नागरिकता संशोधन विधेयक (CAB) संसद में पारित होने के बाद राष्ट्रपति की मुहर लगते ही अब ये कानून का रूप ले चुका है. अब इस संशोधित नागरिकता कानून को नोटिफाई करके पूरे देश के राज्यों में लागू किया जाना है. लेकिन, दूसरी तरफ कानून बन जाने के बाद भी देश भर में इस कानून के खिलाफ हो रहे विरोध प्रदर्शनों में कोई कमी नहीं आ रही है. ख़ासकर, भारत के नॉर्थ ईस्ट राज्यों में ये विरोध प्रदर्शन काफी हिंसक और उग्र हो चले हैं. असम और मिजोरम राज्यों में तो हालात अभी भी बेकाबू  हैं.

नागरिकता संशोधन विधेयक (CAB) के खिलाफ पूर्वोत्तर राज्यों में हो रहे हिंसक विरोध प्रदर्शनों की एक तस्वीर, फोटो सोर्स - गूगल

नागरिकता संशोधन विधेयक (CAB) के खिलाफ पूर्वोत्तर राज्यों में हो रहे हिंसक विरोध प्रदर्शनों की एक तस्वीर, फोटो सोर्स – गूगल

परिस्थितियों को काबू में लाने के लिए बड़ी तादात में सेना और अर्धसैनिक बलों की तैनाती की गयी है. संवेदनशील इलाकों में कर्फ़्यू लगाया गया है. मोबाइल इन्टरनेट सेवा पर पाबंदी लगाई गयी है. सेना और प्रशासन जल्द से जल्द बिगड़े हालातों पर काबू पाने के लिए कोशिश कर रहे हैं. नॉर्थ ईस्ट के अलावा भारत के दूसरे राज्यों में भी इस बिल का विरोध हो रहा है, खासकर गैर बीजेपी शासित राज्य जो इस नए नागरिकता कानून का जोरदार विरोध कर रहे हैं.

नागरिकता संशोधन विधेयक (CAB) के खिलाफ हो रहे प्रदर्शनों की एक तस्वीर, फोटो सोर्स - गूगल

नागरिकता संशोधन विधेयक (CAB) के खिलाफ हो रहे प्रदर्शनों की एक तस्वीर, फोटो सोर्स – गूगल

गौरतलब है कि, पश्चिम बंगाल, केरल और पंजाब के मुख्यमंत्रियों ने ऐलान करते हुए कहा है कि वो अपने राज्य में नागरिकता कानून को लागू नहीं होने देंगे. इसके अलावा मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की राज्य सरकारों ने भी अपने यहां नया नागरिकता कानून लागू न करने की बात कही है. हालांकि, इन राज्यों ने इसका आधिकारिक ऐलान तो नहीं किया है लेकिन, कहा गया है कि वे कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के स्टैंड के मुताबिक ही इस एक्ट का विरोध करेंगे.

नागरिकता संशोधन बिल के विरोध में किस राज्य सरकार ने क्या कहा?

केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने कहा कि ये नया कानून असंवैधानिक है. ये धर्म के आधार पर भेदभाव फैलाने वाला है, संविधान इसकी बिल्कुल इजाजत नहीं देता.

केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन, फोटो सोर्स - गूगल

केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन, फोटो सोर्स – गूगल

पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने सबसे पहले बिल के विरोध में आवाज उठाते हुए कहा था कि ये संविधान के खिलाफ है. पंजाब की विधानसभा, संसद द्वारा पारित इस नए कानून को राज्य में लागू करने से रोक देगी.

पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह, फोटो सोर्स - गूगल

पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह, फोटो सोर्स – गूगल

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी तो इस बिल के संसद में पास होने के पहले से ही इसका सख्त विरोध करती हुई नजर आ रही हैं. बीते शुक्रवार को ममता बनर्जी ने कहा कि वो अपने राज्य में इस कानून को लागू नहीं होने देंगी. ममता बनर्जी नए कानून के खिलाफ 16 दिसंबर को कोलकाता में बड़ी रैली करने वाली हैं.

CAB के खिलाफ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, फोटो सोर्स - गूगल

CAB के खिलाफ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, फोटो सोर्स – गूगल

हाल में ही महाराष्ट्र में नए मुख्यमंत्री बनाए जाने वाले उद्धव ठाकरे की पार्टी शिवसेना वरिष्ठ नेता संजय राउत ने भी बिल का विरोध करते हुए कहा है कि ये नया एक्ट भारतीय संविधान का उल्लंघन करता है. उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र में इसे लागू करने या न करने का फैसला मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे लेंगे जबकि, महाराष्ट्र सरकार में साझेदार कांग्रेस पार्टी के नेताओं का कहना है कि वो राज्य में नया नागरिकता कानून लागू नहीं होने देंगे.

शिवसेना वरिष्ठ नेता संजय राउत, फोटो सोर्स - गूगल

शिवसेना वरिष्ठ नेता संजय राउत, फोटो सोर्स – गूगल

अब आपके मन में ये सवाल आएगा कि है क्या भारत का कोई राज्य संसद में पूर्ण बहुमत से पारित कानून को अपने राज्य में लागू होने से रोक सकता है या नहीं ? क्या सविधान राज्यों को ये अधिकार देता है कि वो केंद्र के बनाए कानून को अपने यहां लागू होने से रोक दें?  इस बारे में संविधान क्या कहता है?

भारतीय संविधान, फोटो सोर्स - गूगल

भारतीय संविधान, फोटो सोर्स – गूगल

संविधान की सातवीं अनुसूची में केंद्र और राज्यों की ताकत का बंटवारा किया गया है. जिसमें भारत के संघीय ढांचे के अंतर्गत आने वाले सभी राज्यों को कई अधिकार दिये गए हैं लेकिन, केंद्रीय लिस्ट वाले अधिकार में वो दखल नहीं दे सकते.

संविधान ने अलग-अलग विषयों पर केंद्र और राज्यों को अधिकार सौंपे हैं. इसमें केंद्रीय लिस्ट में ऐसे 100 विषय हैं, जिन पर कानून बनाने का अधिकार केंद्र सरकार को दिया गया है. इनमें से रक्षा नीति, विदेश नीति, संचार नीति और रेलवे के साथ-साथ नागरिकता भी एक ऐसा विषय है, जिस पर कानून बनाने का अधिकार सिर्फ केंद्र को दिया गया है. इन विषयों पर केंद्र द्वारा बनाए कानूनों को मानने के लिए राज्य बाध्य होंगे.

भारतीय संविधान की प्रतीकात्मक तस्वीर , फोटो सोर्स - गूगल

भारतीय संविधान की प्रतीकात्मक तस्वीर , फोटो सोर्स – गूगल

इसी तरह राज्यों की लिस्ट में भी ऐसे 52 विषयों को रखा गया है, जिस पर कानून बनाने का अधिकार राज्यों को दिया गया है. उदाहरण के तौर पर शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे प्रमुख मामलों पर कोई भी राज्य कानून बना कर अपने यहां लागू करवा सकती है. इसी तरह से करीब 52 विषयों पर वो कानून बनाकर लागू करवा सकती है.

केंद्र और राज्य सरकारों के अधिकारों का बंटवारा करने वाले संविधान की इस सातवीं अनुसूची में कुछ विषयों को अलग से एक समवर्ती सूची में रखा गया है. इस समवर्ती सूची में शामिल विषयों पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं. इस सूची में राज्यों को अपने क्षेत्रीय हितों का ख़याल रखने वाले विषयों पर कानून बनाने के अधिकार दिए गए हैं. जिन पर कानून बनाने का अधिकार केंद्र और राज्य दोनों के पास होता है. हालांकि, केंद्र द्वारा संसद में बहुमत से पारित हुआ कानून राज्य के बनाए कानून से ज्यादा प्रभावी होगा.

बात दें कि क्रिमिनल लॉ और फैमिली प्लानिंग जैसे मामले इस समवर्ती सूची में रखे गए हैं. जिन पर कानून बनाने का अधिकार केंद्र सरकार और राज्य सरकर दोनों को है.

प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स - गूगल

प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स – गूगल

तो अब आप इतना तो समझ गए होंगे कि भारत के किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री नागरिकता संशोधन विधेयक का राजनीतिक विरोध तो कर सकते हैं लेकिन, उनके पास इतना अधिकार नहीं है कि वो अपने राज्य में इसे लागू करने से रोक सकें.

गृह मंत्रालय की तरफ से भी कहा गया है कि कोई भी राज्य अपने यहां केंद्र के बनाए कानून, जो केंद्र सरकार की लिस्ट में आते हैं, उनको अपने यहां लागू करने से नहीं रोक सकते हैं. अगर फिर भी कोई राज्य सरकार इस कानून को अपने राज्य में लागू करने से रोकती है तो केंद्र सरकार आर्टिकल 256 की ताकत का प्रयोग करते हुए राज्यों को निर्देश जारी कर सकता है.

प्रतीकात्मक तस्वीर , फोटो सोर्स - गूगल

प्रतीकात्मक तस्वीर , फोटो सोर्स – ANI

दरअसल संविधान के अनुच्छेद 256 से लेकर 265 तक, संघ तथा राज्यों के बीच प्रशासनिक सम्बन्धों के विनिमय की व्यवस्था करते हैं.  संघात्मक व्यवस्था में समान्यतः ऐसा होता है कि संघ और राज्यों मे आपसी प्रशासनिक संबंधो में टकराव की परिस्थिति बनती रहती है. भारत के संविधान का उद्देश्य है कि दोनों स्तरों के बीच सम्बन्धों का निर्वाह सहज रूप से होता रहे. ये अनुच्छेद ये सुनिश्चित करता है कि राज्य  सरकार की कार्यपालिका की शक्ति का प्रयोग इस प्रकार हो कि संसद द्वारा बनाई विधियों का पालन हो सके. जिसके लिए संघ की कार्यपालिका को, राज्यों को ऐसे निर्देश देने का भी अधिकार प्राप्त है जो भारत सरकार को इसके प्रयोजन के लिए आवश्यक प्रतीत हो.

अब हम संविधान के उन प्रमुख अनुच्छेदों पर प्रकाश डालते हैं जो केंद्र सरकार को ये ताकत देते हैं कि वो उन राज्यों को निर्देश देकर संसद में पारित कानून को लागू करवा सकती है.

अनुच्छेद 245 के अंतर्गत संसद पूरे देश या इसके किसी हिस्से के लिए तथा राज्य विधानपालिका अपने राज्य या इसके किसी हिस्से के लिये कानून बना सकता है.

अनुच्छेद 248- विधि निर्माण संबंधी अवशिष्ट शक्तियां संसद में निहित करता है.

अनुच्छेद 249- राज्य सभा विशेष बहुमत द्वारा राज्य सूची के किसी विषय पर लोक सभा को एक वर्ष के लिए कानून बनाने के लिए अधिकृत कर सकती है यदि, वह इसे राष्ट्रहित में आवश्यक समझे.

अनुच्छेद 257 के अनुसार हर राज्य की कार्यपालिका की शक्ति का प्रयोग इस प्रकार किया जाए कि वह संघ की कार्यपालिका की शक्ति के प्रयोग में बाधक न हो. केंद्र इस संबंध में तथा रेलों के संरक्षण एवं राष्ट्रीय या सैनिक महत्व के संचार साधनों के बारे में जरूरी निर्देश जारी कर सकता है. केंद्रीय निर्देशों के पालन करने में जो अतिरिक्त व्यय आएगा उसकी भरपाई केंद्र उन्हीं राज्यों से कराएगा.

अनुच्छेद 258 के अनुसार राष्ट्रपति किसी भी राज्य सरकार की सहमति से उस सरकार या उस उसके अधिकारियों को ऐसे किसी भी विषय में संबन्धित काम करने के निर्देश दे सकता है जिन पर संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार है. ये अनुच्छेद राज्य के राज्यपाल को भी ये निर्देश देने की ताकत देता है जिसके लिए उसे सिर्फ केंद्र सरकार की सहमति लेनी होगी.

अनुच्छेद 261 भारत के सभी राज्यों को निर्देश देता है कि संघ तथा राज्यों के सार्वजनिक कार्यों , अभिलेखों एवं न्यायिक कार्यवाहियों को पूरे विश्वास के साथ मान्यता दी जाएगी. ये बात संघ व राज्यों के आपसी सम्बन्धों को सुचारु रूप चलाने में सहायक साबित होती है.

अनुच्छेद 263 देश के राष्ट्रपति को अंतर्राज्यीय परिषद की स्थापना का अधिकार प्रदान करता है. इन परिषदों का उद्देश्य है कि वे राज्यों के आपसी विवादों तथा राज्यों या संघ एवं राज्यों के सामान्य हित के आपसी मामलों के बारे में जांच कर उन्हें सलाह दे. उसके साथ ही नीति एवं कार्यवाही के बेहतर समन्वय के बारे में सिफ़ारिश करे.