देश के स्वतंत्रता आंदोलन में बिहार के नेताओं और आम लोगों ने आगे बढ़कर हिस्सा लिया। इसका परिणाम यह हुआ कि बंगाल में अपनी जड़ें मजबूती से जमाए बैठी ब्रितानी हूकूमत को देश छोड़कर जाने के लिए मज़बूर होना पड़ा। देश की आजादी की लड़ाई में हिस्सा लेने वाले श्री बाबू एक जांबाज बिहारी नेता थे।

डॉ श्री कृष्ण सिंह को लोग प्यार से ‘श्री बाबू’ कहा करते थे। श्री बाबू का जन्म बिहार के मुंगेर जिला में एक भूमिहार परिवार में हुआ था।

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने श्री बाबू के बारे में कहा-

“उनकी अंगुलियों में कभी कभी अंगूठी भी दिखेगी। उनका रंग गेहूआं है, आकृति सदैव निर्लोम रहती हैं, आंखें चेहरे के अनुपात में कुछ छोटी है और कान भी बड़े नहीं हैं। लेकिन, आकृति पर जो एक मुक्त हंसी की किरण खेलती है, वह बतलाती है कि हृदय के तल में मस्ती और बेफिक्री की मात्रा भरपूर है। श्री बाबू बुद्धि नहीं, भावना के अधीन जीते हैं। उनकी बुद्धि जब कार्य में प्रवेश करती है तब काम की भीड़ में उनका व्यक्तित्व भी डूब जाता है।”

डॉ श्री कृष्ण सिंह। फोटो सोर्स: गूगल

बिहारी शब्दों में कहें तो फकफक उजला कुर्ता और महीन धोती पहनने वाले ‘श्री बाबू’ जितने सरल थे, उससे कहीं ज्यादा शख़्त भी थे। अपने छात्र जीवन में ‘श्री बाबू’ महर्षि अरविंद और तिलक के विचारों से काफी प्रभावित थे। श्री बाबू देश के भविष्य को इन्हीं दो नेताओं की नजर से देखना चाहते थे। यही वजह था कि श्री बाबू एक हाथ में तलवार तो दूसरे हाथ में गीता रखने में विश्वास करते थे।

गरम दल के नेताओं से ज्यादा प्रभावित थे श्री बाबू..

जानकारी के लिए आपको बता दें कि जब जार्ज पंचम का पटना आगमन हुआ और वो शहर का नजारा देखने के लिए नाव पर सवार हो गंगा भ्रमण को निकले थे, तो सारा किनारा लोगों से खचाखच भर गया था। इस दौरान मिंटो होस्टल के छात्र भी भीड़ में जा मिले, किंतु श्री कृष्ण सिंह अपने कमरे से बाहर नहीं निकले थे।

कहा जाता है कि श्री बाबू ब्रितानी बादशाह को छूआछूत जैसा समझते थे। उन्हें लगता था कि कहीं बादशाह के शरीर पर नजर न पड़ जाये। उनके लिए यह पाप जैसा था। इस पाप से बचने के लिए उन्होंने अपनी कोठरी की खिड़कियां भी बंद कर ली। इस उत्कट राष्ट्रवाद के समर्थक होते हुए गांधी जी के प्रभाव में आने के बावजूद श्री बाबू की वाणी में वही जोश और गर्मी थी, जो गर्मपंथी नेताओं में थी। यही वजह था कि उन्होंने कहा था कि स्वराज मांगने की नहीं छीन कर लेने की चीज है।

श्री बाबू समाज के आखिरी आदमी से जुड़ना चाहते थे

जानकारी के लिए आपको बता दें कि जब 1937 के प्रीमियर के पद ग्रहण के पूर्व मुंगेर जिला परिषद से विदाई के समारोह की एक सभा को श्री बाबू ने संबोधित किया था। इस दौरान उन्होंने कहा,

जिस कानून के मुतल्लिक मैं मंत्री बनने जा रहा हूं उस कानून से हमें पर्याप्त अधिकार प्राप्त नहीं है। फिर भी मैं चाहता हूं कि सचिवालय में बैठने वाले बड़े ओहदेदार से लेकर गांव में रहने वाले चौकीदार तक प्रत्येक सरकारी नौकर यह अनुभव करने लग जायें कि वह इसी भूमि की जनता के सेवक हैं।

उनके आखिरी आदमी से जुड़ने के व्यवहार को एक और किस्से से समझा जा सकता है कि जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने असहयोग आंदोलन शुरू किया तो श्री बाबू उसमें कूद पड़े। अपनी वकालत स्थगित कर दी और नये मतवाद का डट कर प्रचार करने लगे। मुंगेर जिले के सुदूर गांवों तक दौरा किया। जिले का शायद ही ऐसा कोई गांव होगा जहां उन्होंने यात्रा नहीं की। उस समय आज की तरह तेज चलने वाली गाड़ी नहीं मिलती थी। पैदल, बैलगाड़ी या ऐसी दूसरी सवारी पर उन्होंने दौरा किया।

समानता के असली पहरेदार…

श्री बाबू उच्च जाति से होने के बावजूद समाजिक समानता में विश्वास रखते थे। उन्होंने ही सबसे पहले झारखंड के बाबा बैद्धनाथ धाम मंदिर में नीचे जाति के लोगों को प्रवेश दिलाने का काम किया। यही नहीं जमींदार परिवार से होने के बावजूद सामंत और जमींदारी प्रथा के समाप्ति के लिए सबसे मजबूती से यदि किसी ने आवाज उठाया तो वो श्री बाबू ही थे। इसका परिणाम यह हुआ था कि उनके अपनों ने ही उन्हें हमेशा के लिए त्याग दिया। इसके बाद श्री बाबू को गांव से बाहर एक छोटी सी झोपड़ी बनाकर रहना पड़ा था।

इन सबके वाबजूद बिहार केशरी और बिहार के पहले मुख्यमंत्री ने कभी भी हार नहीं मानी। आखिरकार अपने एक दशक से अधिक समय के मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान समाजिक समानता के लिए जो फैसले श्री बाबू ने लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा।

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