साल 1982, तारीख थी 11 जनवरी। जगह, बडाला का अंबेडकर कॉलेज। छह पुलिसवालों की टीम में से पाँच पुलिसवाले उसी कॉलेज में हूलिया बदल कर घूम रहे थे। ये पाँच पुलिसवाले थे- आइजैक सैमसन, इंस्पेक्टर यशवंत भिड़े, सब-इंस्पेक्टर राजा ताबट, संजय पराण्डे और ईशाक बागवान। पाँच में से तीन नौजवान पुलिस वाले स्टूडेंट के हूलिये में थे और दो, थोड़े उम्रदराज, पुलिस अफसर प्रोफेसर के हूलिये में। इन लोगों के यहाँ जमा होने की एक खास वजह थी। इन्हें एक गैंगस्टर को गिरफ्तार करना था।

एक ऐसा गैंगस्टर जिसके बारे में कहा जाता है कि वो जब घर से निकलता था तो एक झोला भर के हथगोले साथ में लेकर चलता था। मानों कोई सब्जी या फल लेकर अपने साथ चल रहा हो। जिसके कमर में हमेशा एक तेजाब की शीशी बंधी रहती थी और पास में दो-दो बंदूकें। वो गैंगस्टर आज अपनी गर्लफ्रेंड से मिलने अंबेडकर कॉलेज आने वाला था।

माहौल ने तब गरमाना शुरू किया जब वो लड़की आई और कॉलेज के बाहर बस-स्टॉप पर खड़े होकर उसका इन्तज़ार करने लगी। पुलिस के मुखबिर ने इशारे से बताया कि यही वो लड़की है जिससे वो गैंगस्टर मिलने वाला है, और पुलिसवाले उस लड़की के चारों ओर फैल गए।
सुबह के क़रीब 10 बज कर 45 मिनट के आसपास वो गैंगस्टर टैक्सी में आया, जो बस-स्टॉप से कई फ़ुट दूर जाकर रुकी। बिछाए गए जाल से अनजान गैंगस्टर टैक्सी से उतरा, और ताम्बट और उसके ‘कॉलेज के साथियों’ के बग़ल से गुज़रता हुआ अपनी गर्लफ़्रैण्ड की तरफ़ बढ़ गया।
यशवंत भिड़े ने सबसे पहले उसे पहचाना और अपने साथियों को इशारा किया। इशारा मिलते ही उन्होंने गैंगस्टर को चारों तरफ़ से घेर लिया और उसे चेतावनी दी, “थाम्बा, आम्ही पुलिस आहोत (रुको, हम पुलिसवाले हैं )!”
पर, उस शख्स को रोकना इतना आसान होता तो क्या ही बात थी। गैंगस्टर ने होंठ बिदकाते हुए तुरन्त अपनी शर्ट के भीतर से माउज़र पिस्तौल निकाली और अपने सामने खड़े ताम्बट तथा बागवान की तरफ़ तान दी। जैसे ही उसने गोलियाँ दागनी शुरू कीं, दोनों पुलिसवाले बचाव की कोशिश में पास में पार्क किए गए गाड़ियों के पीछे कूद गए। जवाबी हमला करते हुए ताम्बट और बागवान ने उस शख्स पर तीन–तीन गोलियाँ चलायी।
उस गैंगस्टर को अब तक छह गोलियाँ लग चुकी थी लेकिन ये छह गोलियां भी उस लमछड़, मज़बूत अपराधी को क़ाबू नहीं कर सकीं, जो अपनी गिरफ़्तारी के बाद से पुलिसवालों से घोर नफ़रत करने लगा था। अंतिम उम्मीद में उस गैंगस्टर ने अपने मोज़े की तरफ़ हाथ बढ़ाया ताकि वह उस तेज़ाब की बोतल को निकाल सके जिसे वह हमेशा अपने साथ रखता था। लेकिन उसे दबोचकर निहत्था कर दिया गया।
कॉलेज के बाहर पुलिस ने कई गाड़ियाँ खड़ी कर रखी थी जिनमें से एक में ख़ून और गालियाँ उगलते हुए उस गैंगस्टर को अस्पताल ले जाया गया लेकिन, वह अस्पताल पहुँचने के पहले ही मर गया था।
ये मुंबई और देश के इतिहास में दर्ज़ देश का पहला एनकाउंटर था और मरने वाले उस गैंगस्टर का नाम था मन्या सुर्वे। इस एनकाउंटर के लिए ताम्बे और सब–इंस्पेक्टर बागवान को बाद में बहादुरी के लिए राष्ट्रपति द्वरा पुलिस पदक दिया गया।
मन्या सुर्वे, फोटो सोर्स: गूगल

मन्या सुर्वे, फोटो सोर्स: गूगल

मन्या सुर्वे 1970 और 80 के दशक का सबसे खूंखार गैंगस्टर था। उस वक्त हर जगह सिर्फ उसी का बोलबाला था। इस बात की जानकारी बहुत कम लोगों को है कि मन्या सुर्वे असल में दाऊद इब्राहिम और उसके बड़े भाई सबीर इब्राहिम का जानी दुश्मन था। मन्या भारत के पहले हिंदू गैंग का सरगना था जो दाऊद और अफगानी माफिया के खिलाफ जंग लड़ते थे। मन्या के एनकाउंटर ने दाऊद को सबसे शक्तिशाली बना दिया था।
मन्या सुर्वे के ऊपर एक फिल्म भी बन चुकी है, ‘शूटआउट एट वडाला’। इस फिल्म में मन्या सुर्वे का किरदार जॉन अब्राहम, दाऊद का सोनू सूद, सबीर का मनोज वाजपेयी और ईशाक बागवान का किरदार अनिल कपूर ने निभाया है।

इस कहानी के कुछ अंश ‘एस हुसैन जैदी’ की किताब ‘डोंगरी से दुबई’ तक से लिए गए हैं।