महात्मा गांधी। एक व्यक्ति कहूं या विचार। आज़ादी का मतवाला कहूं या बिना किसी डर के अंग्रेज़ो से भिड़ जाने वाला प्रतिकार। गांधी जिसने हमेशा सही करने की कोशिश की। जो परिवार विशेष को छोड़कर, देश प्रेम में लग गया। जो अपने अंतिम समय तक देश के लिये कुछ न कुछ करता रहा और फिर एक दिन उसी महात्मा की हत्या कर दी गई। वो आज की ही तारीख थी, 30 जनवरी 1948।

प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो सोर्स: गूगल

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वो तारीख जिसे मनहूसियत के लिये याद किया जाना चाहिये। जब गोडसे ने एक विचार को मारने की कोशिश की। उस दिन वो महात्मा तो मर गया लेकिन अपने पीछे एक विचार छोड़ गया। वो विचार उनकी बातों में, उनके किस्सों में और किताबों में ज़िंदा है।

पांच महीने की आज़ादी

आज़ादी को कुछ ही महीने बीते थे। भारत विभाजन की मार झेल रहा था। पूरा देश शरणार्थियों का रेला बन गया था। महात्मा गांधी उस समय बंगाल में हो रहे दंगों को सुलझाने में लगे थे। वे जिधर जाते शांति हो जाती। दिल्ली में भी कुछ ऐसा ही हाल हो गया था। महात्मा गांधी बंगाल से दिल्ली आ गये और शरणार्थी कैंपों में जाने लगे।

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देश की आज़ादी को अभी पांच महीने ही हुये थे। दिल्ली की सर्दी ठिुठरन मचा रही थी। जिसके लिए दिल्ली मशहूर रहा है। दिल्ली उस समय सर्दियों में कम, लोगों में ज्यादा बंटी हुई थी। पाकिस्तान से आने वाले हिंदू और मुसलमानों के अलग-अलग कैंप लगे हुये थे। महात्मा गांधी को लगा कि मुसलमान अपने को अलग न समझें। इसके लिए उनको उस कैंप में जाना चाहिये।

महात्मा गांधी। फोटो सोर्स: गूगल

महात्मा गांधी। फोटो सोर्स: गूगल

सभी लोगों का कहना था कि महात्मा गांधी को शरणार्थी कैंप नहीं जाना चाहिये। कैंप में अभी खतरा है। कैंपों में खुद प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू भी नहीं जा रहे थे। प्रधानमंत्री हेलीकाॅप्टर से कैंपों का जायजा लेते। लेकिन महात्मा गांधी नहीं माने और मुसलमानों के कैंप गये। वहां जाने के कारण हिंदू संगठन को लगा कि ये मुसलमानों के हितैषी हैं। कैंपों में गांधी के जाने से सबको विश्वास हो गया था कि ये महात्मा फिर से लाठी लेकर चलेगा और सब ठीक हो जायेगा।

प्रार्थना में देरी

महात्मा गांधी अहिंसक तो थे ही धर्म और अध्यात्म में को भी मानते थे। उनके पास हमेशा एक पॉकेट गीता होती थी। 30 जनवरी 1948। बिड़ला भवन में रोज की तरह प्रार्थना शुरू होने वाली थी। अंदर महात्मा गांधी और सरदार पटेल के बीच बातचीत चल रही थी। बातचीत लंबी खिंच गई। हमेशा समय के पाबंद रहने वाले महात्मा गांधी को उस दिन देर हो गई।

जब महात्मा गांधी को देरी का पता चला तो वे उठे और प्रार्थना के लिये चल दिये। 5 बजे शुरू हो जाने वाली प्रार्थना अब तक 15 मिनट लेट हो चुकी थी। पूरी सभा भर चुकी थी। लोग महात्मा गांधी के इंतजार में थे। तभी महात्मा गांधी आते हैं। अचानक सभा में खुसुर-फुसुर होने लगती है ‘बापू आ गये’। महात्मा गांधी अपनी दोनों भतीजियों के साथ आ रहे होते हैं।

प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो सोर्स: गूगल

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महात्मा गांधी मनु से कहते हैं कि तुमको बताना चाहिये था कि प्रार्थना का समय हो गया है। मनु कहती है कि आप ज़रूरी बात कर रहे थे इसलिये नहीं बताया। बापू बोले, नर्स का काम है मरीज़ को दवा देना। अगर मरीज़ को सही समय पर दवा नहीं मिलेगी तो वो मर जायेगा।

सामने भीड़ खड़ी थी। महात्मा गांधी आगे बढ़ते जाते और लोग प्रणाम करके जगह दे देते। उसी सभा में वो शख्स खड़ा था, नाथूराम गोडसे। नाथूराम गोडसे ने अपनी पिस्तौल तैयार कर रखी थी। गांधी मंच की ओर बढ़ रहे थे। तभी गोडसे, महात्मा गांधी की ओर बढ़ा। मनु ने उसे रोकना चाहा लेकिन फिर सोचा प्रणाम करने आ रहा है। नाथूराम पास आया और पिस्तौल निकालकर गोली चला दी। महात्मा गांधी नीचे गिर गये और देश के राष्ट्रपिता का निधन हो गया।

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नाथूराम गोडसे फोटो सोर्स: गूगल

नाथूराम गोडसे को गिरफ्तार कर लिया। गोडसे के अलावा कुछ और लोगों को भी गिरफ्तार किया गया। महात्मा गांधी की मौत का ट्रायल चला। किसने सोचा था कि ये देश आज़ादी के कुछ महीने बाद ही आज़ादी के सबसे बड़े हीरो की मौत देखेगा। ट्रायल के 22 महीने के बाद महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को फांसी दे दी गई।

ये आर्टिकल द कच्चा चिट्ठा के लिए ऋषभ देव ने लिखा है।