती हैं।

हम यहाँ बैठकर सिर्फ बाते करते हैं। लिस्टों में इन मुद्दों पार काम गिनवाने लग जाते हैं लेकिन 2 मिनट के लिए ये नहीं सोचते कि जिस आग में वो मजदूर खुद को रोज़-रोज़ झोंकते हैं उनकी हालत क्या होती होगी? उनका स्वास्थ्य कैसा होता होगा और न जाने ऐसी कितनी समस्याएँ होती होंगी जिन्हें ये लोग दिनचर्या समझकर जीते होंगे।

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