कोई भी रंग दाग नहीं होता है, चाहे वो भगवा हो या हरा. न ही कोई पर्व मज़हबी नफ़रतों की बुनियाद को मज़बूत करता है. हम सब ने होली के दिन किसी न किसी को जबरन रंग देने के बाद गाली सुनी है. हमने होली के दिन शराब के नशे में धुत्त मर्दों को महिलाओं के गाल और गर्दन पर जबरन गुलाबी रंग घसते भी देखा है. हमने होली के नाम पर ‘चोलिया में होता गुदगुदी’ और ‘सइयां जी दिलवा मांगेला गमछा बिछाय के’ जैसे गानों पर झूमते नशेड़ियों की भीड़ को भी देखा है।

होली एक पवित्र पर्व है और इसकी पवित्रता को बनाए रखना हमारी जिम्मेदारी है। यह बिल्कुल ज़रूरी नहीं है कि होली के दिन हर हिंदू रंग ही खेले और यह भी ज़रूरी नहीं है कि हर मुसलमान होली के रंगों से परहेज़ करे। हमने होली के दिन रंगों से बचने के लिए घर में छिपते हिंदूओं को भी देखा है और इस दिन रंगों में सराबोर मुसलमानों को भी देखा है। ऐसे में किसी कंपनी के विज्ञापन के हवाले से होली जैसे पर्व को जिस सांप्रदायिक रंग में रंगने की कोशिश हो रही है, हमें इससे बचने की जरूरत है।

आइये पहले पूरे मुद्दे को समझते हैं.

होली से पहले सर्फ़ एक्सेल का एक विज्ञापन सोशल मीडिया के अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर ट्रेंड कर रहा है। सर्फ़ एक्सेल के इस विज्ञापन को सांप्रदायिक रंगों में रंगने का प्रयास किया जा रहा है। हिंदू धर्म के कुछ लोगों का कहना है कि इस विज्ञापन के जरिये हिंदू धर्म के पवित्र पर्व होली को गलत तरह से प्रस्तुत करने का प्रयास किया जा रहा है। दरअसल, एक मिनट के इस विज्ञापन में एक छोटी-सी बच्ची अपनी साइकिल पर जा रही है और उस पर कुछ बच्चे रंग भरे गुब्बारे मार रहे हैं।

बच्ची खुशी-खुशी सभी गुब्बारे अपने ऊपर गिरने देती है और जब सभी गुब्बारे ख़त्म हो जाते हैं तब उसकी साइकिल एक घर के बाहर रुकती है और वह बच्ची एक छोटे बच्चे से कहती है कि बाहर आ जा, सब खत्म हो गया।

यह बच्चा सफ़ेद कुर्ता-पजामा पहने हुए है। बच्ची उसे अपनी साइकिल पर बैठाकर एक मस्जिद के बाहर छोड़ आती है। मस्जिद में जाते वक़्त बच्चा कहता है कि वह नमाज़ पढ़कर आएगा।

इस पर बच्ची जवाब देती है कि बाद में रंग पड़ेगा तो बच्चा भी खुशी में सिर हिला देता है। इसके साथ ही विज्ञापन खत्म हो जाता है।

विरोध करने वालों का पक्ष.

विरोध करने वाले लोगों में शामिल लोगों का कहना है कि इस विज्ञापन के जरिए समाज के दो वर्ग के लोगों को अलग करने की साजिश रची जा रही है। फ़िल्म निर्माता विवेक अग्निहोत्री ने लिखा है, “वैसे तो मैं क्रिएटिव आज़ादी का पक्षधर हूं। लेकिन मेरा प्रस्ताव है कि इस तरह के बेवकूफ़ कॉपीराइटर भारत जैसे धर्म निरपेक्ष देश में बैन हो जाने चाहिए जो यहां की गंगा-यमुना तहज़ीब से यमुना को अलग करना चाहते हैं।”

इसके अलावा बाबा रामदेव ने लिखा है, “हम किसी भी मज़हब के विरोध में नहीं हैं, लेकिन जो चल रहा है उस पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है, लगता है जिस विदेशी सर्फ से हम कपड़ों की धुलाई करते हैं अब उसकी धुलाई के दिन आ गए हैं?”

इस तरह इस विज्ञापन का विरोध कर रहे लोगों की वज़ह से सोशल मीडिया पर #BoycottSurfExcel हैशटैग ट्रेंड कर रहा है। होली के बाद जिस सर्फ़ की मदद से लोग अपने रंग को साफ करते हैं, उसी सर्फ़ एक्सेल के विज्ञापन को देखकर लोग होली से पहले उसे बॉयकॉट करने की बात कर रहे हैं।

विज्ञापन की आलोचना कर रहे लोगों के तर्क और सच्चाई.

इस विज्ञापन की आलोचना कर रहे लोगों का कहना है कि-

  • विज्ञापन में दो कौम के बीच दूरी दिखाने का प्रयास किया गया है।
  • विज्ञापन के अंत में होली के पवित्र रंग को दाग कहा गया है।
  • होली से लोगों को परेशानी होती है यह दिखाने का प्रयास किया गया है।

जबकि सच्चाई ये है कि लगभग एक मिनट के इस वीडियो को जब आप पूरा देख लेते हैं तो आपको दो कौमों के बीच की दोस्ती नज़र आती है। इस विज्ञापन में दूरी नहीं बल्कि दो धर्म के लोगों के बीच आपसी सद्भाव को दिखाया गया है। विरोध करने वालों का दूसरा तर्क है कि होली के रंग को दाग कहा गया है। जबकि ऐसा बिल्कुल भी नहीं है।

रंग को दाग कहने का मतलब होली की पवित्रता पर सवाल खड़ा करना नहीं है। बल्कि यह बताने की कोशिश की गई है कि यदि समाज में कोई वर्ग होली नहीं खेलना चाहता है तो उस वर्ग के लोगों को हमारी वज़ह से कोई समस्या न हो हमें इस बात का पूरा ध्यान रखना चाहिए। विरोध करने वालों को तीसरा पॉइंट यह है कि होली से लोगों को परेशानी होती है, ऐसा दिखाने का प्रयास किया जा रहा है। जबकि सच्चाई यह है कि विज्ञापन में होली से जिन लोगों को समस्या है, खुशी से पर्व मनाते समय उनके भावनाओं को सम्मान करने की बात कही जा रही है।

 पहले भी कई पर्वों पर सर्फ़ एक्सल विज्ञापन बना चुका है.

जानकारी के लिए आपको बता दें कि यह पहली बार नहीं है जब सर्फ़ एक्सल ने इस तरह का विज्ञापन बनाया हो।

रमजान के मौके पर भी एक्सल बेहतरीन विज्ञापन बना चुका है। इससे पहले भी सर्फ़ एक्सल कंपनी के क्रिएटिव वीडियो को हम देख चुके हैं। ऐसे में किसी विज्ञापन के हवाले से सांप्रदायिक सोच को फैलाना किसी भी तरह से सही नहीं हो सकता है।

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