तारीख 26 जुलाई 1999, जब भारतीय सेना ने कारगिल युद्ध में ऐतिहासिक विजय हासिल की थी. इस ख़ास दिन को भारत ‘कारगिल विजय दिवस’ के रूप हर साल मनाता है लेकिन, इस साल कारगिल युद्ध के 20 साल पूरे होने जा रहे हैं. इस खास मौके पर भारत सरकार न केवल राजधानी दिल्ली में बल्कि द्रास और लेह की ऊचाइयों पर भव्य कार्यक्रमों का आयोजन करने जा रही है. जहां कारगिल युद्ध में मिली जीत का जश्न भी मनाया जाएगा इसके साथ ही इस जंग में अपना सर्वत्र निछावर करने वाले वीर योद्धाओं को याद किया जाएगा. 2 महीने तक चली इस जंग में हमने अपने कई वीर सपूतों को खोया था.

अपनी इस खास सीरीज के माध्यम से हम हमारे उन वीर जवानों को याद करेगे जिन्होंने हमारे-आपके कल के लिए अपना आज कुर्बान कर दिया था. वो जवान जो रूह तक को गला देने वाली ठंढ़ में बर्फ से ढ़के ऊंचे पहाड़ों पर दुश्मनों से लड़ते हुए शहीद हुए थे. आज हम कारगिल युद्ध में शामिल हुए उस योद्धा की बात करेंगे. जिसमें दुश्मनों से टकराने का अटूट जज्बा था. हम बात कर रहे हैं कारगिल युद्ध में शहीद हुए सबसे कम उम्र के जांबाज योद्धा कैप्टन विजयंत थापर की. जिनका नाम भारतीय सेना के दमदार टैंक ‘विजयंत’ के नाम पर रखा गया था.

कैप्टन विजयंत थापर , फोटो सोर्स - गूगल
कैप्टन विजयंत थापर , फोटो सोर्स – गूगल

कैप्टन विजयंत थापर को ‘बॉर्न सोल्जर’ कहा जाता है. क्योंकि विजयंत थापर की फैमिली तीन पिढ़ियों से भारतीय सेना में शामिल होकर देश की सेवा कर रही थी. विजयंत थापर के परदादा डॉ. कैप्टन कर्ता राम थापर, दादा जेएस थापर और पिता कर्नल वीएन थापर सभी सेना में थे. इस वजह से विजय थापर को बड़े होकर क्या बनना है, इस बता को लेकर उनके मन में कोई सवाल नहीं था.

कैंपटन विजयंत थापर के माता – पिता, फोटो सोर्स – गूगल

जिस दिन पिता कर्नल वीएन थापर सेना से रिटायर हुए थे लगभग उसी दिन विजयंत थापर को राजपूतना राइफल्स 2 में कमीशन किया गया था. कारगिल युद्ध शुरू के दौरान विजयंत थापर की यूनिट की तैनाती जम्मू कश्मीर के कुपवाड़ा में थी. तभी ख़बर आई कि पाकिस्तानी घुसपैठियों ने द्रास और तोलोलिंग की चोटी पर कब्जा कर लिया है. जिसके बाद इन पहाड़ियों से घुसपैठियों को भगाने की ज़िम्मेदारी यूनिट 2 राजपूताना राइफल्स को सौंपी गई.

12 जून 1999 को विजयंत थापर की यूनिट ने तोलोलिंग की चोटी पर तिरंगा फहरा दिया. यह यूनिट 2 राजपूताना राइफल्स की पहली जीत थी.

यूनिट 2 राजपूताना राइफल्स की पहली जीत, फोटो सोर्स – गूगल

इसके बाद कैप्टन विजयंत थापर के सामने दूसरी चुनौती तब आई जब उनकोे रॉक कॉम्प्लेक्स में स्थित नॉल और ‘थ्री पिम्पल्स चोटी को खाली करवाने का जिम्मा दिया गया. ये चोटियां सामरिक दृष्टी से भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण थी. क्योंकि ये दोनों चोटियाँ तोलोलिंग और टाइगर हिल के बीच में थी. जिन पर पाकिस्तानी सैनिको ने कब्जा किया हुआ था.

तोलोलिंग और टाइगर हिल के बीच स्थित ये बेहद ही खतरनाक और सबसे मुश्किल चोटियां थी. चांदनी रात में विजयंत थापर की यूनिट ने नॉल चोटी पर फतेह करने के लिए निकल पड़ी. जिस रास्ते पहाड़ी पर चढ़ना था वो पूरी तरह से दुश्मन की फायरिंग रेंज में था. पाकिस्तानी सैनिक लगातार मशीनगनों से गोलीयां बरसा रहे थे. इस वजह से इन पहाड़ियों पर पहुंचते-पहुंचते कैप्टन विजयंत के यूनिट के कई साथी शहीद हो चुके थे. कैप्टन विजयंत अपने कई साथी खो चुके थे. उनकी यूनिट बिखर चुकी थी. इतना सबकुछ होने बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी. विजयंत अपने बचे साथियों को लेकर एक सुरक्षित जगह पर पहुंचे. साथियों का हौसला बंधाते हुए कैप्टन विजयंत ने फिर से सबको इकट्ठा किया और पहाड़ी पर चढ़ना शुरू किया. ऊपर पहुंचकर यूनिट ने नॉल चोटी का एक छोटा हिस्सा भी अपने कब्ज़े में ले लिया.

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उस जगह से सिर्फ 15 मीटर की दूरी पर नॉल चोटी पर बैठे पाकिस्तान सैनिक अंधा-धुध गोलीयां बरसा रहे थे. इस गोलीबारी में कंपनी के कमांडर मेजर पी. आचार्य शहीद हो गए थे. ये ख़बर कैप्टन विजयंत का मिली तो उनका खून खौल उठा. गोलियों की परवाह किए बिना कैप्टन विजयंत अपने साथी नायक तिलक सिंह के साथ उस नॉल पहाड़ी पर चढ़ने लगे. इस चढ़ाई के दौरान लगभग डेढ़ घंटे तक मशीनगनों से बरस रही गोलियों का सामना करते हुये कैप्टन विजयंत थापर आगे बढते रहे. साथ ही दुश्मनों को ढे़र करते हुये विजयंत थापर नॉल चोटी पर पहुंच गए और 28-29 जून की रात में कैप्टन विजयंत थापर ने नॉल पहाड़ी पर तिरंगा लहरा दिया.

नॉल चोटी जीतने के बाद भी कैप्टन विजयंत थापर नहीं रुके और आगे बढ़ते गए तभी दुर्भाग्यवश दुश्मन की मशीनगन से निकली एक गोली विजयंत के सिर पर लगी और वो अपने साथी नायक तिलक सिंह की गोद में गिर गये. कैप्टन विजयंत थापर शहीद हो चुके थे.

थ्री पिंपलस और नॉल चोटियाँ, फोटो सोर्स – गूगल

अपनी आखिरी लड़ाई से पहले कप्तान विजयंत थापर ने अपने परिवार को एक ख़त लिखा था. जिसमें उन्होंने लिखा –

प्रिय पापा, मम्मी, बिरदी और ग्रैन-
अगले 20 दिन तक बात नहीं हो पाएगी, आप मेरे ख़त का इंतजार मत करना. मेरा ये ख़त जब तक आपके पास पहुंचेगा, मैं आप सबको ऊपर आसमान से देख रहा होऊंगा. अगर मैंने फिर से इंसान के रुप में इस देश में जन्म लिया तो एक बार फिर सेना में भर्ती होकर देश के लिए लड़ना चाहूंगा.

कैप्टन विजय थापर का आखिरी खत, फोटो सोर्स – गूगल

अगर आप आ सकते हैं तो प्लीज यहाँ आइए और देखिए कि हमारी यूनिट आपके बेहतर कल के लिए किन मुश्किल जगहों पर दुश्मनों से लड़ाई लड़ रही है. जवानों के इस बलिदान के बारे में नई पीढ़ी को बताना चाहिए. पापा और मां आपको गर्व होना चाहिए. ‘मेरे शरीर का जो भी हिस्सा इस्तेमाल करने लायक होगा उसे निकाल लिया जाना चाहिए.

अनाथालयों में दान करते रहिएगा, रुख़साना को हर महीने 50 रूपये जरूर भेजते रहिएगा और योगी बाबा से मिलते रहिएगा. ओके अब अपनी असॉल्ट पार्टी को ज्वॉइन करने का समय आ गया है.
बेस्ट ऑफ लक टू यू ऑल
लिव लाइफ किंग साइज
रॉबिन (कैप्टन विजयंत थापर के घर का नाम)

कैप्टन विजयंत थापर ने अपने आखिरी खत में किसी रुख़साना का जिक्र किया था, जिसके बारे में आपको जरूर जानना चाहिए. विजयंत-रुख़साना की कहानी सुन कर उन लोगों के मुंह जरूर बंद हो जाएगे जो चिल्लाते फिरते है कि भारतीय सेना कश्मीर में वहां के लोगों के साथ अमानवीय व्यवहार करती है.

रुख़साना 6 साल की कश्मीरी बच्ची है. जिसके माता-पिता का आतंकवादियों ने उसके सामने ही कत्ल किया था. इस हादसे का रुख़साना के जेहन पर इतना गहरा असर पड़ा कि वो बोलना ही भूल गई.

कुपवाड़ा में पोस्टिंग के दौरान ही कैप्टन थापर की मुलाकात रुख़साना से हुई. नन्ही सी बच्ची को सदमें में देखकर कैप्टन थापर बहुत दुखी हुए. उन्होंने तय किया कि वो इस बच्ची के चेहरे पर फिर से मुस्कान लाकर रहेंगे. इसके बाद कैप्टन थापर रुख़साना से रोज मिलने लगे. धीरे-धीरे कैप्टन थापर के प्यार ने असर करना शुरू किया और रुख़साना बोलने लगी.

रुख़साना के साथ कैप्टन विजयंत थापर , फोटो सोर्स – गूगल

रुख़साना के लिए कैप्टन विजयंत थापर के दिल में कितना प्यार था इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अपनी ज़िंदगी के आखिरी खत में रुख़साना का जिक्र करना नहीं भूले.

कैप्टन थापर के शहीद होने के बाद उनके परिवार ने रुख़साना का खूब ख्याल रखा. करीब एक दशक के बाद विजयंत का परिवार रुख़साना से मिलने कुपवाड़ा गया था. अब रुखसाना 16 साल की हो चुकी है और 12वीं पास कर चुकी है. वो उर्दू, इंग्लिश और कश्मीरी भाषा पढ़, लिख और बोल सकती है. कैप्टन थापर के परिवार ने रुखसाना को गिफ्ट में एक मोबाइल फोन भी दिया ताकि वो उनसे कभी भी बात कर सके. आज भी शहीद विजयंत थापर के पिता हर साल रुखसाना की मदद करते है.

कैप्टन विजयंत थापर का जन्म 26 दिसंबर 1976 हुआ था. पिता कर्नल वीएन थापर ने अपने बेटे का नाम भारतीय सेना के टैंक ‘विजयंत’ के नाम पर रखा .एक आर्मी परिवार में जन्म लेने के कारण विजयंत बाई बर्थ सैनिक थे. बचपन से वो सेना में जाकर देश सेवा करना चाहते थे. विजयंत थापर ने बारहवीं चंडीगढ़ के डीएवी स्कूल से की थी. बता दें कि इसी स्कूल से परमवीर चक्र विजेता विक्रम बत्रा ने भी पढ़ाई की थी. विक्रम बत्रा उनसे दो साल सीनियर थे. 12वीं के बाद विजयंत थापर ने स्नातक दिल्ली विश्वविद्यालय के खालसा कॉलेज से किया. जिसके बाद 12 दिसंबर 1998 को विजयंत थापर आधिकारिक तौर पर 2 राजपूताना राइफल्स का हिस्सा बने.

कारगिल की जंग में शामिल होने के वक्त विजयंत थापर सिर्फ 22 साल के थे. जब वे शहीद हुए तब उनको सेना में शामिल हुये सिर्फ 6 महीने ही हुए थे. भारत माँ के इस लाल को मरनोपरांत वीर चक्र से अलंकृत किया गया .

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