आजादी से पहले की बात है। एक मुकदमा चल रहा था। वकील वो शख्स था जो अपनी ईमानदारी के लिये जाना जाता था। जिसे घूसखोरी और झूठ से नफरत थी। जब उसे जज की बात सही नहीं लगी तो वो जजसाहब को ही समझाने लगा। जज जो इंग्लैंड के रहने वाले थे। उनको ये अच्छा नहीं लगा कि एक इंडियन वकील उनको कानून की परिभाषा समझा रहा है। जजसाहब ने गुस्से में कहा ‘मैं तुम्हें अदालत के अंदर नहीं घुसने दूंगा।’’ वो भारतीय वकील गरजकर बोला ‘आप क्या कर पायेंगे? मैं आज से कभी तुम्हारी अदालत में कदम नहीं रखूंगा।’’ ये वकील भारत के सबसे बड़े प्रदेश का पहला मुख्यमंत्री बनने वाला था। जिसे बाद में सरदार पटेल की जगह मिलने वाली थी। ये कहानी है उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत की।

Image result for govind ballabh ballabh pantगोविंद वल्लभ पंत का जन्म उत्तरप्रदेश के अल्मोड़ा के एक गांव खूंट में हुआ था। जो अब उत्तराखंड में आता है। पिता का नाम मनोरथ पंत और मां का नाम गोविंदी पंत था। ये रहते तो पहाड़ों में थे लेकिन मूलतः मराठा था। गोविंद वल्लभ पंत के पिता बचपन में ही गुजर गसे। पंत की देखरेख उनके दादाजी बद्रीदत्त जोशी ने की। 10 साल तक वे घर में ही रहे और दादाजी उनको पढ़ाते रहे। बचपन में गोविंद वल्लभ पंत बहुत मोटे थे। इतने कि वे मोटापे की वजह से कोई खेल नहीं खेल पाते थे, वे एक ही जगह पर बैठे रहते।

बाद में उन्होंने रामजे काॅलेज में दाखिला ले लिया। गोविंद वल्लभ पंत पढ़ने में खूब होशियार थे। स्कूली शिक्षा के बाद पंत का परिवार पहाड़ों से उठकर इलाहाबाद चला आया। यहीं पर वल्लभ पंत ने बीए किया और कानून की शिक्षा पूरी की। 1910 में वे वकील बनकर वापस पहाड़ों में अल्मोड़ा में आ गये और वकालत करने लगे। गोविंद वल्लभ पंत सच्चे वकील थे। इनके बारे में फेमस था कि वे सच्चे केस लेते थे और झूठ पकड़ा गया तो केस को बीच में ही छोड़ देते थे।

वे मजदूरों के हक में भी लड़ते और क्रांतिकारियों के हक में भी। इन्होंने की रामप्रसाद बिस्मिल और खान के लिये काकोरी कांड का केस भी लड़ा था। उनका व्यक्तिगत जीवन अच्छा नहीं रहा। वकालत करने से पहले उनके पहले बेटे की मौत और फिर पत्नी गंगादेवी की भी मौत हो गई। परिवार के दबाव के कारण 1912 में उन्होंने दूसरी शादी की। लेकिन वो शादी भी सफल नहीं बन पाई। दूसरी पत्नी से एक बेटा हुआ और साल भर के अंदर बीमारी से उसकी भी मौत हो गई। 1916 में कमलादेवी से तीसरी शादी की।

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गोविंद वल्लभ पंत वकालत के अलावा देश की आजादी में भी साथ दे रहे थे। 1914 में उन्होंने काशीपुर में ‘प्रेमसभा’ की स्थापना की। 1916 में पंतजी ‘नोटिफाइद एरिया कमेटी’ के सदस्य बन गये। 1921 में चुनाव हुये और पंत लेजिस्लेटिव असेंबली में चुन लिये गये। फिर बाद में नमक आंदोलन में गिरफ्तार हुए। उस वक्त यूनाइटेड प्रोविंसेज ऑफ आगरा और अवध होता था। 1933 में हर्ष देव बहुगुणा के साथ गोविंद वल्लभ पंत को भी गिरफ्तार कर लिया गया। बाद में उन्होंने कांग्रेस और सुभाष चंद्र बोस के बीच मध्यस्थता भी की। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में गिरफ्तार हुए। तीन साल अहमदनगर फोर्ट में नेहरू के साथ जेल में रहे।

स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन में गोविंद वल्लभ पंत 7 साल तक जेल रहे। जवाहर लाल नेहरू पंतजी से बहुत प्रभावित थे। जब 1937 में सबसे बड़े प्रदेश के मुख्यमंत्री चुनना था। तो इतनी सारी भीड़ में जवाहर लाल नेहरू ने गोविंद वल्लभ पंत को चुना था। गोविंद वल्लभ पंत उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। नेहरू की विश्वास पर गोविंद वल्लभ पंत बिल्कुल खरे उतरे। उन्होंने उत्तर प्रदेश में अच्छी सरकार चलाई। पंत 1954 तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने रहे।

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जब सरदार पटेल की मृत्यु हो गई तो जवाहर लाल नेहरू ने उनकी जगह के लिये अपने भरोसेमंद गोविंद वल्लभ पंत को चुना था। 1955 में गोविंद वल्लभ पंत देश के दूसरे गृहमंत्री बने। वे इस पद पर 1961 तक रहे। 1957 में गोविंद वल्लभ पंत को भारत रत्न दिया गया। 7 मार्च 1961 को गोविंद वल्लभ पंत की हार्ट आने से मृत्यु हो गई। ये थी उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत की कहानी। जाते-जाते गोविंद वल्लभ पंत का एक छोटा-सा किस्सा।

देश को आजाद हुये कुछ ही समय हुआ था, तब गांधीजी भी जीवित थे। गोविंद वल्लभ पंत ने इंदिरा से कहा, तुमको उत्तर प्रदेश विधानसभा आना चाहिये। इंदिरा गांधी ने वल्लभ पंत को साफ-साफ मना कर दिया। गोविंद वल्लभ पंत सीधे गांधीजी के पास पहंुचे और बोले- ‘इस नादान लड़की की गलती तो देखिये। खुद को मुझसे ज्यादा चालाक समझती है।’ गुस्से में भी पंतजी की भाषा कितनी सभ्य थी और आज तो आप देख ही रहे हैं क्या हो रहा है?

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