पहला और दूसरा आम चुनाव कांग्रेस और जवाहर लाल नेहरु के प्रभुत्व का चुनाव था। जहां उनको चुनौती देने वाला कोई नहीं था लेकिन तीसरे आम चुनाव तक हालात बदल गये थे। इस आम चुनाव में देश की राजनीति सत्ता-विरोधी हो गई थी। कई क्षेत्रीय पार्टियां उभर आईं थीं, कई कांग्रेसी नेताओं ने अपनी अलग पार्टी बना ली थी। सबसे बड़ी बात कांग्रेस का नेतृत्व नेहरु नहीं, उनकी बेटी इंदिरा कर रही थी। ये वो चुनाव था जिसमें पहली बार चुनाव आयोग ने सख्ती दिखाई थी। इस चुनाव में नेहरु के लिए समस्या सिर्फ विपक्ष नहीं था, कुछ पड़ोसी देश भी थे। जो जवाहर लाल नेहरु के विश्वास को तोड़ने वाले थे। चुनाव की बातों में आज कहानी उस आम चुनाव की जिसने नेहरु के वर्चस्व को हिला दिया था। आज कहानी 1962 में हुये तीसरे आम चुनाव की।

Related imageदेश को आजाद हुये 15 साल हो गये थे और नेहरु को भी प्रधानमंत्री बने इतने ही साल हो चुके थे। दूसरे आम चुनाव के बाद कई मुद्दों ने कांग्रेस की छवि को खराब किया। नेहरु के दामाद फिरोज गांधी ने मूंदडा कांड को सबके सामने ला दिया। जिस वजह से नेहरू की कैबिनेट के मंत्री टीटी कृष्णामाचारी को वित्त मंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा था। इसके बाद इंदिरा गांधी का 1959 में कांग्रेस का अध्यक्ष बनना और फिर कम्युनिस्ट पार्टी को केरल से बर्खास्त करना। ये पहला मौका था जब केन्द्र सरकार ने आर्टिकल 356 का प्रयोग करके किसी सरकार को बर्खास्त किया था।

ये वो समय था जब कांग्रेस के खिलाफ एक मजबूत विपक्ष खड़ा हो गया था। कांग्रेस के खिलाफ जनसंघ, सोशलिस्ट पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी तो पहले से ही थी। अब एक नई पार्टी बनी थी जो कांग्रेस से ही निकली थी, स्वतंत्र पार्टी। 1959 में कांग्रेस से अलग होकर सी राजगोपालचारी ने स्वतंत्र पार्टी बनाई। ये वही राजगोपालचारी हैं, जिन्हें नेहरु देश का पहला राष्ट्रपति बनाना चाहते थे। राजगोपालचारी को लगने लगा था कि सरदार पटेल के जाने के बाद जवाहर लाल नेहरू को चुनौती देने वाला कोई नहीं है। कांग्रेस के कामों पर सवाल उठाना जरुरी है। उनका मानना था कि स्वतंत्र पार्टी हिंसा और मजबूरी के कारण बनी है। तीन सालों में स्वतंत्र पार्टी ने अपना अच्छा वर्चस्व बना लिया। राजगोपालचारी ने मीनू मसानी और एनजी रंगा के साथ मिलकर स्वतंत्र पार्टी बनाई, जो आगे चलकर 1974 में टूटने वाली थी।

राजनैतिक रूप से तो नेहरू को चुनौती मिल ही रही थी, देश के कई मुद्दे और थे जो नेहरु को सुलझाने थे। मसलन, देश में पंचवर्षीय योजनाओं को अच्छे से चलाना। दूसरी पंचवर्षीय योजना उद्योगों के बढ़ाने पर केन्द्रित रही और तीसरी पंचवर्षीय योजना में देश में कई जगहों पर स्टील प्लांट लगने थे। जिसमें झारखंड, छत्तीसगढ़ का नाम का प्रस्ताव था लेकिन अभी तक किसी एक को फाइनल नहीं किया गया था।

ये अंतिम प्रस्ताव चुनाव में कांग्रेस के लिये जोखिम भरे थे। वहीं दूसरी ओर तिब्बत एक बड़ी समस्या बनकर आ गया था। 1955 में भारत और चीन के बीच पंचशील समझौता हुआ था जिसमें कुछ नियम बने थे। 30 मार्च 1959 को दलाई लामा भारत आ गये, जिसे चीन ने उस समझौते का उल्लंघन बताया। उसी समय सोवियत संघ के मुखिया निकेता ख्रुश्चेव और अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट डी आइजनहावर अलग-अलग समय पर भारत दौरे पर आये। नेहरु ऐसे में चुनाव और देश के मसले को एक-साथ संभालने में लगे हुये थे।

उसके अगले ही साल बाद भारत ने गोवा में सेना भेजकर भारत का हिस्सा बना लिया। जिसे चुनाव में समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया ने नेहरु के खिलाफ एक बड़ा मुद्दा बनाया। राम मनोहर लोहिया का मानना था कि नेहरु ये बहुत साल पहले ही कर सकते थे। जवाहर लाल नेहरु ने इलाहाबाद की फुलपूर सीट से चुनाव लड़ रहे थे। नेहरु को रोकने के लिए लोहिया ने भी फूलपुर से नामांकन करा दिया। लोहिया को अच्छी तरह से पता था कि वे इस सीट पर जीत नहीं पायेंगे लेकिन वे नेहरु को चुनौती देना चाहते थे। लोहिया, फुलपुर से लड़े और हारे भी।

1962 के तीसरे आम चुनाव एक हफ्ते के अंदर पूरे किये गये। 19 फरवरी 1962 को चुनाव शुरू हुये और 25 फरवरी 1962 को चुनाव खत्म। ये पहला चुनाव था जब चुनाव आयोग ने धोखाधड़ी को रोकने के लिए अमिट स्याही को प्रयोग में लाया। ये स्याही मैसूर पैंट्स और वर्निश लिमिटेड ने बनाई थी। जो आज भी चुनाव में प्रयोग होती आ रही है। वो स्याही आज वोट डालने की पहचान बन गई है। भाषा के आधार पर राज्यों के पुर्नगठन के बाद इस आम चुनाव में 18 राज्य हो गये थे, जो पिछले चुनाव में 17 थे। बाॅम्बे प्रेसीडेंसी में एक महाआंदोलन हुआ। जिस वजह से सरकार ने दो नये राज्य बना दिये, गुजरात और महाराष्ट्र।

Related imageइंदिरा गांधी, राजनीति में अपनी पिता की जगह लेने लगी थीं। ये वो दौर था जब नेहरु को इंदिरा के फैसले पर राजी न होते हुये भी मानना पड़ रहा था। कांग्रेस को एक तरफ कम्युनिस्ट पार्टी, जनसंघ, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी, सोशलिस्ट पार्टी और स्वतंत्र पार्टी चुनौती दे रही थी। तो कुछ नई क्षेत्रीय पार्टी भी खड़ी हो गई थीं तमिलनलाडु से डीएमके, पंजाब से अकाली दल, हरियाणा लोक समिति। सभी दलों ने खूब प्रचार-प्रसार किया। वो चुनाव हर नेता के लिये थका देने वाला रहा। तीसरे आम चुनाव में भारत के मतदाताओं की संख्या 21 करोड़ रही। जिनमें लगभग 11 करोड़ लोगों ने वोट डाला। जब चुनाव का परिणाम आया था तो सबके होश उड़ गये, कांग्रेस एक बार फिर से पूरे बहुमत से सत्ता में वापस आ गई थी।

494 सीटों पर चुनाव हुये। जिसमें कांग्रेस ने 488 सीटों पर अपने उम्मीदवारों को उतारा। कांग्रेस के 488 उम्मीदवारों में से 361 उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की। ये पहली बार था कि कांग्रेस की इतनी कम सीटें आईं थीं। दूसरे आम चुनाव से कांग्रेस की 10 सीटें कम हो गईं थीं।

कांग्रेस के बाद दूसरी बड़ी पार्टी बनी कम्युनिस्ट पार्टी। कम्युनिस्ट पार्टी की आईं 29 सीटें, कम्युनिस्ट पार्टी ने ये चुनाव 137 सीटों पर लड़ा। जनसंघ की आईं 14 सीटें, जो अब तक की सबसे ज्यादा रहीं। लेकिन इस चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी बलरामपुर से हार गये। डीएमके ने एंटी-हिंदी को मुद्दा बनाकर तमिलनाडु की 7 सीटें जीतीं। 20 निर्दलीय उम्मीदवार भी जीते, मुस्लिम लीग, अकाली दल इस आम चुनाव में बुरी तरह से हारी।

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कांग्रेस एक बार फिर से सरकार में आई और प्रधानमंत्री बने जवाहर लाल नेहरु। लेकिन यहां से देश की राजनीति और सत्ता में बहुत बड़ा बदलाव आने वाला था। जिस कांग्रेस को नेहरु एक रखने के भरसक हिमायती रहे। उनकी बेटी ही उस कांग्रेस को खत्म करने वाली थी। उस कांग्रेस को हिलाने की नींव इस तीसरे चुनाव में रखी गई थी। जहां विपक्ष मजबूती के साथ उभर आया था और आगे चलकर बड़ी चुनौती देने वाला था। ये नेहरु के आखिरी चुनाव की कहानी है, ये इंदिरा गांधी के राजनीति में एंट्री की कहानी है। जो आगे चलकर देश की राजनीति का बड़ा हिस्सा बनने वाली थीं, नेहरू से भी बड़ा।

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